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बच्चों के शारीरिक और भावनात्मक विकास में परिवार का रोल सबसे अहम : शोध

बच्चों के शारीरिक और भावनात्मक विकास में परिवार का रोल सबसे अहम : शोध

एक स्वस्थ पारिवारिक माहौल किसी की भी मानसिक दशा को बेहतर बनाने में बहुत ज़रूरी होता है.

एक स्वस्थ पारिवारिक माहौल किसी की भी मानसिक दशा को बेहतर बनाने में बहुत ज़रूरी होता है.

दुनियाभर के विशेषज्ञों का मानना है कि असुरक्षित पारिवारिक माहौल (परिवार का गरीब होना, सामाजिक तौर पर कम जुड़ाव और देखभाल करने वाला मनोवैज्ञानिक दिक्कतें) बच्चों की मानसिक सेहत पर बुरा असर डालने में अहम योगदान देता है.

समाजशास्त्र की सबसे अहम परिभाषा में समाज के निर्माण की पहली कड़ी परिवार होती है. जिसके ज़रिए व्यक्ति बाहरी दुनिया से जुड़ता है.और उसे बेहतर बनाता है. परिवार किसी व्यक्ति के विकास में ही अहम योगदान नहीं निभाता बल्कि किसी बच्चे के मनोवैज्ञानिक सामंजस्य, उसकी समस्याओं से निपटने की क्षमता, रणनीति बनाने, आत्मविश्वास को बढ़ाने और अपने लक्ष्य को तय करने में भी महती भूमिका निभाता है. एक स्वस्थ पारिवारिक माहौल किसी की भी मानसिक दशा को बेहतर बनाने में बहुत ज़रूरी होता है.

दुनियाभर के विशेषज्ञों का मानना है कि असुरक्षित पारिवारिक माहौल (परिवार का गरीब होना, सामाजिक तौर पर कम जुड़ाव और देखभाल करने वाला मनोवैज्ञानिक दिक्कतें) बच्चों की मानसिक सेहत पर बुरा असर डालने में अहम योगदान देता है.

जरनल ऑफ एडोल्सेंस में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि गरीब पारिवारिक माहौल वाले परिवार में युवाओं में भावनाओं में कमी, मदद की दरकार और ज्ञान से जुड़ी जानकारी को जुटाने में कमजोर होता है और उनमें भावनात्मक और आचरण से जुड़ी ज्यादा परेशानियां होती है. इसके उलट ऐसे परिवार जहां सकारात्मक माहौल होता है वहां युवा व्यवस्थित होते हैं और उनमें तनाव का सामना करने की काबिलियत भी ज्यादा होती है. विशेषज्ञों का ये भी दावा है कि अभाव के माहौल वाले परिवार मे बढ़ने वाले बच्चे अवसाद (डिप्रेशन) और एंग्जाइटी की ज्यादा शिकार हो सकते हैं.

मानसिक सेहत सप्ताह के तहत NEWS 18 ने दिल्ली की मनोचिकित्सक और सिस्टेमिक फेमिली थेरेपिस्ट रीना नाथ से बात की. नाथ की देशों और संस्थाओं के साथ काम कर चुकी हैं. उन्होंने पंजाब, कश्मीर और अफगानिस्तान में संकट के माहौल में समूह चिकित्सा भी दी है. बाद में वह संयुक्त राष्ट्र के तहत इंडियन असोसियेशन ऑफ फैमिली थेरेपी की सचिव भी रहीं हैं. अंतर्राष्ट्रीय परिवार चिकित्सा बोर्ड की सदस्य हैं और वर्तमान में परिवार चिकित्सा के जरनल के बोर्ड के साथ जुड़ी हुई हैं. उनके साक्षात्कार के संपादित अंश –

