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OPINION: क्यों देवेंद्र फडणवीस के लिए दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने से ज्यादा बड़ी है महाराष्ट्र की जंग?

News18.com
Updated: November 4, 2019, 8:52 PM IST
OPINION: क्यों देवेंद्र फडणवीस के लिए दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने से ज्यादा बड़ी है महाराष्ट्र की जंग?
नतीजों के 10 दिन बाद भी महाराष्ट्र में सरकार को लेकर पत्ते नहीं खुले हैं,

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (Maharastra Assembly Elections) के नतीजे आने के दस दिनों में सीएम देवेंद्र फडणवीस (CM Devendra Fadanvis) ने यह जाहिर नहीं होने दिया है कि उनके मन में आखिर क्या चल रहा है, क्योंकि 145 का जादुई आंकड़ा अभी भी मायावी लगता है.

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  • Last Updated: November 4, 2019, 8:52 PM IST
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(विनय देशपांडे)

नई दिल्ली. महाराष्ट्र (Maharashtra) के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadanvis) इन दिनों काफी परेशान नजर आ रहे हैं. पिछले कई दिनों से देवेंद्र फडणवीस की अगुआई में नेतृत्व, पैसे और रसूख के दम पर बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई को चलाने की योजना फीकी पड़ती दिख रही है क्योंकि चुनाव नतीजों के आने के 11 दिन बाद भी राज्य में सरकार कौन बनाने जा रहा है यह स्पष्ट नहीं हो पाया है.

चुनाव में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने के बाद शिवसेना (Shivsena) मुखर हो गई और गठबंधन को लेकर कई तरह से बयानबाजी की गईं. इस गतिरोध के जारी रहने के बीच एनसीपी प्रमुख शरद पवार (NCP Chief Sharad Pawar) ने पर्दे के पीछे से आगे बढ़ने का काम किया और सरकार बनाने की संभावना के चलते शिवसेना की ओर हाथ बढ़ाया. इस सबके बीच, फडणवीस को इस तरह परेशानी को सुलझाने में कोई मदद नहीं मिल रही है. सोमवार को वह भाजपा प्रमुख अमित शाह (Amit Shah) से मिलने के लिए दिल्ली पहुंचे.

लगातार उठ रहे हैं सवाल

फडणवीस को लेकर राज्य के सत्ता के गलियारों में सवाल उठने लगे हैं. जिनकी वजह से राज्य की राजनीति में विधानसभा चुनाव में जीत का जश्न मनाया जा रहा था, उन्हें पार्टी आलाकमान द्वारा खुद का बचाव करने के लिए छोड़ दिया गया है. इन पेचीदा हालातों में लगातार इस तरह बढ़ रहे उनके कद के चलते विशेषज्ञों का मानना है कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है. लेकिन अब अपने ही राज्य में चल रही उनकी परीक्षा के परिणाम बाद ही यह तय होगा कि क्या वह उम्मीदों पर खरे उतरते हैं या नहीं.

राज्य में 288 विधानसभा सीटों में से 105 जीतने के बावजूद भाजपा कमजोर और असहाय दिख रही है और इसमें सबसे ज्यादा दोष मुख्यमंत्री को दिया जा रहा है.

किसी को नहीं पता क्या सोच रहे हैं फडणवीस
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भाजपा के कांग्रेस और राकांपा के नेताओं को शिकार बनाने के कदम का उलटा असर हुआ. शिवसेना के खिलाफ निर्दलीय नेताओं का समर्थन करने के फैसले ने उसे नाराज कर दिया और पार्टी के अन्य शक्तिशाली नेताओं के पर कतरने के चलते पार्टी की आतंरिक राजनीति से संगठन के भीतर का माहौल खराब हो गया. किसान संकट, बेरोजगारी, आर्थिक संकट और मराठा आरक्षण से आहत लोगों को शांत करने में असफलता के चलते सिर्फ मुसीबतें ही खड़ी हुईं.

पिछले दस दिनों में सीएम फडणवीस ने यह जाहिर नहीं होने दिया है कि उनके मन में आखिर क्या चल रहा है, क्योंकि 145 का जादुई आंकड़ा अभी भी मायावी लगता है.

एक इन्ट्रोवर्ट के तौर पर पहचाने जाने वाले फडणवीस हमेशा अपनी बातचीत और पब्लिक अपीयरेंस में संयम के साथ दिखते हैं. यही नहीं चुने हुए लोगों की टीम सार्वजनिक तौर पर जाने वाली फडणवीस की हर तस्वीर और हर शब्द पर नजर रखती है. यह एक तरह के अनैतिक राजनीतिक माहौल में गॉडफादर के बिना युवा राजनेता बने व्यक्ति की असुरक्षा भी है, जो सोशल इंजीनियरिंग में बाधा नहीं पैदा होने देता है.

फडणवीस को परेशान कर रही हैं ये बातें
बाहर की तरफ से देखने से ऐसा लग रहा है कि फडणवीस अपने विवादित सहयोगी को टेबल पर लाने नाकाम रहे हैं और सिर्फ 50-50 पावर-शेयरिंग डील होने का दावा करते हुए उन्होंने आग में तेल डाल दिया है. लेकिन, जो बात उन्हें ज्यादा परेशान कर रही है, वह है पार्टी के भीतर उनका अलगाव और उनके विश्वासपात्रों के अधिकार कम होना.

