हाथ से निकलती जमीन...और ये बड़े खतरे की आहट है!

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Updated: September 11, 2019, 3:05 PM IST
हाथ से निकलती जमीन...और ये बड़े खतरे की आहट है!
देश में खेती लायक जमीन का कम होना चिंता का विषय है. इसके परिणाम घातक हो सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मरुस्थलीकरण (Deserts) की प्रक्रिया पूरे इतिहास में होती रही है, लेकिन चिंताजनक बात यह है कि हाल के दशकों में इसकी गति ऐतिहासिक दर से 30 से 35 गुना तेज हो गई है. संयुक्त राष्ट्र (United Nation) का अनुमान है कि हर साल करीब 12 मिलियन हेक्टेयर जमीन मानव निर्मित रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है.

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हर साल मॉनसून के दौरान हेमंत वामन चौरे को एक विकट समस्या का सामना करना पड़ता है. एक तरफ वह चाहते हैं कि बारिश आए, ताकि उनकी फसलों को पानी मिल सके. लेकिन, दूसरी तरफ वह इससे डरे हुए भी रहते हैं क्योंकि बरसात की रिमझिम फुहार भर से उनके खेतों में लगी पौध बर्बाद हो सकती है.
महाराष्ट्र के धुले जिले में स्थित सकरी ब्लॉक के दरेगांव में रहने वाले 35 वर्षीय चौरे का 1.5 हेक्टेयर खेत सह्याद्री पर्वत शृंखला के आखिर में हल्की ढलान पर है. यह क्षेत्र बंजर जमीन और पेड़ों की कमी के लिए जाना जाता है. चौरे के खेत के आसपास सारे इलाके में मिट्टी की सतह काफी उथली है. यहां औसतन सालाना बरसात रेगिस्तानी राज्य राजस्थान से महज थोड़ा-सी अधिक 674 मिमी होती है. जब भी बारिश होती है, तो पहाड़ी ढलानों से बहता हुआ पानी मिट्टी की ऊपरी परत को धुलते हुए खेत के पौधों को भी बहा ले जाता है. चौरे बताते हैं, '2018 में मुझे दो बार पौधे रोपने पड़े. पहले मैंने सोयाबीन लगाई. लेकिन, जब वह बह गई तो मुझे बाजरा (मोती बाजरा) की फसल लगानी पड़ी.'

पड़ोसी वर्धार्णे गांव में रहने वाले विलास राजारात गवली भी अपने खेत में मौजूद एक छेद दिखाते हैं जो किसी लोमड़ी की मांद जैसा दिखाई देता है. 22 जुलाई, 2019 को जब डाउन टू अर्थ ने सकरी ब्लॉक का दौरा किया, तब तक इस क्षेत्र में 100 मिमी से कुछ ही ज्यादा बारिश हुई थी. गवली कहते हैं, 'इस बार महज 10 फीसदी ही बारिश हो सकी है. इसके बावजूद आप इन छेदों को हर जगह देख सकते हैं. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस सीजन के आखिर तक यहां क्या हालात होंगे. मिट्टी की ऊपरी परत पूरी तरह से बह जाएगी.'



संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के अनुसार, ये मरुस्थलीकरण के स्पष्ट संकेत हैं. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शुष्कभूमि अपनी उत्पादकता खो देती है. इसमें पौधों को सहारा देने, अन्न उत्पादन करने, आजीविका उपलब्ध कराने की जमीन की क्षमता खत्म होने लगती है. पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं जैसे कि जल प्रबंधन प्रणाली और कार्बन के भंडारण पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है. इन कारणों के चलते जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है. हालांकि, मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया पूरे इतिहास में होती रही है, लेकिन चिंताजनक बात यह है कि हाल के दशकों में इसकी गति ऐतिहासिक दर से 30 से 35 गुना तेज हो गई है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि हर साल करीब 12 मिलियन हेक्टेयर जमीन मानव निर्मित रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है. दुनिया की कुल कृषि योग्य भूमि का एक चौथाई हिस्सा अत्यधिक निम्नीकृत (डिग्रेडेड) हो चुका है. अधिकतर शुष्कभूमि (दुनिया भर में करीब 72 फीसदी) में बहुत कम और अनियमित वर्षा होती है. खासकर विकासशील देशों में ये जगहें मरुस्थलीकरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं. एशिया और अफ्रीका की लगभग 40 फीसदी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रह रही है, जहां लगातार मरुस्थलीकरण का खतरा बना हुआ है. इनमें से अधिकतर लोग कृषि और पशुओं के पालन-पोषण पर निर्भर हैं.

भारत के लिए स्थितियां विशेष रूप से अधिक चिंताजनक हैं, जहां विश्व की आबादी की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या और 15 प्रतिशत पशुओं को आश्रय मिलता है. दुनिया के कुल भूभाग के महज 2.4 फीसदी क्षेत्र वाले इस देश पर 195 मिलियन कुपोषित लोगों के साथ ही वैश्विक भुखमरी के एक चौथाई हिस्से का बोझ भी है.