आपका फेमिली थेरेपी पर इतना व्यापक अनुभव है, आपको क्या लगता है, परिवार का बुरा माहौल बच्चें के शारीरिक और मानसिक विकास पर असर डालता है?
जी, बिल्कुल डालता है. परिवार का बुरे माहौल से बच्चे पर भावनात्मक और उसकी पढ़ाई दोनों पर असर पड़ता है. बुरा माहौल में सब कुछ शामिल है मतलब बच्चे के साथ मारपीट करना, या वयस्कों का आपस में झगड़ना और मैं यह भी कहना चाहती हूं कि लापरवाही भी नुकसानदायक परवरिश का कारण हो सकती है. मसलन अगर किसी बच्चे को चोट लग जाती है और उसका उपचार नहीं करवाया जाता है तो ये बुरी परवरिश कहलाएगी. परवरिश का खराब होना सिर्फ बुरे बर्ताव से ही नहीं होता है, कई बार वे सक्रिय तौर पर हिंसात्मक नहीं होते हैं लेकिन उनमें लापरवाही होती है जो किसी दूसरे तरीके से बच्चे पर बुरा असर डालती है. कई बार बच्चे खुद ही हिंसक हो जाते हैं और कई बार उनकी भाषा खराब हो जाती है, कई बार वो इससे पीड़ित रहते हैं, कई बार दोनों ही स्थिति भी हो सकती है. बचपन में मिला ये माहौल उनके साथ ताउम्र चलता है, कुछ मामलों में ऐसे बच्चे बड़े होकर जरा-जरा सी बात पर परेशान होने वाले या दूसरी तरह की मानसिक परेशानियों से घिरे रहते हैं. जिसकी वजह से वो जिंदगी का मजा नहीं उठा पाते हैं. इसका असर उनके रिश्तों और दोस्तों पर भी पड़ता है. हालांकि बच्चे लचीला स्वभाव रखते हैं, जरूरी नहीं है हर बच्चे में नकारात्मकता आने के पीछे उनके परिवार का माहौल या लापरवाही ही रही हो. इसी तरह से कुछ ऐसे माहौल के बाद इसे लेकर जागरुक हो जाते हैं और वो यह तय करते हैं कि वो ऐसे नहीं बनेंगे. हां लेकिन बहुत कम उम्र में मिला खराब माहौल बच्चों पर गहर असर छोड़ता है. वैसे तो अच्छी परवरिश के बाद भी लोग गुमराह हो जाते हैं. हम सभी जानते हैं भले ही हम गंभीर रूप से मनोरोगी नहीं हों लेकिन कुछ विकार के साथ हो हम बड़े हो सकते हैं. लेकिन ये बहुत सामान्य बात हैं कि हम में कुछ कमियां हो, जिसे मदद के ज़रिए ठीक किया जा सकता है. तो परिवार का बुरा माहौल ही बच्चे पर असर नहीं डालता है. लेकिन परिवार किस माहौल में हैं उसका भी बच्चे पर बुरा असर पड़ता है. खासकर अगर कोई अप्रवासी है या ऐसी जगह रह रहा हों जो जातिवाद से ग्रस्त हो, ऐसे में पूरा परिवार ही उस माहौल से पीड़ित होता है.

घरेलू हिंसा के मामलों में उछाल और लंबे वक्त तक अलग रहना, महामारी ने किस तरह से परिवारी संरचना पर असर डाला है.
महामारी की वजह से वाकई में परिवार पर असर डाला है, कई बार यह असर नकारात्मक भी रहा है. खासकर ऐसे परिवार जहां लोगों को देखरेख की जरूरत थी. लंबे वक्त तक लॉकडाउन की वजह से अलग थलग रहने से, वो घर से बाहर नहीं जा सकते थे, जिसकी वजह से महीने दर महीने देखरेख में कमही और असुरक्षा के भाव से उनमें तनाव, एंगजाइटी, थकान आ गई है और इसका बहुत नकारात्मक असर पड़ा है. और इसी दबाव के चलते उनमें हिंसा और अभद्र बर्ताव बड़ा है. और ये ऐसी बीमारी थी जिसे लेकर हमें पता था कि हमारी कोई मदद नहीं करेगा , हम अकेले हैं इस भाव ने हमें नाउम्मीद कर दिया. कई मामलों में लोगों को मदद नहीं मिली, ऐसे हाल में कोई भी क्या करेगा.
हालांकि दूसरी तरफ कुछ ऐसे परिवार भी थे जो महामारी के दौरान एक दूसरे के ज्यादा करीब आए, उनमें एक दूसरे के प्रति ज्यादा जुड़ाव बना. काम का दबाव में कमी के चलते कुछ रिश्ते सुधरे भी, जहां तक घरेलू हिंसा की बात है तो ऐसा उन परिवारों में हो सकता हैं जहां किसी मरीज को 24 घंटे निगरानी की जरूरत थी.

क्या आप ग्रामीण हरियाणा में अपने सामाजिक कार्य के अनुभवों को साझा करना चाहेंगगी और ये संजीवनी के साथ काम करने से कितना अलग था.
सबसे बड़ा अंतर तो शहरी और ग्रामीण परिवेश का था. संजीवनी अपनी तरह का पहला क्राइसिस इंटरवेन्शन सेंटर (संकट के दौरान हस्तक्षेप करने वाला केंद्र) था, जहां लोग खुद आते थे, और उस दौरान ऐसा केवल नई दिल्ली में होता था. तो हम ऐसे लोगों से मिलते थे जो जागरुक हैं और ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में जिनमें जानकारी का कम अभाव देखने को मिलता है. संजीवनी में लोग खुद चल कर आते थे, जबकि ग्रामीण हरियाणा, कश्मीर और पंजाब में लोगों ने मानसिक सेहत जैसी बात कभी सुनी ही नहीं है. वहां लोग इन परेशानियों से जूझ रहे हैं लेकिन उन्हें पता ही नहीं है कि उन्हें कोई परेशानी भी है. लोगों को ये समझाना बहुत बड़ी चुनौती थी कि इस बारे में बात करने में कोई बुराई नहीं है. हरियाणा में हम मरीज के पास सीधे नहीं जा सकते थे, उनके पास हमें स्वास्थ्यकर्मियों के साथ जाना पड़ता था, वे लोग अपने काम में माहिर होते हैं. उन्हें अपने मरीज के बारे में सब पता रहता था, इस वजह से उपचार में आसानी हो जाती थी. उन्हें मरीज के पारिवारिक हालात के बारे में भी पता होता था और वे उनसे सहानुभूति रखते थे, ये सब हमारे लिए बहुत चौंकाने वाला होता था. वहीं शहरी इलाकों में हम आज भी मानसिक सेहत को लेकर एक अजीब से नजरिया या मानसिकता को झेल रहे थे. शहरी इलाकों में लोगों का अपनी गिरती मानसिक सेहत को लेकर खुद परामर्श केंद्र जाना और चिकित्सक से मिलना बड़ी बात थी वहीं ग्रामीण इलाके में रहने वालों की तुलना में शहरी इलाकों में रहने वालो में साथ रहने और साझा करने जैसी मानसिकता की बहुत कमी होती है.

