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किसान आंदोलन: नक्सल आंदोलन के क्रांतिकारी पैम्फलेट का नया रूप हैं सोशल मीडिया #हैशटैग

मोहनदास करमचंद गांधी के सत्याग्रह को याद करना और उसे हमारे समय के विद्रोह की महात्मा के विरोध से तुलना करना बेवकूफी है. वह भी अराजकता का वैध बनाने की मांग करते हुए. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर-AP)
मोहनदास करमचंद गांधी के सत्याग्रह को याद करना और उसे हमारे समय के विद्रोह की महात्मा के विरोध से तुलना करना बेवकूफी है. वह भी अराजकता का वैध बनाने की मांग करते हुए. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर-AP)

Farmers Protest: अगर माओ की 'लिटिल रेड बुक' की ताकत बंदूक की नाल से निकलती थी, तो आज हैशटैग के साथ ट्वीट्स के जरिए निकल रही है. उस समय के पूंजीपति आज का कॉर्पोरेट सेक्टर है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 4, 2021, 5:35 PM IST
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(कंचन गुप्ता)


नई दिल्ली. पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों की तरफ से बदलावों का विरोध जारी है. ये सभी संसद (Parliament) के बनाए तीन कानूनों (Three Laws) का विरोध कर रहे हैं, जो कृषि क्षेत्र (Agriculture Sector) को आसान खेती करने वालों की आय को बेहतर बनाएंगे. हालांकि, अब यह सोशल मीडिया (Social Media) पर एक हैशटैग कैंपेन के रूप में बदल गया है. इस अभियान के बारे में कुछ भी बहुत मनोरंजक या मूर्खतापूर्ण नहीं है. खासतौर से गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा के बाद, जहां प्रदर्शनकारियों ने लाल किले (Red Fort) में दंगा कर दिया था.

ग्लोबल ट्रैंड्स के मामले में हैशटैग अभियान में खतरनाक और भड़काऊ है. जीनोसाइड शब्द के साथ एक नफरत से भरा हैशटैग इस मुद्दे को बाहर लाता है. जिसका सोशल मीडिया पर प्रचार किया गया था और ट्रैंड कराया गया था. बड़ी विदेशी राजनीतिक और सोशल मीडिया हस्तियां, जिन्होंने कभी भी भारतीय मुद्दों पर दिलचस्पी नहीं दिखाई, वे लोगों का ध्यान आकर्षित करने और अपने नंबरों को बढ़ाने के लिए इसमें शामिल हो गए. सभी भारत सरकार से एक औपचारिक प्रतिक्रिया की मांग कर रहे थे.
कई मायनों में 'लोकतांत्रिक असंतोष' की आड़ में यह विघटनकारी अराजकता वास्तविक नक्सल आंदोलन (Naxal Movement) और उसके नतीजों की यादें ताजा करती है. इसमें कई विचारधाराएं और राजनीतिक कोशिशें शामिल थीं. एक धागा, जो इन्हें बांधकर रखता था, वह था भारत सरकार का विरोध करना और इसकी संवैधानिक संस्थाओं की बात न मानना.



2020 की तरह ही 1960 का दशक भी वैश्विक उथल-पुथल से भरा था. भारत भी इससे अछूता नहीं था. 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) चारू मजूमदार के नेतृत्व वाले मार्क्सवादी-लेनिनवादी धड़े के साथ अलग हो गई थी. ये एक सशस्त्र लोकतांत्रक आंदोलन का आह्वान कर रहे थे. ये एक ऐसा विद्रोह था, जिसे नक्सल आंदोलन के तौर पर जाना गया. इसका नाम पश्चिम बंगाल के एक दूर-दराज के गांव नक्सलबाड़ी के नाम पर रखा गया था.



मजूमदार का उद्देश्य 'ऐतिहासिक आठ दस्तावेजों' के दम पर ऐसी आग को भड़काना था, जो उसके भारतीय गणराज्य को एक क्रांतिकारी राज्य की मदद से उखाड़ फेकने के चरम वामपंथी विचार को बताती थी. उन्हें भरोसा था कि उसकी लगाई हुई आग भारत के कई गांवों तक फैल जाएगी और आखिरकार देश के कुछ शहरों और कस्बों तक पहुंचेगी. इसके बाद महिलाएं और पुरुष मतपत्रों नहीं, बल्कि गोलियों की मदद से सत्ता पर कब्जा कर लेंगे.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार द पीपुल्स डेली ने 5 जुलाई 1967 को एक बड़ा संपादकीय चलाया. इसमें नक्सल आंदोलन की गुणों को बताया गया और इसके भारतीय राज्य को गिराने की ताकत का बखान किया गया. इसमें लिखा था 'हमारे महान शासक चेयरमैन माओ ने हमें सिखाया है, सशस्त्र बल के दम पर सत्ता हासिल करना और युद्ध के जरिए मुद्दे को शांत करना क्रांति का सबसे ऊंचा रूप है.'

चीन प्रेरित नक्सल क्रांति असफल हुई. उसके तीन दशकों बाद माओवाद का फिर से जन्म दुआ. माना जाता है कि लेनिन ने कहा था, 'विश्व क्रांति की राह पेकिंग, शंघाई और कलकत्ता से होकर गुजरती है.' हालांकि, असफल होने के बाद भी नक्सल आंदोलन अपने पीछे एक अराजक चरमपंथ की एक काली विरासत छोड़ गया. एक रूप बदलते हुए वायरस की तरह यह चरमपंथ बना हुआ है और इसके नुकसान पहुंचाने वाले तरीके बार-बार सामने आते हैं.

