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किसान आंदोलन और सरकार की विफलता

किसानों ने आज किया है भारत बंद का आह्वान. (Pic- AP)

किसानों ने आज किया है भारत बंद का आह्वान. (Pic- AP)

Farmers Protest: इन आन्दोलनों का नेतृत्व वो शक्तियां भी कर रही हैं, जिनका लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में रत्ती भर भी विश्वास नहीं है, जिनके लिए लोकतंत्र इनके हितों को साधने का एक माध्यम भर है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 8, 2020, 11:06 AM IST
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नई दिल्ली. पिछले एक हफ्ते से दिल्ली के ज्यादातर मार्ग बंद हैं. दिल्ली से बाहर जाने वाले और दिल्ली आने वालों को इसके कारण लगतार परेशानी उठानी पड़ रही है. मगर मीडिया और बहुत सारे राजनीतिक संगठनों के लिए यह राजनीतिक नुरा-कुश्ती है, जिसके द्वारा वह लगतार केंद्र के धैर्य और राजनीतिक समझ का परीक्षण कर रही है. लगभग एक वर्ष में दिल्ली दूसरा आन्दोलन को देख रही है, जिसका उद्देश्य दिल्ली की आवाम को परेशान करके केंद्र सरकार से एक अच्छी राजनीतिक डील करना है.

शाहीन बाग (Shaheen Bagh) की भांति यह आंदोलन भी शांति पूर्ण है मगर इसका अंत शाहीन बैग जैसा हिंसक होगा या नहीं यह भविष्य के गर्भ में है. शाहीन बाग ने जहां कुछ रोड ब्लॉक किए थे वहीं अबकी बार का आंदोलन दिल्ली को घेरने पर आमादा है. मगर दोनों आंदोलनों का नेतृत्व और चरित्र एक जैसा है. शाहीन बाग आंदोलन जहां सीएए (CAA) और एनआरसी (NRC) की गलत व्याख्या पर आधारित था. वहीं, कृषि कानून (Farm Laws) के विरोध में उपजा यह आंदोलन एक छोटे से वर्ग के हितों की रक्षा के लिए किया जा रहा है.

पंजाब के किसानों (Punjab Farmers ) को छोड़कर लगभग सभी राज्यों के किसानों ने इस बिल को समर्थन किया है. पंजाब में भी इस बिल का विरोध केवल किसानों का एक वर्ग ही कर रहा है, इस विरोध को पंजाब की राजनीतिक पार्टियां अपने राजनीतिक निहितार्थों के कारण समर्थन कर रही हैं. केंद्र सरकार और इसके मंत्री व लगातार इस विषय पर स्पष्टीकरण दे रहे हैं मगर सीएए अधिनियम की भांति आंदोलनकारी जनता कानून से ज्यादा अफवाहों पर विश्वास कर रही है.




इस आन्दोलन का नेतृत्व पंजाब के राजनीतिक दल कर रहे हैं जिनका हित प्रचलित मंडियों से जुड़ा है प्रस्तावित कृषि कानून में प्रचलित मंडियों के साथ निजी मंडियों की स्थापना और किसानों को अपना अन्न कहीं भी बेचने की स्वतंत्रता दी गई है मगर राजनीतिक निहितार्थों और तात्कालिक राजनीतिक लाभ के कारण पिछले कई महीने से पंजाब राज्य के राजनीतिक दल और किसानों का एक वर्ग इस विषय को उठा रहे हैं.
लम्बे समय चलने वाले ये आन्दोलन ने केवल आर्थिक व सामाजिक प्रभाव छोड़ते हैं. अपितु जनमानस को मनोवैज्ञानिक रूप से भी प्रभावित करते हैं. यह आन्दोलन वैसे तो अहिंसक प्रकृति के होते हैं मगर लगातार पक्ष और विपक्ष के संवाद के फलस्वरूप जो सोशल मीडिया पर हिंसा जन्म लेती है, वह समाज में वैमनस्य को जन्म देती है. जिसकी परिणति दिल्ली दंगों के रूप में होती हैं. शाहीन बाग का आन्दोलन भले ही अहिंसक रहा हो मगर उस आन्दोलन के संवाद ने जिस वैमनस्य को जन्म दिया उसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका दिल्ली दंगों में रही.