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हाल ही में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान, नई दिल्ली से भारत में भूमि निम्नीकरण अथवा क्षरण से हो रहे नुकसान का आकलन करने के लिए कहा. अध्ययन के बाद लगाए गए अनुमान के मुताबिक, भूमि निम्नीकरण की वजह से देश के राजकोष को 48.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की चपत लग रही है. यह 2014-15 में भारत की जीडीपी के लगभग 2.08 फीसदी के बराबर है, जबकि उसी वर्ष के कृषि और वानिकी क्षेत्रों के सकल मूल्य से यह 13 प्रतिशत से भी अधिक है.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) द्वारा प्रकाशित मरुस्थलीकरण एवं भूमि निम्नीकरण एटलस के मुताबिक, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 30 फीसदी हिस्सा (लगभग 96.40 मिलियन हेक्टेयर) निम्नीकरण की चपेट में है. 228.3 मिलियन हेक्टेयर यानी देश की कुल भूमि के 70 फीसदी हिस्से में फैले शुष्क भूमि वाले क्षेत्र में से 82.64 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर मरुस्थलीकरण हो रहा है. यह भारत के कुल भूभाग का करीब एक चौथाई हिस्सा है. 76 में से 21 सूखाग्रस्त जिलों और लेह जिले के 2 उप-बेसिन में 50 फीसदी से अधिक क्षेत्र में निम्नीकरण हो रहा है.
एसएसी की तरफ से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, 2003-05 और 2011-13 के बीच, महज 8 वर्षों में ही मरुस्थलीकरण और भूमि निम्नीकरण की प्रक्रिया में क्रमश: 1.16 मिलियन हेक्टेयर और 1.87 मिलियन हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की गई. नौ जिलों में भूमि निम्नीकरण की दर में 2 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई. तुलनात्मक तौर पर, यूरोपीय संघ की तरफ से तैयार किए गए विश्व मरुस्थल मानचित्र के आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया भर में 1950 के दशक के बाद से शुष्क भूमि में लगभग 0.35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में सवाल उठते हैं कि आखिर भारत में इतनी तेजी से बढ़ते मरुस्थलीकरण की वजह क्या है? कृषि पर निर्भर देश के 61 फीसदी से अधिक लोग इस चुनौती से कैसे निपटें? ऐसे समय में, जब देश जलवायु से संबंधित तीव्र घटनाओं जैसे कि लू, बार-बार पड़ रहे सूखे, अत्यधिक बारिश और भीषण चक्रवातों का सामना कर रहा है, तो क्या जैव विविधता इसका सामना करने में सक्षम है? इन सवालों के जवाब खोजने के लिए डाउन टू अर्थ ने देश भर में भूमि निम्नीकरण वाले प्रमुख क्षेत्रों की यात्रा की.

धुले, महाराष्ट्र
धुले में पशुओं की बढ़ी संख्या का नतीजा जंगलों की बर्बादी के तौर पर सामने आया और इससे वहां भू-क्षरण बढ़ा. इस जिले में 64.2 फीसदी जमीन निम्नीकरण की चपेट में है और 5,200 हेक्टेयर भूमि महज 8 वर्षों में निम्नीकृत हो गई. धुले कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक एमएस महाजन बताते हैं कि जिले का एक बड़ा हिस्सा डेक्कन ट्रैप के नाम से चर्चित क्षेत्र में आता है, जहां लाखों वर्षों पहले ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बनीं बेसाल्ट चट्टाने हैं. यहां मिट्टी की ऊपरी परत बहुत उथली (लगभग 23 सेमी) है. मिट्टी की हल्की भेद्यता और अत्यधिक कम बारिश की वजह से यहां साल में वर्षा आधारित सिर्फ एक फसल और छोटी वनस्पतियां उगा पाना ही संभव हैं.



महाराष्ट्र वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, धुले के 7,195 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 28 प्रतिशत भाग वन विभाग के अधीन है. लेकिन, 2017 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित नवीनतम 'स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' के मुताबिक, केवल 308 वर्ग किमी या 4.2 प्रतिशत क्षेत्र में ही वन आच्छादित हैं. सतपुड़ा रेंज में आने वाले जिले के उत्तरी इलाकों में भी मध्यम स्तर का जंगल सिर्फ 69 वर्ग किमी तक सीमित है. अतिरिक्त 108 वर्ग किमी क्षेत्र झाड़ भूमि (स्क्रबलैंड) है.

जंगलों के इन छोटे-छोटे टुकड़ों पर जबरदस्त दबाव है. नाम न बताने की शर्त पर एक वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'इस इलाके में भैंसों की संख्या करीब 15 गुना बढ़ गई है. 2003 में इनकी संख्या 6,000 थी, जो 2011 में एक लाख पार कर गई.' हर साल गर्मियों में इन जंगलों में आग लगा दी जाती है, ताकि बरसात शुरू होने के बाद जमीन घास से भर जाए.