अब अराजकता 'असंतोष' और 'विरोध' के साथ चलती है. बीआर आंबेडकर ने भारतीय गणराज्य को अराजकता की व्याकरण को लेकर चेतावनी दी थी. जरूरी नहीं है कि हैशटैग नक्सल माओ या मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से प्रेरित हो. लेकिन 1960 के पैम्फ्लैट वाले नक्सलों की तरह आज के हैशटैग नक्सल भी अलग-अलग तरीके से हिंसा को भड़काने वाले हैं. शून्यवाद एक जिद्दी कैंसर की तरह रहता है.

नक्सलों के लिए सरकार उसकी दुश्मन थी और इसके अंग, जैसे- कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधानपालिका मजाक उड़ाने वाली चीजें थीं. चुने हुए लोगों की जगह सर्वहारा वर्ग को रखा जाता था और पूंजीपतियों को दूर किया जाता था. सोशल मीडिया युग के हैशटैग नक्सल इसी तरह सोचते हैं और सरकार, संसद और न्यायपालिका की बात को अस्वीकार कर देते हैं. वे इस काम में संवैधानिक हकों की मांग भी करते हैं. अगर माओ की 'लिटिल रेड बुक' की ताकत बंदूक की नाल से निकलती थी, तो आज हैशटैग के साथ ट्वीट्स के जरिए निकल रही है.

उस समय के पूंजीपति आज का कॉर्पोरेट सेक्टर हैं. जिसका हैशटैग नक्सल के जरिए तिरस्कार किया जाना है. 1960 के दशक में भारत गरीबी, भूख और बीमारियों का सामना कर रहा था. 2021 में यह एकदम अलग भारत है. इस बात पर बहस की जा सकती है कि संविधान को लेकर लोगों के मत अलग हैं और समाज में असल में कई वर्ग है. लेकिन यह सभी लोकतंत्रों का सच होगा. फिर भी वे संसद को कम करने और न्यायपालिका को नुकसान पहुंचाने का कारण बनते हैं. इसका उदाहरण हाल ही के कुछ वर्षों में हुए आंदोलन हैं.

हम जिस विघटनकारी अराजकता के गवाह बन रहे हैं, वो भारत की वास्तविकता के विपरीत है. जहां सरकार ने बगैर किसी बाहरी मदद के 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा कोविड-19 वैक्सीन प्रोग्राम शुरू कर दिया. 1970 के दशक की शुरुआत में एक दूसरी महामारी के दौरान देश चिकनपॉक्स की वैक्सीन के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन पर निर्भर था. अब भारतीय तकनीक स्पेस साइंस पर काम कर रही है और स्वदेशी ड्रोन्स बना रही है. भारतीय लड़ाकू विमान देश की रक्षा ताकत को बढ़ा रहे हैं. भारत में जरूरत से ज्यादा भोजन पैदा हो रहा है. भारत की वजह से लाखों नौकरियां तैयार हो रही हैं. यह सूची बेहद लंबी है और तुलनाओं के बारे में सभी जानते हैं.

जैसा कि कुछ लोग तर्क देंगे हैशटैग नक्सल इन वास्तविकताओं से बेखबर है और उन लोगों का खेल खेलना चाहता है, जो देश के पटरियों पर रुका हुआ और संविधान की आड़ में अराजकता की वजह से हुए नुकसान में दबे हुए देखना चाहते हैं. कोई भी गलती न करें, यह अराजकता एक कीमत के साथ आती है, जिसमें चुकाना बेहद जरूरी है. बीते 3 महीनों में रणनीतिक ढांचे को हुए नुकसान का हिसाब नहीं लगाया जा सकता है.

संवैधानिक हकों की व्याख्या जनता जिस हवा में सांस ले रही है, उसे दूषित करने के विशेषाधिकार के रूप में लिया जा रहा है. यह बात गणतंत्र दिवस के जश्न में विघ्न डालने और लाखों लोगों को हुए कष्ट की परवाह किए बगैर उसके बचाव की ओर जाती है. राजनीतिक अभिनेताओं की तरफ से उनके डिजिटल कॉमरेड्स को आर्थिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाना, दिमाग सुन्न करने वाला था.

1690 में हैशटैग नक्सल अराजकता का बखान करने वाला पीपुल्स डेली आज का ग्लोबल टाइम्स है. यह लिखता है 'महामारी को काबू करने और आर्थिक बढ़त को बरकरार रखने में मोदी सरकार असफल हो गई है. घरेलू असंतोष बढ़ रहा है. यह बताया जा रहा है कि अलग-अलग भारतीय राज्यों से हजारों किसान कई हफ्तों से नई दिल्ली के बाहरी इलाकों में डेरा जमाए हुए हैं.'

मोहनदास करमचंद गांधी के सत्याग्रह को याद करना और उसे हमारे समय के विद्रोह की महात्मा के विरोध से तुलना करना बेवकूफी है. वह भी अराजकता का वैध बनाने की मांग करते हुए. गांधी ने अपने कई प्रदर्शनों में कोलोनियल, बगैर चुने हुए और बगैर प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार का विरोध करने के लिए सच को हथियार बनाया था. अब जो हम देख रहे हैं, वह है ट्वीट्स और हैशटैग्स के जरिए सड़कों पर अशांति फैलाकर बैलट की नतीजों को बदलने का प्रयास है.

(कंचन गुप्ता एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
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