लम्बे समय चलने वाले आन्दोलन अक्सर पथ भ्रष्ट हो जाते हैं. इसका उदहारण हम किसान आन्दोलन में भी देख सकते हैं, जिसमे कई सारे समूह हिंसा का समर्थन करते दिखे. कुछ समूहों तो भिन्डारवाला का समर्थन भी करते दिखे. यह सारी स्थिति किसी भी हालात में सुखद नहीं कही जा सकती हैं. जब देश सरहद पर तनाव की समस्या से गुजरा रहा हो और देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति कोरोना के कारण अस्त-व्यस्त हो. ऐसे समय विपक्ष से भी रचनाशीलता की उम्मीद की जाती है मगर विपक्ष को इन उम्मीदों से ज्यादा सरोकार नहीं दिखता है.


दिल्ली जो देश कि राजधानी है लगातार उसके अस्तित्व और उसके जीवन पर ये आंदोलन नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं. मगर दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी अपने राजनीतिक हित पंजाब में भी होने के कारण इन सभी विरोधों पर कोई राय नहीं रख पा रही है. अकाली दल, आप जैसे क्षेत्रीय दल इन सब संकटों की संकीर्ण व्याख्या करें तो वह एक हद तक समझ में आता है. मगर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का इस प्रकार के आंदोलन को खुला समर्थन चिंता का विषय है. दिल्ली से आने से एक माह पूर्व आंदोलनकारियों ने ट्रेन यातायात को एक माह तक रोक रखा था जब सरहद पर तनाव हो और देश कोरोना के कारण नाज़ुक दौर से गुजर रहा हो तो इस प्रकार के निर्णय देश के सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की संकीर्ण मानसिकता को ही प्रदर्शित करता है.

शाहीन बाग से लेकर किसान आंदोलन तक देखा गया है की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी इन आंदोलनों के सामने अपने आपको असहाय पाती है. शाहीन बाग के समय भी भाजपा सरकार राजनीतिक नफा नुकसान और दिल्ली चुनाव के कारण कोई निर्णय नहीं ले पाई, जिसके कारण दिल्ली की जनता को अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ा. जिसकी परिणति दिल्ली दंगों के रूप में हुई. किसान पिछले कई महीनों से लगातार एक ऐसे विषय को लेकर पूरे देश आंदोलित है, जो वास्तव सत्य नहीं है. अगर सरकार इस समय ऐसा नहीं कर सकी तो उसे भविष्य में भी इस प्रकार की स्थिति के लिए तैयार रहना चहिए. केंद्र सरकार का वर्तमान में निर्णय उसके भविष्य की चुनौतियों का निर्धारण करेगा.

भारतीय जनता पार्टी की इस राजनीतिक दुविधा का कारण उसका अपना इतिहास है जो आपातकाल से जुड़ा है. भाजपा सदैव अपने को आपातकाल लोकतान्त्रिक लड़ाई की विरासत की मुख्यनायक और कांग्रेस को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करती आई है और इस विरासत में एक दाग भी नहीं चाहती है. जिसके कारण वह कई मौकों पर जनता के हितों की अपेक्षा अपनी विरासत को संभालती हुई नजर आती है. मगर भाजपा को अगर राष्ट्र की आर्थिक प्रगति और समाज के ही दोनों को एक साथ साधना है तो उसे इस दुविधा से निकल कर कुछ कठोर निर्णय भी लेने चाहिए क्योंकि इन आन्दोलनों का नेतृत्व वो शक्तियां भी कर रही हैं, जिनका लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में रत्ती भर भी विश्वास नहीं है, जिनके लिए लोकतंत्र इनके हितों को साधने का एक माध्यम भर है. (डिसक्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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