सतपुड़ा के उत्तरी ढलान पर जंगलों में सागौन और ऐसे ही दूसरे व्यावसायिक महत्व वाले पेड़ हैं. वन विभाग हर साल इन पेड़ों को काटने के लिए परमिट देता है. ऐसे ही परमिट के जरिए 2005 से 2014 के बीच एक लाख से अधिक पेड़ काट दिए गए. वहीं, 0.26 मिलियन पेड़ अवैध रूप से काटे गए. वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, '2008 से 2010 के बीच का समय इस लिहाज से सबसे बुरा था. इस दौरान कानूनी तरीके से कहीं ज्यादा पेड़ अवैध तरीके से काटे गए.'

धुले में यह एक बड़ी समस्या रही कि अजैविक और जैविक दोनों तरह के दबावों के चलते नए जंगल पनप नहीं सके. जंगल की आग ने मौजूदा पेड़ों की सेहत बिगाड़ दी और नए बीजों को अंकुरित होने से रोक दिया. महाराष्ट्र रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर, नागपुर के एसोसिएट साइंटिस्ट प्रशांत राजेनकर कहते हैं, 'बारिश के साथ अब हालात बहुत खराब होने वाले हैं. मरुस्थलीकरण एटलस तैयार करने के लिए प्रशांत ने ही धुले की सैटेलाइट मैपिंग और जमीनी सत्यापन किया था. वह बताते हैं, 'क्षेत्र के अधिकतर हिस्से में बारिश की वजह से मिट्टी की ऊपरी परत का कटाव हो रहा है. इसका मतलब यह है कि धीरे-धीरे यहां की मिट्टी की ऊपरी परत खत्म हो रही है.' एटलस के अनुसार जिले में 34.95 फीसदी भूमि निम्नीकरण के लिए वनस्पति क्षरण जिम्मेदार है, इसके बाद 23.75 फीसदी निम्नीकरण जल क्षरण की वजह से होता है.
धुले के कुछ हिस्सों में भू-क्षरण की दर बहुत ज्यादा है. नागपुर स्थित राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो ने भू-क्षरण को लेकर एक सैटेलाइट मैप आधारित ऐप भूमि विकसित किया है. इस ऐप के मुताबिक सतपुड़ा पर्वत शृंखला के आसपास को छोड़कर जिले के अधिकतर हिस्सों में मध्यम से अत्यधिक गंभीर स्तर का भू-क्षरण हो रहा है. सकरी ब्लॉक में भू-क्षरण की स्थिति तीव्र से लेकर अत्यधिक तीव्र के मध्य पाई गई है. यहां प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर 20 टन से 80 टन तक मिट्टी की ऊपरी परत का क्षरण हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार 2.9 टन प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर के वैश्विक औसत की तुलना में यह काफी ज्यादा है.

गिरिडीह, झारखंड
धुले की तरह ही झारखंड के अधिकांश हिस्सों में मिट्टी के कटाव के लिए लहरदार भौगोलिक स्थिति एक प्रमुख कारक है. 2015 में झारखंड पर नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है, 'राज्य की लहरदार भौगोलिक स्थिति और बारिश आधारित कृषि ने मिट्टी के भारी निम्नीकरण, विविध कृषि पद्धतियों और कम उत्पादकता को बढ़ावा दिया है. झारखंड राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और गोवा के अलावा उन पांच राज्यों में एक है, जहां एसएसी के एटलस के अनुसार, कुल भौगोलिक क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा बंजर और भू-निम्नीकरण के अंतर्गत आता है.



झारखंड के गिरिडीह जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का सर्वाधिक 73.79 प्रतिशत हिस्सा भूमि के निम्नीकरण की चपेट में है. यह धनबाद के खनन वाले इलाके का हिस्सा है, जहां देश में सबसे अधिक कोयला खदान के पट्टे (131) हैं और 500 से अधिक छोटी खनिज खदानें हैं. परिचालित या चालू लघु खनिज पट्टों के मामले में गिरिडीह राज्य में तीसरे स्थान पर है, जबकि धनबाद जिले से सटे क्षेत्र में कोयला खदान के पट्टों की संख्या सबसे अधिक (56) है. 2005 और 2017 के बीच की 'वन राज्य' रिपोर्ट से पता चलता है कि गिरिडीह के कुल भौगोलिक क्षेत्र की तुलना में जंगल के क्षेत्रफल का प्रतिशत थोड़ा बढ़ा है. यह 2005 में 820 वर्ग किमी था, जो 2017 में 890 वर्ग किमी हो गया. जबकि, 'ओपन फॉरेस्ट' (10-40 प्रतिशत के बीच आच्छादित घनत्व) की कीमत पर बहुत घने वन क्षेत्र में (आच्छादित घनत्व 70 प्रतिशत से अधिक) गिरावट आई है. बेहद घना वन क्षेत्र 98 वर्ग किमी से घटकर 77 वर्ग किमी रह गया है. 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में शहरों की संख्या 152 थी, जो 2011 की जनगणना के अनुसार 228 हो गई. इसका प्रभाव पूरे जिले भर में देखा जा सकता है.