एक पार्टी जिसने हाल ही में हरियाणा और उसके कुछ समय पहले गोवा में मुश्किल स्थिति को आसान कर दिया, वह महाराष्ट्र में सबसे बड़ी मार्जिन के साथ उभरी और अब उसे  बेसहारा छोड़ दिया गया है. जहां अमित शाह की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए गए हैं, वहीं महाराष्ट्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि नितिन गडकरी कहां हैं? ऐसे समय में जब विपक्षी दल फडणवीस पर आग-बबूला हैं, खुद फडणवीस विकल्पों कमी के चलते शिवसेना को मनाने की असफल कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में वह एक अकेले योद्धा नजर आते हैं.

2014 में आश्चर्यजनक तौर पर मुख्यमंत्री के रूप से चुने जाने के बाद (वह राज्य में केवल दूसरे ब्राह्मण सीएम थे, और उनकी कैबिनेट में एकमात्र ब्राह्मण थे), 49 वर्षीय फडणवीस ने किसी भी जाति-निष्ठा के बिना अपना कार्यकाल पूरा किया. चूंकि फडणवीस खुद को एक ऐसे नेता के रूप में दिखा रहे हैं जिन्होंने स्थानीय चुनावों में भी इस तरह के दलबदल की स्थिति के बीच भी जीत हासिल की थी, इसलिए विधानसभा चुनावों में सीटों के नुकसान का दोष भी उन्हीं पर डाला जा रहा है.

विपक्ष भी ले रहा चुटकी
भ्रष्टाचार के एक मामले में पवार से हुई ईडी की पूछताछ ने भी इसका रुख भाजपा के खिलाफ मोड़ दिया. हालांकि ऐसा फडणवीस के चलते नहीं हुआ था लेकिन अब जिसे इसका नुकसान हो रहा है वह फडणवीस ही हैं.

एनसीपी सुप्रीमो ने सीएनएन-न्यूज 18 से एक इंटरव्यू में कहा था, "चुनाव से पहले फडणवीस ने जिस तरह का व्यवहार किया, वह अति-आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि अहंकार था. महाराष्ट्र के लोगों को यह अहंकार बिल्कुल पसंद नहीं आया.'' विपक्ष का मजाक उड़ाते हुए पवार ने कहा, वह लड़ाई न करें, अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देता.

महाराष्ट्र भाजपा के नंबर 2 बने पाटिल
उधर महाराष्ट्र बीजेपी अध्यक्ष चंद्रकांतदादा पाटिल (Chandrakantdada Patil) हालांकि चुनावी राजनीति में नए हैं लेकिन राज्य भाजपा में नंबर 2 के रूप में उभरे हैं और अमित शाह के पसंदीदा हैं. भाजपा के आंतरिक हलकों में कैडर 'कोल्हापुर-कैंप' (चंद्रकांत पाटिल) और 'नागपुर-कैंप' (देवेंद्र फडणवीस) को लेकर मजाक किया जाता है.

पाटिल को अतीत में असंगत बयान देने के लिए जाना जाता है. लेकिन एकनाथ खडसे, पंकजा मुंडे और विनोद तावड़े जैसे अन्य प्रतियोगियों के पिछड़ने के बाद, इस संभावित प्रतियोगी को राज्य में नए नेता के रूप में उभरने में मदद मिली.

हाल ही में शिवसेना और भाजपा के बीच होने वाली बैठक में यह पाटिल ही थे जिन्हें भूपेंद्र यादव के साथ पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया गया. लेकिन मुख्यमंत्री के कार्यकाल पर बातचीत न होने के फडणवीस के बयान के बाद यह बैठक आखिरी समय में उद्धव ठाकरे ने कैंसिल कर दी.

हाथ से निकल रही स्थिति
केंद्रीय भाजपा नेतृत्व ने चुनावों से पहले स्पष्ट कर दिया था कि सत्ता के बंटवारे पर शिवसेना से राज्य इकाई ही बात करेगी. उस समय, ऐसा लग रहा था कि बीजेपी ने डिप्टी सीएम पद अपने सहयोगी को दे दिया होगा. लेकिन अब, सेना द्वारा सीएम पद को साझा किए जाने की मांग के बाद फडणवीस को बिल्कुल समझ नहीं आ रहा कि वह किस ओर देखें.

शिवसेना के आक्रामक नेता संजय राउत (Sanjay Raut) लगातार फडणवीस पर हमले कर रहे हैं. शरद पवार भी इस देरी को बच्चों का खेल बता चुके हैं वहीं कांग्रेस फिलहाल स्थिति को देख रही है. लेकिन फडणवीस का साथ देने के लिए बीजेपी कैंप से फिलहाल कोई सामने नहीं आया है.

जहां हर कोई अमित शाह की उपस्थिति को लेकर सवाल कर रहा है, वहीं नितिन गडकरी की अनुपस्थिति एक अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है. बीजेपी के खेमे में, अगर मातोश्री से सिल्वर ओक तक किसी भी वरिष्ठ बीजेपी नेता की पहुंच है तो वो गडकरी हैं. शरद पवार के साथ उनकी दोस्ती जगजाहिर है. लेकिन कुछ समय से गडकरी सुर्खियों से दूर हैं.

अब तक, राज्य के कुछ नेताओं के अनुरोधों के बावजूद, उन्होंने इस सत्ता के झगड़े से खुद को बाहर रखने का फैसला किया है. कई लोगों का मानना है कि गडकरी के हस्तक्षेप से जल्द ही उलझन सुलझ जाएगी. लेकिन सवाल यह है - क्या वह बात करेंगे और इससे उनके लिए क्या होगा?

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First published: November 4, 2019, 7:21 PM IST
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