भारत के परिप्रेक्ष्य में अगर बात की जाए तो पिछले दो दशकों में मानसिक सेहत से जुडी जागरुकता को लेकर बहुत बदलाव आए हैं. क्या आपने ज्यादा पालकों को अपने बच्चों को थेरेपी सेशन में लाते हुए देखा है, या इसमें कोई बदलाव देखा है.
बिल्कुल, इसमें काफी बदलाव आया है, इसे लेकर स्वीकृति बड़ी है, अब आप आसानी से ऐसे लोगों को देख सकते हैं जो कहते हैं मुझे डिप्रेशन है, या एंग्जाइटी है या फिर मुझे अपनी मानसिक सेहत को लेकर किसी पेशेवर की मदद लेनी होगी. कम से कम अब हमें ये समझ आने लगा है कि अगर हम किसी मानसिक दिक्कत से जूझ रहे हैं तो हमें मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए ना कि किसी जनरल फिजिशियन से मिलना चाहिए. हालांकि इसे लेकर मनोचिकित्सा को लेकर मानसिकता में अभी भी बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. ऐसे लोग जो मेनिक-डिप्रेसिव या मूड डिस्ऑर्डर से पीड़ित हैं वो अभी भी मदद को लेकर हिचकिचाते हैं. ऐसे परिवार जहां कोई ऐसा बच्चा है जो मानसिक रोगी है तो परिवार वाले उसे घर से बाहर ले जाने में हिचकिचाते हैं.

मनोचिकित्सा के क्षेत्र में इतना व्यापक अनुभव ऱखने के बाद, आपको क्या लगता है भारतीय मानसिक सेहत से जुड़े बुनियादी ढांचे में सुधार हो सकता है, और इसमें आम जनता की क्या भूमिका होनी चाहिए.
सबसे पहली बात तो ये है कि इतनी बड़ी आबादी के हिसाब से हमारे पास मानसिक सेहत से जुड़े पेशेवरों की भारी कमी है, जिसे पूरा करना बहुत ज़रूरी है. ये एक गंभीर मामला है, सरकार को मनोचिकित्सा विषय की मेडिकल सीट्स बढ़ानी चाहिए, और ज्यादा कॉलेज बनाने की ज़रूरत है, बच्चों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वो क्लीनिकल सायकोलॉजी, समाज सेवा, और फैमिली थेरेपी की पढ़ाई करें. अस्पतालों के हर विभाग में थेरेपेटिक हस्तक्षेप की जरूरत है, जबकि अभी पूरे अस्पताल में मानसिक सेहत विशेषज्ञों की महज एक टीम होती है. साथ ही इसे लेकर संस्थागत मदद की भी कमी है, इन्श्योरेंस कंपनी मानसिक सेहत को कवर नहीं करती हैं, जबकि पश्चिम में इन्श्योरेंस में मानसिक सेहत को भी कवर किया जाता है. संगठन के स्तर पर भी लोग एच आर (मानव संसाधन विभाग) के पास जाकर मानसिक सेहत की बात बताने में हिचकिचाते हैं और तब तक पिसते रहते हैं जब तक पूरी तरह टूट नहीं जाते हैं. क्योंकि वो मानसिक सेहत के नाम पर छुट्टी नहीं लेना चाहते हैं. कुछ लोगों से मैं मिली हूं जिनको लगता है इस तरह की छुट्टी उनकी पेशेवर वृद्धि में रुकावट पैदा कर सकती हैं. इन सभी बातों के लिए ज़मीनी स्तर पर सुधार की ज़रूरत है.
हालांकि शैक्षणिक स्तर पर कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं, कई स्कूलों नें अपने यहां काउन्सलर रखे हैं. जो बच्चों के दिक्कतों को सुनकर उनकी मदद करते हैं. हाल ही में एक ऐसा ही परिवार को स्कूल ने मेरे पास भेजा था, जो अपने बच्चे को पीटते थे. यह एक दिलचस्प सुधार है. इसके साथ ही हमें ऐसे केंद्र की ज़रूरत है जहां लोग खुद आएं, और सरकार को इस तरह के केद्र बनाने में मदद करनी चाहिए. इस तरह से मानसिक सेहत का उपचार किफायती और सबकी पहुंच में होगा.

Tags: Family, Mental health, Research

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