गिरिडीह ब्लॉक में स्थित बरकीटांड़ गांव के सूरजमुनि हस्दा कहते हैं, 'मॉनसून आने के साथ ही हर साल हमारे गांव में 70 से अधिक परिवारों के बीच पानी के लिए टकराव शुरू हो जाता है.' 10 वर्षों के भीतर गांव के सभी कुएं और नलकूप सूख चुके हैं. केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि पूरे ब्लॉक में भूजल स्तर 2013 में 8 मीटर से गिरकर 2017 में लगभग 10 मीटर तक नीचे चला गया है. गांव के उप-प्रधान जमील किस्के का कहना है कि 2009 में जब गांव का आखिरी हैंडपंप सूख गया, तो स्कूल परिसर में लगभग 100 मीटर की गहराई के साथ एक नया हैंडपंप लगाया गया. 'अब यह भी सूखता जा रहा है.' स्कूल के एक शिक्षक साइरिल मरांडी कहते हैं कि स्कूल में बच्चों की संख्या कम है, क्योंकि पानी की कमी के कारण स्कूल मिड-डे मील नहीं दे पा रहे हैं. वह कहते हैं, 'यहां तक कि पानी की कमी के कारण इलाके में निर्माण कार्य रुका हुआ है और इससे निर्माण की लागत बढ़ती जा रही है.'

गिरिडीह के जिला कृषि अधिकारी धीरेंद्र कुमार पांडे का कहना है, '2015-16 से परती भूमि योजना के अंतर्गत, हम किसानों को खेती के लिए 2,400 रुपए प्रति हेक्टेयर का प्रोत्साहन दे रहे हैं.' लेकिन मौजूदा समय में जब कृषि गैर-लाभकारी हो चुकी है, तो कुछ लोग ही इस योजना का लाभ उठाने के लिए आगे आते हैं.

गोवा
खनन और बढ़ते शहरीकरण ने गोवा जैसी जगहों में भी भूमि क्षरण को बढ़ावा दिया है. यहां पूरे साल आर्द्र जलवायु बनी रहती है और सालाना औसतन 2,500 मिमी वर्षा होती है. भारत के इस सबसे छोटे राज्य के दो जिलों में से एक उत्तर गोवा के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 50 प्रतिशत से अधिक इलाका भूक्षरण के तहत आता है. वनस्पति आवरण नहीं होने की वजह से लगभग 43 प्रतिशत क्षेत्र भूक्षरण का शिकार है. इस जिले में राज्य की लगभग 50 प्रतिशत खानें हैं. गोवा के खान भूविज्ञान निदेशालय के अनुसार, 2011 में जब इस एटलस के लिए मूल्यांकन शुरू हुआ, तो जिले की अधिकांश खदानें केवल दो तालुकाओं बिचोलिम (27 खान) और सत्तारी (11 खान) में मौजूद थीं.

2012 में दो रिपोर्टों ने उच्चतम न्यायालय को राज्य में पहली बार खनन रोकने के लिए बाध्य किया. उन दोनों रिपोर्ट में राज्य के खनन क्षेत्र के बारे में कुछ गंभीर खुलासे किए गए थे. शाह आयोग ने संकेत दिया कि लगभग 2,800 हेक्टेयर में अतिक्रमण किया गया था, जिसमें से 578 हेक्टेयर में सक्रिय रूप से खनन चल रहा था. गोवा में 2010 में 124 खान संचालित थे और इनमें से किसी को भी राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से मंजूरी नहीं मिली थी. 33 खानों का संचालन निकटतम राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य या संरक्षित क्षेत्रों की सीमा से एक किलोमीटर के भीतर हो रहा था. सेंट्रल एम्पावर्ड कमिशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे राज्य भर में करीब 750 मिलियन टन कचरे (मिट्टी) का बोझ फैल गया. इनमें से ज्यादातर खनन पट्टे वाले क्षेत्रों के बाहर थे.

बिचोलिम के बाहर खनन विरोधी कार्यकर्ता रमेश गौंस का कहना है कि जब बारिश होती है, तो खदानों के आसपास का क्षेत्र खनन वाली मिट्टी से लाल हो जाता है. वह कहते हैं, 'ढाई से तीन टन मिट्टी की खुदाई से एक टन अयस्क निकलता है. यह मिट्टी ज्यादातर राजस्व और कृषि भूमि पर खदान के पट्टे वाले क्षेत्र के बाहर डाली जाती है.'


आधिकारिक तौर पर, 2006 और 2012 के बीच लगभग 1,513 हेक्टेयर जंगल काट दिए गए. हालांकि, अवैध खनन के कारण वनों की कटाई का कोई आंकड़ा नहीं है. पर्यावरण समूह फेडरेशन ऑफ रेनबो वॉरियर्स के अभिजीत प्रभुदेसाई कहते हैं, 'गोवा वन विभाग संरक्षित क्षेत्रों के बाहर जंगल के 50 प्रतिशत हिस्से को जंगल नहीं मानता. गोवा के अपने वन आंकड़े भारत के वन सर्वेक्षण के आंकड़ों के साथ मेल नहीं खाते.'

