OPINION| किसान आंदोलन: इस भ्रम की दवा क्या है?

किसानों से जुड़े विधेयकों के पारित होने के बाद मचे सियासी घमासान पर चर्चा से पहले चार दशक पुरानी राजनीति को याद किया जाना चाहिए
किसानों से जुड़े विधेयकों के पारित होने के बाद मचे सियासी घमासान पर चर्चा से पहले चार दशक पुरानी राजनीति को याद किया जाना चाहिए

किसानों से जुड़े कानूनों के पारित होने के बाद कहा जा रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था सरकार खत्म करने जा रही है. समूचा विपक्ष इस भ्रम को फैलाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, जबकि सरकार बार-बार इसे खारिज कर रही है. .

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 25, 2020, 3:05 PM IST
  • Share this:
(उमेश चतुर्वेदी)

किसानों से जुड़े विधेयकों के पारित होने के बाद मचे सियासी घमासान पर चर्चा से पहले चार दशक पुरानी राजनीति को याद किया जाना चाहिए. जिस तरह आज सवाल उठ रहे हैं, जिन सवालों को लेकर भ्रम फैलाये जा रहे हैं, जबकि बार-बार सरकार उन भ्रमों को खारिज कर रही है. सरकार की बात पर भरोसा करने की बजाय उसे ही झूठा ठहराने की चौतरफा कोशिश हो रही है. कुछ वैसा ही चार दशक पहले ही हुआ था. बस अंतर यह था कि तब आज की तरह दैत्याकार सोशल मीडिया नहीं था. टेलीविजन को कानफाड़ू शोर फैलाने वाले समाचार चैनल नहीं थे. मूल्यों की तिजारत करने वाली पत्रकार पीढ़ी नहीं थी. आज यह सब सरंजाम मौजूद है.

कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जुटाकर बनी जनता पार्टी की सरकार बेहतर काम कर रही थी. मोरारजी देसाई की अक्खड़ता को छोड़ दें और राजनीति की कुछ छोटी-मोटी अनिवार्य बुराइयों को छोड़ दें, उस सरकार ने महंगाई रोक दी थी. राशन की दुकानों पर कालाबाजारी तकरीबन थम गई थी. मद्यनिषेध भी सफलतापूर्वक लागू हो चुका था. लेकिन, इसी बीच जनता पार्टी के तत्कालीन महासचिव मधु लिमये का रूस का दौरा हुआ. दौरे से पहले भारतीय राजनीति, खासतर जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति में दोहरी सदस्यता को लेकर बहुत ज्यादा खींचतान नहीं थी. लेकिन मधु लिमये ने भारत लौटते ही इस मुद्दे को छेड़ दिया.



उन्होंने जनता पार्टी में शामिल जनसंघ घटक के सदस्यों की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति निष्ठा को लेकर सवाल छेड़ दिया और यह विवाद इतना बढ़ा कि जनता पार्टी टूट गई. दो साल पहले आम चुनावों में हार के बाद हताश और पस्त पड़ी कांग्रेस तब तक संभल चुकी थी. उसने मौके का फायदा उठाया, चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई के मतभेदों को बढ़ावा देने में परोक्ष भूमिकाएं निभाईं और देखते ही देखते जनता पार्टी की सरकार गिर गई और उसके बाद का इतिहास है. कुछ ही महीनों बाद हुए चुनावों में कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में लौट आई थी.
गांधी शांति प्रतिष्ठान के पूर्व सचिव और मोरारजी देसाई के करीबी रहे सुरेंद्र कुमार अक्सर कहा करते हैं कि मोरारजी की सरकार जिस तरह चल रही थी, उससे तब की दुनिया की दोनों बड़ी महाशक्तियां चिंतित थीं. उन्हें लगता था कि भारतीय मूल्यों के साथ अगर मोरारजी देसाई सरकार अपने तरीके से चल गई तो वह उनके हित में नहीं होगी. सुरेंद्र कुमार अक्सर कहते हैं कि उस सरकार के गिरने, मधु लिमये की रूस की यात्रा और उसके बाद उठे जनता पार्टी के सदस्यों की दोहरी सदस्यता के सवालों को लेकर गहरा और व्यापक शोध होना चाहिए.


किसानों से जुड़े कानूनों के पारित होने के बाद कहा जा रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था सरकार खत्म करने जा रही है. समूचा विपक्ष इस भ्रम को फैलाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, जबकि सरकार बार-बार इसे खारिज कर रही है. उसे इस भ्रम को दूर करने के लिए अखबारों में भर-भर पेज के विज्ञापन दे रही है. इसके बावजूद विपक्षी दल अपनी कोशिश से पीछे हटते नहीं दिख रहे हैं.

यह पहला मौका नहीं है कि मोदी सरकार के किसी व्यापक प्रभाव वाले फैसले को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा हो. याद कीजिए कश्मीर और अनुच्छेद 370 को लेकर किए जा रहे विपक्षी प्रचार को. कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, वामपंथी दलों सभी दावे से कह रहे थे कि अगर सरकार ने अपने कोर मुद्दे यानी अनुच्छेद 370 को खारिज करेगी या हटाएगी तो कश्मीर में आग लग जाएगी. कश्मीर में पाकिस्तान की शह पर आग पहले से ही लगी है. विपक्ष का प्रचार था कि अगर 370 हटाया गया तो कश्मीर हाथ से निकल जाएगा.

