पीढ़ियों से बिछड़े परिवार हैदराबाद में मिले, दोनों के धर्म अलग लेकिन डीएनए एक

दिल्ली में रहने वाला ऐसा ही एक हिंदू परिवार हैदराबाद में अपने बच्चे सुरेश कुमार (बदला हुआ नाम) के इलाज के लिए पहुंचा और उस परिवार को पता चला कि कर्नाटक के गुलबर्गा में रहने वाले एक मुस्लिम परिवार की बेटी फातिमा (बदला हुआ नाम) सुरेश की बहन है. सालों पहले दोनों के एक ही पूर्वज थे.

Sanjay Tiwari
Updated: July 6, 2019, 4:32 PM IST
Sanjay Tiwari
Sanjay Tiwari
Updated: July 6, 2019, 4:32 PM IST
कुंभ के मेले में बिछड़ने के जुमले के साथ, अपनों के खोने का दर्द और दोबारा मिलने की आस दोनों जुड़ी हैं. लेकिन जरा उन लोगों की सोचिए, जो पीढ़ियों पहले बिछड़ गए और अब तक शहर, समाज, जाति या अपना धर्म भी बदल चुके हैं. दिल्ली में रहने वाला ऐसा ही एक हिंदू परिवार हैदराबाद में अपने बच्चे सुरेश कुमार (बदला हुआ नाम) के इलाज के लिए पहुंचा और उस परिवार को पता चला कि कर्नाटक के गुलबर्गा में रहने वाले एक मुस्लिम परिवार की बेटी फातिमा (बदला हुआ नाम) सुरेश की बहन है. सालों पहले दोनों के एक ही पूर्वज थे.

एक ही पूर्वज के वंशज, दोनों बच्चे एक जैसी बीमारियों से पीड़ित
सुरेश कुमार और फातिमा जन्म से मंदबुद्धि की समस्या से पीड़ित हैं. दोनों में सेरेब्रल, सेरीबेलम और स्पाइनल कॉर्ड एट्रॉफी (क्षीणता) समेत कई एक जैसी समस्या पाई गई. दोनों के डीएनए का जब विश्लेषण हुआ तो वैज्ञानिक हैरान रह गए. कोशिका के अंदर पाया जाने वाला जीवद्रव ‘क्रोमोजोम’ नंबर 7 का एक खास हिस्सा दोनों बच्चों में हूबहू मिल गया. ऐसा तभी हो सकता है, जब दोनों किसी एक ही पूर्वज के वंशज हों. इस लिहाज से सुरेश कुमार और फातिमा भाई-बहन निकल आए. जबकि सुरेश कुमार का परिवार हिंदू धर्म को मानने वाला है और फातिमा का परिवार मुस्लिम धर्म को मानता है.

एक ही जीन के म्यूटेशन से हुए बीमार

सीडीएफडी के डायग्नॉस्टिक विंग के प्रमुख अश्विनी दलाल बताते हैं कि ‘दोनों बच्चे किसी एक ही पूर्वज की संतान हैं. दोनों के AIMP2 नाम के जीन का म्यूटेशन हो गया और इससे मंदबुद्धि की समस्या पैदा हुई. दोनों बच्चे जन्म से मंदबुद्धि हैं. ऐसे बच्चों के ठीक होने की गुंजाइश बहुत कम होती है. भारत में इस तरह की जैनेटिक बीमारियों की बड़ी वजह करीबी रिश्तेदारों में विवाह संबंध है’.

ये है जेनेटिक डिसार्डर का बड़ा कारण
दक्षिण भारत में हिंदू परिवारों में करीबी रिश्तेदारों के बीच शादी का प्रचलन है. मुस्लिम समाज में भी इस तरह की शादियों का प्रचलन है. ऐसी शादियों से जेनेटिक डिसोर्डर की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है. औसतन 100 में से 3 बच्चों को जेनेटिक बीमारियां होती है, लेकिन समान गोत्र या करीबी रिश्तों में शादी करने पर समस्या दोगुनी हो जाती है.
Loading...

हर व्यक्ति के 7-8 जीन गड़बड़ होते हैं
सीनियर साइंटिस्ट अश्विनी दलाल बताते हैं कि 20 हजार प्रकार के जीन्स में से अब तक सिर्फ 5 हजार जीन के बारे में ही जानकारी हासिल की जा सकी है. किसी इंसान के जन्म में बाकी 15 हजार प्रकार के जीन की भूमिका का पता लगाना एक बड़ी चुनौती है. लेकिन जब सारे जीन की भूमिका का सही आंकलन हो पाएगा, तब बहुत सारी समस्याओं की जड़ तक पहुंचना आसान हो जाएगा. उन्होंने बताया कि हर आदमी और औरत के 7-8 जीन गड़बड़ होते हैं. इस दौरान वो सिर्फ कैरियर होते हैं. लेकिन अगर एक जैसे गड़बड़ जीन वाले महिला और पुरुष शादी कर लेते हैं, तो उनसे पैदा होने वाले बच्चों को जैनेटिक बीमारी होने की आशंका 25 फीसदी तक हो जाती है.

मुश्किल होता है जेनेटिक बीमारियों का इलाज
ज्यादातर जैनेटिक बीमारियां लाइलाज हैं. इसलिए जेनेटिक बीमारी से ग्रसित बच्चे की जानकारी गर्भावस्था के दौरान होना बेहतर हैं. कानून के मुताबिक 5 महीने के बाद गर्भपात की इजाजत नहीं है, इसलिए जेनेटिक बीमारियों का पता लगाने के लिए गर्भावस्था के 3 महीने बाद ही कैरियर स्क्रीन टेस्ट करा लेना चाहिए. ​
ये भी पढ़ें -

जानें क्या है ऑपरेशन लोटस 3.0, जो बन सकता है कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की वजह

क्या कर्नाटक में एक बार फिर शिवकुमार बनेंगे संकटमोचक?
First published: July 6, 2019, 3:55 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...