गोवा बचाओ अभियान की सचिव रेबोनी साहा कहती हैं, 'गोवा के अधिकांश राजनेताओं ने जमीन के बड़े-बड़े पट्टे खरीदे हैं, ताकि उन्हें रियल एस्टेट और पर्यटन के लिए विकसित किया जा सके. अगर उन्हें वन क्षेत्र घोषित कर दिया जाए, तो उनकी योजना विफल हो जाएगी.' साहा का कहना है कि गोवा में शहरीकरण काफी तेज गति से बढ़ रहा है और सरकार व्यावसायिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए आसान से भूमि उपयोग को बदलने की अनुमति दे रही है.

योजनाओं की कमी की वजह से गोवा में भूमि का सबसे बड़ा क्षरण हो सकता है और यह भूक्षरण के मामले में खनन से आगे निकल सकता है. उदाहरण के तौर पर प्रस्तावित हवाई अड्डे के लिए मोपा क्षेत्र का उदाहरण लें. परियोजना को लेकर पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर किए गए आकलन के मुताबिक, वन विभाग को उस क्षेत्र में कोई पेड़ नहीं मिला. लेकिन बाद में, एक अदालती मामले पर कार्रवाई करते हुए विभाग को 54,676 पेड़ मिले. प्रभुदेसाई का कहना है कि केंद्र ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी. बॉटेनिकल सोसायटी ऑफ गोवा के पूर्व अध्यक्ष माइगल ब्रागांका कहते हैं कि 1990 के दशक के अंत में एक बार जब हवाई अड्डे की घोषणा की गई, तो कई राजनेताओं ने सस्ते में 10-15 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से जमीनें खरीदीं. इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्से में पेड़ थे, आज आपको उस क्षेत्र के आसपास गंभीर क्षरण देखने को मिलेगा.



कोहिमा, नागालैंड
मॉनसूनी जलवायु व उच्च आर्द्रता स्तर के लिए जाने जाने वाले नागालैंड को वनों की कटाई और बढ़ती आबादी के कारण भूमि निम्नीकरण का सामना करना पड़ रहा है. इस क्षेत्र में भूमि निम्नीकरण की कोई आशंका नहीं थी. लेकिन, निम्नीकरण एटलस के अनुसार यह राज्य उन 5 राज्यों में से एक है, जहां भूमि निम्नीकरण की दर भयावह हो चुकी है. कोहिमा के 62.43 प्रतिशत क्षेत्र पर निम्नीकरण का खतरा मंडरा रहा है. अधिकारी इसके लिए तुरंत झूम खेती को जिम्मेदार ठहराते दिखाई देते हैं, जिसमें लोग खेती की जमीन तैयार करने के लिए पेड़ काट कर जला देते हैं.

नागालैंड जीआईएस और रिमोट सेंसिंग केंद्र के डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर, मेरिंनवापांग कहते हैं कि सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से साफ पता चलता है कि महज 10 वर्षों में पूर्वी कोहिमा ने जंगल का एक बड़ा हिस्सा झूम कृषि की वजह से खो दिया. भूमि संसाधन विभाग के अपर निदेशक टी रेनबेन लोथा के अनुसार, इस राज्य में झूम कृषि के लिए हर साल लगभग 20,000 हेक्टेयर जंगल काट दिया जाता है. नागालैंड के मृदा और जल संरक्षण विभाग की 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट भी कहती है कि पहाड़ी क्षेत्रों में झूम कृषि के व्यापक अभ्यास से औसतन प्रति हेक्टेयर 30.62 टन भूमि क्षेत्र का नुकसान होता है. यह रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि झूम कृषि भूक्षरण के रूप में मुख्य कृषिभूमि और वनों को भी बर्बाद करती है. इस रिपोर्ट के अनुसार, पूरे राज्य में 61 प्रतिशत परिवार लगभग 10 लाख हेक्टेयर जमीन के साथ स्थानांतरण कृषि पद्धति से जुड़े हुए हैं. यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 5.65 प्रतिशत हिस्से के लिए भूक्षरण के खतरे को बढ़ा देता है.

कोहिमा के केजोका गांव में रहने वाले 36 वर्षीय किसान विमेचो मेक्रो कहते हैं, 'मैं स्थानांतरण कृषि के अलावा किसी और तरीके से आजीविका कमाना नहीं जानता.' पिछले साल दिसंबर में वह जंगल के एक नए भाग में स्थानांतरित हो गए थे और इसके लगभग 0.8 हेक्टेयर हिस्से को खाली कर दिया था. उन्होंने लकड़ी बाजार में बेची और झाड़-झंखाड़ में आग लगा दी. कुछ हफ्तों बाद, उस भाग पर मक्का, ककड़ी, और फलियां बोईं और एक बढ़िया फसल उपजाई. वह आगे कहते हैं कि आमतौर पर तीन से चार फसल ऋतु के बाद उपज कम हो जाती है. इसके बाद वह दूसरे जंगल चले जाएंगे. उन्होंने बताया कि जंगल काटकर और जला कर की जाने वाली यह कृषि उनके समुदाय की पारंपरिक कृषि पद्धति है.