अनुच्छेद 370 को संसद ने अगस्त 2019 में ही हटा दिया, लेकिन कश्मीर पहले की तुलना में और भी ज्यादा भारत का गहरा अंग हो गया है. और तो और, अब तो सीमा पार स्थित कश्मीर के हिस्से से भी भारत के साथ जुड़ने की आवाजें तेज होती जा रही हैं. इसी तरह भ्रम फैलाया गया कि अगर राम मंदिर बनाने का फैसला हुआ तो देशव्यापी हिंदू-मुस्लिम दंगे होंगे. अव्वल तो अयोध्या में जन्मभूमि पर राममंदिर बनाने का फैसला केंद्र सरकार का नहीं था, यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया. लेकिन तब भी विपक्ष का फैलाया भ्रम सही साबित नहीं हुआ. देश में कहीं कोई अप्रिय वारदात नहीं हुई. विपक्षी दलों ने यह भी भ्रम फैलाने की कोशिश की कि अगर मुस्लिम महिलायों को आजादी देने वाले हलाला कानून को पारित किया गया तो मुस्लिम समाज उग्र होगा, तब भी ऐसा नहीं हुआ. वैसे यह कानून भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही पारित किया गया.

आजादी के बाद के भारत का आम चलन रहा है. चुनावों के पहले हर दल अपना घोषणा पत्र जारी करता रहा है. लोगों से ढेर सारे वायदे करता रहा है, लेकिन ऐसा कम ही होता रहा कि घोषणा पत्र में किए गए वायदे पूरे हों. नरेंद्र मोदी सरकार इस मामले में अपनी तरह की अलग सरकार है, जिसने इस राजनीतिक संस्कृति को बदल दिया है. पूरी दुनिया जानती है कि तीन तलाक का विरोध, राम मंदिर का निर्माण, अनुच्छेद 370 को खारिज करना भारतीय जनता पार्टी का घोषित एजेंडा रहा है. सत्ता में आने के बाद उसने अपने ये सारे एजेंडे और चुनावी वादे पूरे किए हैं.


इसका असर यह हुआ कि समूचा विपक्ष और संघ विचार परिवार विरोधी बौद्धिक धाराओं ने हाथ मिला लिया. इसका सुनियोजित कार्य नागरिकता संशोधन विधेयक के दिसंबर 2019 में पारित होने के बाद दिखा, जब यह भ्रम फैलाया गया कि इस विधेयक के पारित होने के बाद मुसलमानों से नागरिकता छीन ली जाएगी. उस विधेयक के कानून बने नौ महीने हो गए हैं, लेकिन विपक्षी दलों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि कितने मुसलमानों की नागरिकता भारतीय संघ ने छीन ली है. बहरहाल सुनियोजित कोशिशों का असर यह हुआ कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ अल्पसंख्यक लोग सड़कों पर उतर आए. उसकी ही अगली कड़ी किसानों से जुड़े कानूनों के पारित होने के बाद पंजाब और हरियाणा में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को देखा जा सकता है.

सच तो यह है कि जब न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था होने के बावजूद देश के ज्यादातर छोटे और मंझोले किसान तो सरकारी मंडियों का रूख करने से बचते रहे. वहां के भ्रष्टाचार और उसे लेकर होने वाली परेशानियों के चलते किसान मंडियों से बचते रहे. इसका यह भी मतलब नहीं है कि साहूकार या अनाज कारोबारी औनेपौने दाम पर अनाज खरीदते रहे. आज भी किसान जरूरत के मुताबिक ही अनाज तत्काल बाजार में बेचता है, अन्यथा वह बेहतर कीमत का इंतजार करता है. जिन इलाकों में यह चलन है, वहां के किसान विपक्षी भ्रमजाल के बावजूद मैदान में नहीं उतर पाए हैं तो इसकी बड़ी वजह यही है. किसान अपना नफा-नुकसान खुद देखता है.


दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि जिन्होंने कायदे से गांव नहीं देखे, खेत से जिनका साबका नहीं पड़ा, फसल की निराई-गुड़ाई नहीं की, उपज की मड़ाई-कटाई नहीं की, घर पर खेतों से अनाज कैसे आता है, जो नहीं जानते, वे लोग किसानों के हमदर्द बनने का दावा कर रहे हैं. दरअसल ऐसे लोगों की कोशिश अपनी राजनीति चमकाना है. इसीलिए वे राज्यसभा में अध्यक्ष की पीठ के सामने मेज पर चढ़ जाते हैं...हंगामा करते हैं और इसके बावजूद खुद को संसदीय आचरण के संवाहक मानते हैं. लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज की जनता सूचनाओं के बहुस्रोतों के उपयोग की आदी हो गई है. वह भी सच और झूठ समझने लगी है. उसकी समझ ही मौजूदा राजनीति को जवाब देगी.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज