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Opinion: दूध के दाम दोगुने करने की आंदोलनकारी किसानों की धमकी कहां तक जायज़ है?

किसान नेताओं की ये धमकिया कहां तक जायज़ हैं? आप सरकार के फ़ैसलों से असहमत हो सकते हैं.

किसान नेताओं की ये धमकिया कहां तक जायज़ हैं? आप सरकार के फ़ैसलों से असहमत हो सकते हैं.

राजनीति का ककहरा सीखने वाले भी आंख मूंद कर समझ सकते हैं कि विपक्ष किसान आंदोलन के ज़रिए आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उठाना चाहता है. ख़ास कर उत्तर प्रदेश पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की नज़ह है. विपक्षी पार्टियो की निगाहें ख़ास तौर पर जाट खापों के वोटों पर हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 27, 2021, 3:35 PM IST
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राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन में अब गर्मी का मौसम आने से पहले ही सरगर्मी घटती जा रही है. यही वजह है कि तीनों कृषि सुधार क़ानून रद्द करने की मांग पर अड़े किसान नेता नए-नए ऐलान और अपील कर किसानों को लुभाने में जुटे हैं. जब राकेश टिकैत ने किसानों से खेतों में खड़ी फ़सलें जला देने की अपील की, तो देश भर से किसानों की प्रतिक्रिया सामने आई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कई प्रदेशों के किसानों ने टिकैत को अपना नेता नहीं मानते हुए उनकी अपील सिरे से ख़ारिज कर दी.

क़रीब तीन महीने किसान आंदोलन को हो चुके हैं. सरकार बार-बार कह रही है कि किसान बातचीत का प्रस्ताव दें, तो उसके दरवाज़े हर समय खुले हुए हैं. लेकिन किसान नेता तीनों कृषि सुधार क़ानूनों की ख़ामियां बताने को तैयार ही नहीं हैं. साफ़ है कि वे बातचीत के ज़रिये कोई हल फ़िलहाल तलाशने के मूड में नहीं हैं. 26 जनवरी से पहले जो किसान नेता राजनैतिक पार्टियों के नेताओं से दूरी बनाए हुए थे, वे अब आगे आकर आंदोलन को समर्थन दे रहे विपक्षी पार्टियों के नेताओं का बढ़-चढ़ कर स्वागत कर रहे हैं. इसके पीछे विपक्ष की मंशा समझना बहुत पेचीदा काम नहीं है.

राजनीति का ककहरा सीखने वाले भी आंख मूंद कर समझ सकते हैं कि विपक्ष किसान आंदोलन के ज़रिए आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उठाना चाहता है. ख़ास कर उत्तर प्रदेश पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की नज़ह है. विपक्षी पार्टियो की निगाहें ख़ास तौर पर जाट खापों के वोटों पर हैं. केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान कह चुके हैं कि यह किसान आंदोलन है, खापों का आंदोलन नहीं, फिर खापों के मुखिया क्यों इसका समर्थन कर रहे हैं? हम यह भी देख चुके हैं कि 26 जनवरी के उपद्रव के बाद किसान आंदोलन बिखर सकता था. दिल्ली की सीमाओं पर असर साफ़ नज़र आ भी रहा था, लेकिन ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत ने आंसू निकाल कर आंदोलन की आग में घी का काम कर दिया. टिकैत के आंसुओं ने जाट खापों का समर्थन हासिल कर लिया और आंदोलन में फिर भीड़ जुटने लगी.



लेकिन अब गर्मी के मौसम से पहले हालांकि किसान नेता सभी तरह के इंतज़ामों की बात कह रहे हैं, फिर भी सच्चाई यही है कि आंदोलनकारी किसान अब अपने घरों को लौटने लगे हैं. यही वजह है कि किसान नेता धरना स्थल पर एसी लगाने तक के वादे और दावे कर रहे हैं. जिस तरह विपक्ष आंदोलन की आग को भड़का रहा है और अलगाववादी ताक़तें भी चाहती हैं कि केंद्र सरकार सुकून से न रहे, तो फिर इस तरह के सारे इंतज़ामों के लिए पैसे की भी कोई कमी नहीं रहने वाली. हालांकि अब केंद्र सरकार षड्यंत्रों की जांच में जुट गई है, लिहाज़ा फंडिंग खुलेआम तो नहीं ही होगी. लेकिन फिर भी बहुत से तरीक़े से पैसा आ सकता है.
एक चीज़ अब और नज़र आने लगी है कि जहां-जहां आंदोलनकारी किसान जुटे हुए हैं, वहां आसपास के बाशिंदों की नाराज़गी किसानों के प्रति फूटने लगी है. आसपास की छोटी-मोटी दुकानें तीन महीने से बंद हैं, छोटी-मोटी फैक्ट्रियां बंद हैं, लोगों के रोज़गार पर बहुत असर पड़ रहा है.


ऐसे में ये बात तो तय है कि अब यह कथित किसान आंदोलन जन-सहानुभूति खोता जा रहा है. दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले तीन करोड़ से ज़्यादा लोगों को आंदोलन की वजह से रोज़मर्रा की परेशानी हो रही है. सप्लाई चेन टूटने से सब्ज़ियों के कारोबारियों और सब्ज़ियां पैदा करने वाले किसानों की कमर टूट रही है.

कृषि सुधार क़ानून रद्द करने के लिए हो रहे आंदोलन से न केवल संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ रही हैं, साथ ही यह सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचा रहा है. यह आंदोलन अनेकता में एकता के सिद्धांत को मानने वाले भारतीय जन-मानस में क्षेत्रीयता की भावना को प्रबल करने में सहायक सिद्ध हो रहा है. कई हज़ार करोड़ों रुपये की बर्बादी रोज़ाना हो रही है, वह अलग से. अब आंदोलनकारी नेतृत्व आम आदमी को परेशान करने पर भी आमादा हो गया है. सिंघु बार्डर पर बैठे संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने दूध की क़ीमतें बढ़ाने की बात कह दी है. सरकार ने मांगें नहीं मानी, तो एक मार्च से दूध की क़ीमत दोगुनी कर दी जाएंगी. 50 रुपये लीटर बिकने वाला दूध अब 100 रुपये लीटर बेचा जाएगा. इसकी वजह पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों को बताया जा रहा है. इतना ही नहीं, किसान नेता सब्ज़ियों के दाम बढ़ाने की भी धमकी दे रहे हैं.

किसान नेताओं की ये धमकिया कहां तक जायज़ हैं? आप सरकार के फ़ैसलों से असहमत हो सकते हैं. देश का संविधान इसकी इजाज़त देता है. विरोध करना आपका अधिकार है, लेकिन दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण कर विरोध जताना कहां तक सही है? सही तो अब यही होगा कि किसान आंदोलन का स्वरूप बदलें, दिल्ली सी सीमाओं से उठें. ऐसी जगहों पर धरना-प्रदर्शन करें, जिससे आम लोगों को दिक्कत नहीं हो. आप आम आदमी के लिए परेशानी पैदा कर अपनी मांगें नहीं मनवा सकते हैं. अभी तो कोरोना फिर से पैर पसारने लगा है, ऐसे में देश हित में किसानों को घर लौट कर अपनी मांगों के समर्थन में लोकतांत्रिक तरीक़ों से अपनी बात सरकार के सामने रखें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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