लोथा कहते हैं कि भूमि उपयोग के बदलते तरीकों, जनसंख्या के दबाव और अनिश्चित जलवायु की वजह से कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं. 10 साल पहले एक झूम चक्र को पूरा होने में 15 से 20 साल लगते थे. अब किसान केवल 5 से 6 वर्षों में जंगल के उसी भाग पर वापस चले जाते हैं, जबकि भूमि के लिए अपनी उर्वरता वापस हासिल करने के लिए इतना समय पर्याप्त नहीं है. इसके अलावा, तेजी से लुप्त हो रहे वानस्पतिक आवरण की वजह से भी इस राज्य में भूक्षरण तीव्र गति से हो रहा है.


अनन्तपुरमु, आंध्र प्रदेश
बार-बार सूखे की वजह से बदनाम आंध्र प्रदेश के अनन्तपुरमु जिले में भूक्षरण ने एक दुष्चक्र बना रखा है. इस जिले में हमेशा से पानी की अनिश्चितता और सूखे की स्थिति बानी रही है. लेकिन हाल के दशकों में इस क्षेत्र में बहने वाली हवाएं कुछ ज्यादा गर्म और भयंकर हो गई हैं. जबकि बारिश काफी कम और अनियमित हो गई है. जमीन के नीचे का पानी तो बिलकुल ही गायब हो गया है.
दरगाह होन्नुर गांव में रहने वाली 75 वर्षीय बी टिप्पा का करीब दो हेक्टेयर का खेत बालू टीले के समीप है. टिप्पा को नहीं पता कि हवा से कैसे बचाव किया जाए. शाखाओं और टहनियों के साथ बड़े करीने से बंधी बाड़ की तरफ इशारा करते हुए वह कहती हैं, 'मैं नहीं जानती कि मेरी बाड़ कितने लंबे समय तक फसल को रेत में दबने से बचा सकती है.' टिप्पा ने अपने भूभाग का एक बड़ा हिस्सा रेत के बढ़ते टीलों की वजह से खो दिया है.

दरगाह होन्नुर कोई मरुस्थल नहीं है. अनंतपुरमू की एक गैर-लाभकारी संस्था, एएफ इकोलॉजी सेंटर के मल्ल रेड्डी ने रेत के टीलों की उत्पत्ति पर अध्ययन किया है. वह कहते हैं कि गांव में रेत के टीले एक प्राकृतिक आपदा का परिणाम हैं, जिसकी वजह से लंबे समय से सूखी पड़ी वेदवती नदी का रिवरबेड स्थानांतरित हो गया. अंतत: हवा और पानी के कटाव के कारण रेत के टीलों का निर्माण हुआ. आज, गांव का लगभग 2,000 हेक्टेयर भूभाग रेत के टीलों से घिरा है, जिसकी वजह से युवा इसे 'स्थानीय राजस्थान' कहने लगे हैं और फिल्म निर्माता मरुस्थल के दृश्यों के लिए जगह तलाशने आने लगे हैं.

टिप्पा का दावा है कि वहां रेत के टीले उनके दादा के जमाने से मौजूद रहे हैं, लेकिन उस समय पेड़ों और झाड़ियों से आच्छादित होने के कारण वे स्थिर थे. रेतीले तूफान हालिया घटनाएं हैं. जगह बदलते रेत के टीलों की वजह से टिप्पा के खेत के केवल एक ही हिस्सा प्रभावित हुआ है, कइयों के तो पूरे के पूरे खेत इन टीलों ने निगल लिए हैं. ऐसे ही लोगों में से एक गांव में किराने की दुकान के मालिक 63 वर्षीय केसी नारायणस्वामी हैं. उन्होंने कुछ दशक पहले अपनी 0.8 हेक्टेयर उत्पादक भूमि के रेत के टीलों की वजह से बर्बाद हो जाने के बाद अपना पेशा बदल लिया. नारायणस्वामी कहते हैं, 'मेरे पास अपने पिता के साथ अपनी जमीन पर काम करने की यादें आज भी ताजा हैं, लेकिन धीरे-धीरे रेतीले तूफानों ने इसे बंजर बना दिया.'

आचार्य एनजी रंगा कृषि विश्वविद्यालय के मृदा वैज्ञानिक केसी नटराज कहते हैं, 'मिट्टी की गुणवत्ता साल दर साल बिगड़ती जा रही है. हमें साल में जितनी वर्षा प्राप्त होती है, उससे कहीं अधिक नमी खो रहे हैं.' मिट्टी की खराब गुणवत्ता का एक कारण इस क्षेत्र में घटती बारिश है. 2017 में 25 वर्षों (1988-2012) के अध्ययन ने दर्शाया है कि जिले में शुष्कता बढ़ रही है. नमी सूचकांक (एमआई), जो मिट्टी में नमी की मात्रा को इंगित करता है और फसलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिले के सभी 63 मंडलों में -67.4 से -84.7 के बीच रहता है. नमी सूचकांक का इतना कम होना प्राप्त वर्षा का संभावित वाष्पीकरण की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होने कि तरफ इशारा करता है.

