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क्यों अराजकता और उपद्रव की तरफ जा सकता है किसान आंदोलन

कृषि कानून का विरोध कर रहे किसान पिछले 51 दिन से दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे हुए हैं. (फोटो साभार-AP)
कृषि कानून का विरोध कर रहे किसान पिछले 51 दिन से दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे हुए हैं. (फोटो साभार-AP)

हम देख रहे हैं कि प्रदर्शन (Protest) के नाम देश के लोगों की लोकतांत्रिक राय (Democratic Will) को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है. इनमें ऐसे भी लोग हैं जिनके तार माओवाद (Maoism) और अतिवाद (Extremism) से भी जुड़े हुए हैं. दुर्भाग्यपूर्ण रूप से इन्हें विपक्षी पार्टियां भी समर्थन दे रही हैं. ऐसे में आंदोलन के पीछे से अपने मंसूबे कामयाब करने में लगीं विदेशी और अतिवादी ताकतों के खिलाफ सचेत रहना होगा क्योंकि ये इसे अराजकता में भी बदल सकती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 14, 2021, 11:03 PM IST
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देश रतन निगम
नई दिल्ली.
तीन नए कृषि कानूनों (New Farm Laws) के विरोध में किसान आंदोलन (Farmers Protest) के 51 दिन पूरे हो चुके हैं. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने 4 सदस्यीय कमेटी बना दी है जो दोनों पक्षों की बात सुनेगी. लेकिन किसान कानूनों को रद्द किए जाने के अलावा कोई भी बात मानने को राजी नहीं हैं. यहां तक कि उन्‍होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित 4 सदस्‍यीय कमेटी पर भी नाराजगी जाहिर की है. संयुक्त किसान मोर्चा अपने पूर्व के फैसले के लिहाज से किसी भी कमेटी के प्रस्ताव को खारिज कर चुका है, यानि उन्‍हें यह कतई स्‍वीकार नहीं है. इससे पहले किसान संगठनों की तरफ से कहा जा चुका है कि सुप्रीम कोर्ट मामले में क्या कहेगा, इसकी उन्हें चिंता नहीं.

खूब सोच विचार के बाद लाए गए कानून
नए कृषि कानून सबसे पहले अध्यादेश के जरिए लाए गए जिसे संसद ने बड़े बहुमत से पास किया. ऐसा नहीं कि ये एक दिन में ला दिए गए. इसके लिए वर्षों तक चिंतन और बहसें हुई हैं. खुद पीएम मोदी कह चुके हैं कि नए कानून किसी जल्दीबाजी में नहीं लाए गए बल्कि इन पर खूब सोच विचार हुआ है. कमेटियों में तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टी के नेताओं की सोच थी कि कृषि सुधार की जरूरत है. सबका मानना था कि कृषि क्षेत्र को बिचौलियों से मुक्त कराना है. लेकिन विडंबना ये है कि कई ऐसे नेता हैं जिनकी पार्टी पहले तो कृषि सुधार की समर्थक रहीं, लेकिन अब वो इसका विरोध कर रहे हैं. किसान नेता तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी नहीं मान रहे. सोचिए कोई राजनीतिक पार्टी जैसे कांग्रेस-बीजेपी या फिर कोई और संगठन सुप्रीम कोर्ट की अथॉरिटी को नकार दें तो क्या होगा!
लोकतंत्र की राय को नष्ट करने की कोशिश
संसद द्वारा लाए गए कानून लोकतंत्र में आम लोगों की राय प्रदर्शित करते हैं. और किसी को भी इस राय को नष्ट करने का अधिकार नहीं है. इस पर कोई आपत्ति है तो उसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जा सकता है. या फिर अगर किसी के पास लोगों का समर्थन है तो वो चुनाव लड़कर, जीतकर कानून में कोई बदलाव के लिए प्रयास कर सकता है. लेकिन तथाकथित किसान नेता इन दोनों ही रास्तों को नहीं समझते. लोकतंत्र में प्रदर्शन के जरिए लोगों का समर्थन हासिल किया जा सकता है या फिर जागरूकता फैलाई जा सकती है.



आज हम देख रहे हैं कि प्रदर्शन के नाम देश के लोगों की लोकतांत्रिक राय को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है. इनमें ऐसे भी लोग हैं जिनके तार माओवाद और अतिवाद से भी जुड़े हुए हैं. दुर्भाग्यपूर्ण रूप से इन्हें विपक्षी पार्टियां भी समर्थन दे रही हैं. ऐसे में आंदोलन के पीछे से अपने मंसूबे कामयाब करने में लगीं विदेशी और अतिवादी ताकतों के खिलाफ सचेत रहना होगा क्योंकि ये इसे अराजकता में भी बदल सकती हैं.
(लेखक सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट  हैं. लेख में उनके निजी विचार हैं.)

(एडवोकेट देश रतन निगम की पूरी स्टोरी यहां क्लिक कर पढ़ी जा सकती है.) 
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