किन्नौर, हिमाचल प्रदेश
किन्नौर जिले के चांगो गांव की 45 वर्षीय किसान संतोषी नेगी एक ऐसी समस्या से जूझ रही हैं जिसके बारे में वह कुछ साल पहले तक कुछ नहीं जानती थीं. 'क्या यहां लाल मकड़ी के घुन के लिए कोई कीटनाशक मिलता है? यह सवाल वह गांव में हाल ही में स्थापित बागवानी कार्यालय में काम कर रहे एक अधिकारी से पूछती हैं. जवाब न में सुनकर वह 40 किमी दूर पूह में स्थित ब्लॉक मुख्यालय जाती हैं. नेगी अपने 0.5 हेक्टेयर सेब के बाग को बचाने के लिए क्लोरपाइरीफोस की खोज में हैं, जो एक ऑर्गनोफॉस्फेट कीटनाशक है और कई देशों में प्रतिबंधित है. वह कहती हैं कि, 'कीट से लगभग 40 पेड़ संक्रमित हो गए हैं.' आगे जोड़ते हुए वह बताती हैं कि हाल के छह से सात वर्षों में कीटों द्वारा हुए नुकसान में काफी बढ़ोतरी हुई है. आमतौर पर घुन मिट्टी में रहते हैं और जड़ों पर हमला करते हैं. इसके बाद जल्द ही पौधा खराब होने लगता है. पिछले एक दशक में कीटनाशकों और उर्वरकों पर उसका निवेश 4,000 से बढ़कर 25,000 रुपए प्रति वर्ष हो गया है.

पूह में रहने वाले 62 वर्षीय किसान देविंदर सिंह लोक्टस इस विकट समस्या की वजह बताते हैं, 'सेब के पेड़ों की जड़ों को स्वस्थ रखने के लिए मिट्टी में अच्छी नमी की आवश्यकता होती है. लेकिन हाल के वर्षों में कम बर्फबारी के कारण इसमें भी कमी आई है. यहां तक कि पर्माफ्रॉस्ट, जो साल-दर-साल मिट्टी में नमी बनाए रखती थी, अब वह भी घट रही है.' उनके बाग में सेब के पेड़ स्टेम बोरर, वूली एफिड्स और रेड स्पाइडर माइट्स जैसे तमाम कीटों के शिकार हैं.


कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग पहाड़ के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ रहा है. इसकी वजह से लेडीबर्ड बीटल और ग्रीन लेसविंग बग की जान भी जा रही है, जो कीटों के प्राकृतिक शिकारी हैं. अधिकांश किसानों को इसके बारे में जानकारी नहीं दी जाती है और न ही उन्हें रोका जाता है. किसानों को यह तथ्य भी नहीं बताया जाता कि उनके जिले में भूमि का तेजी से निम्नीकरण हो रहा है. जिले का 72 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मरुस्थलीकरण और निम्नीकरण के दौर से गुजर रहा है. नंगे ऊंचे पहाड़, जो कभी बर्फ से ढके रहते थे, अब हरे-भरे दिखते हैं और सेब के बागों व मटर के खेतों से सजे हुए हैं. जुनिपर पेड़, देवदार, जंगली खुबानी और रोबिनिया स्यूडोसेकिया जैसे स्वदेशी पेड़ अब बमुश्किल ही कहीं दिखाई पड़ते हैं.

स्थानीय निवासियों का कहना है कि हाल के वर्षों में बढ़ते तापमान के साथ, अब ऊपरी किन्नौर भी सेब के लिए उपयुक्त हो गया है. लेकिन, बढ़ते तापमान के साथ इस क्षेत्र में एक और जलवायु परिवर्तन देखा गया है. हिमपात में खतरनाक तरीके से कमी दर्ज की गई है. इसका असर मिट्टी की नमी पर पड़ा है. दूसरी ओर, बारिश की तीव्रता बढ़ गई है, जिससे मिट्टी का क्षरण बढ़ रहा है. पूह ग्राम पंचायत के उप ग्राम प्रधान सुशील शहाना कहती हैं, 'सेब के पेड़ों को पानी की ज्यादा जरूरत होती है, इसलिए पिछले एक दशक में ऊपरी किन्नौर में जल आपूर्ति की मांग भी बढ़ी है.'

इस साल मई में पानी की किल्लत इतनी बढ़ गई कि लोगों ने अपने बागों के लिए दूर-दराज के झरनों से पानी लाने के लिए ट्रकों को लगा दिया. पंचायत सदस्यों ने 45 लाख रुपए की लागत वाली की एक परियोजना के लिए पहल की, ताकि जनरेटर और पाइप का इस्तेमाल करके सतलुज नदी से पानी लाया जा सके. लेकिन, भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो जाने के कारण यह योजना असफल रही. शहाना बताती हैं, '19 वीं सदी के अंत में, पानी की किल्लत की वजह से हमारे पूर्वजों को ऋषिडोगरा गांव छोड़का पूह में बसना पड़ा था. अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो हमें भी पलायन करने को मजबूर होना पड़ सकता है.'

कच्छ, गुजरात
'जब सड़कें, बिजली और दूसरी कोई सुविधा नहीं थी, तब हमारे पास ‘माल’ था.' कच्छ के बगारिया गांव के कुबेर करमकांत जाट के लिए ‘माल’ का मतलब मवेशियों से है. पुराने दिनों की यादों में खोए कुबेर बताते हैं, 'पहले घास के मैदानों की कमी नहीं थी, मवेशियों के लिए भरपूर चारा था. मवेशी दूर-दूर तक चरने जाते थे. लेकिन अब कुछ नहीं बचा.'

कुबेर मालधारी घुमंतू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. यह समुदाय भूमि क्षरण अथवा मरुस्थलीकरण से सबसे बुरी तरह प्रभावित है. समुदाय के मवेशी 2,617 वर्ग किलोमीटर में फैले बन्नी घास के मैदानों पर सदियों से आश्रित रहे हैं. कभी एशिया के सबसे अच्छे और प्राकृतिक घास के मैदानों में शुमार यह मैदान अब बबूल (स्थानीय भाषा में गंदो बबूल और पागल बबूल) के जंगल में तब्दील होते जा रहे हैं. 1960-61 में योजना आयोग की सलाह पर सरकार ने 31,550 हेक्टेयर क्षेत्र में बबूल के बीजों का हेलिकॉप्टर से छिड़काव कराया था. मकसद का जमीन खारापन को बढ़ने से रोकना. भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, यह काम सामाजिक आर्थिक और पर्यावरण पर प्रभाव के आकलन के बिना किया गया. बीज उस जगह भी डाल दिए गए जहां की जमीन में खारापन नहीं था अथवा कम खारापन था. धीरे धीरे से बबूल कच्छ के घास के मैदानों में भी फैल गए. गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेजर्ट इकॉलोजी के निदेशक विजय कुमार बताते हैं, '2009 में 33 प्रतिशत क्षेत्र इसके दायरे में था जो 2015 में बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया. जैसे जैसे इसका दायर बढ़ रहा है, घास के मैदान सिकुड़ते जा रहे हैं.'

घास की कमी इस हद तक हो गई है कि अपने दूध के लिए मशहूर बन्नी भैंस के लिए चारा भी बाहर से लाना पड़ रहा है. कुबेर बताते हैं कि हमें वलसाड से 100 किलो घास मंगाने के लिए 1,600 रुपए देने पड़ते हैं. वह घास भी प्राकृतिक नहीं होती. इससे दूध की गुणवत्ता पर असर पड़ा है. पहले दूध में 8-10 प्रतिशत वसा निकलता था जो पिछले दो तीन सालों में घटकर 4-5 प्रतिशत ही रह गया है. इससे समुदाय को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है क्योंकि जो दूध पहले 40-45 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से बिकता था, वह अब 30-35 रुपए में बिक रहा है.


गुजरात उन पांच राज्यों में शामिल है जहां की 50 प्रतिशत से अधिक भूमि मरुस्थलीकरण अथवा क्षरण की शिकार है. राज्य के कच्छ, सुरेंद्रनगर, पंचमहल, साबरकांठा और भावनगर में वनस्पति और मिट्टी की ऊपरी परत का बड़े पैमाने पर क्षरण हुआ है. यह क्षरण प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों का नतीजा है.
राज्य में पर्यावरण संरक्षण पर काम करने वाले गैर सरकारी संगठन सहजीवन के कार्यकारी निदेशक पंकज जोशी बताते हैं, 'प्राकृतिक क्षरण कई दशकों में और धीरे-धीरे होता है, जबकि मानवीय गतिविधियों से क्षरण बेहद तेज गति से होता है और इसे रोकना बड़ी चुनौती है.

(कुंदन पाण्डेय, अर्नब प्रतिम दत्ता, जितेंद्र, ईशान कुकरेती और शगुन कपिल की रिपोर्ट)

('डाउन टू अर्थ' एक हिंदी फीचर सेवा है, जो पर्यावरण की सुरक्षा के लिए निरंतर प्रयासरत है. इस सिलसिले में 'डाउन टू अर्थ' की अनुमति ‌से उनकी विशेष सीरीज को हम hindi. news18.com पर प्रकाशित कर रहे हैं. पर्यावरण की रक्षा करने की मुहिम में लगे लोगों के लेख इस सीरीज के तहत हम आपको उपलब्ध कराएंगे.)

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First published: September 6, 2019, 12:51 PM IST
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