कमर और पेट की चर्बी कोरोना रिकवरी में बन सकती है बाधा, जानें एक्सपर्ट्स की राय

मोटापे की समस्या कोरोना रिकवरी में भी बाधक हो सकती है. (सांकेतिक तस्वीर)

मोटापे की समस्या कोरोना रिकवरी में भी बाधक हो सकती है. (सांकेतिक तस्वीर)

कोविड के इलाज (Covid-19 Treatment) के दौरान सामने आया है कि अगर मरीज दूसरी बीमारियों से जूझ रहा है, तो उसके इलाज और ठीक होने में खासी परेशानियां आ रही हैं. मोटापा (Obesity) भी अब कोविड के इलाज में एक अहम चुनौती बनकर कर सामने आ रहा है.

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नई दिल्ली. फिटनेस का प्रतीक मानी जाने वाली पतली कमर अब कोविड के इलाज (Covid-19 Treatment) के दौरान भी काम आ सकती है. वहीं अगर कमर मोटी है तो समझ लीजिए की ये चिंता की बात हो सकती है. कोविड के इलाज के दौरान सामने आया है कि अगर मरीज दूसरी बीमारियों से जूझ रहा है, तो उसके इलाज और ठीक होने में खासी परेशानियां आ रही हैं. मोटापा भी अब कोविड के इलाज में एक अहम चुनौती बनकर कर सामने आ रहा है. मोटे मरीजों को जहां ठीक होने में समय लग रहा है, वहीं उन्हें हाई वेंटीलेशन प्रेशर की जरूरत भी पड़ती है.

डॉक्टर का कहना है कि ऐसे युवा जिनकी कमर पिछले एक साल में ही चर्बी की वजह से बढ़ी है, उन्हें उतना ही खतरा है, जितना किसी मोटे इंसान को हो सकता है. ऐसे लोग जिनका बॉडी मास इंडेक्स यानि शरीर द्रव्यमान सूचकांक भले ही अच्छा हो, लेकिन उनकी कमर में चर्बी हो, उनकी तुलना में पतली कमर वाले लोग कोविड से जल्दी ठीक हो जाते हैं. अब चूंकि तीसरी लहर कभी भी सिर उठा सकती है, ऐसे में डॉक्टर का कहना है कि लोगों को अपनी शारीरिक फिटनेस पर ध्यान देना चाहिए, जिससे वो कोविड की गंभीर परिणामों का सामना कर सकें.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

गंभीर रोगों की देखरेख में विशेषज्ञ डॉ. नूर मोहम्मद का कहना है कि ‘पेट के दबाव की वजह से फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है. पेट और छाती पर चर्बी जमा होने की वजह से फेफड़े सिकुड़े ही रह जाते हैं और ठीक से फूल नहीं पाते हैं. मोटापे से पीड़ित लोगों को लंबे वक्त तक के लिए बाइपेप (लंबे समय से सांस की तकलीफ से जूझ रहे लोगों के इस्तेमाल में आने वाली मशीन) और वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है. अगर पेट पर चर्बी नहीं होगी तो लोगों के जल्दी ठीक होने की संभावना भी ज्यादा रहती है.
डॉ. नूर मोहम्मद बताते हैं कि कोविड के इलाज में फेफड़ों का फैलना अहम गतिविधि होती है और मोटापे में ये करना बेहद दुखदायी होता है. ऐसे मरीज के साथ प्रोन पोजीशन का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता है. साथ ही जहां पूरा देश इस वक्त ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है, ऐसे में मोटे मरीजों के लिए ऑक्सीजन मास्क का आकार भी एक चुनौती बन जाता है, जो आमतौर पर उपलब्ध नहीं रहता है. कोविड के मामले में तो हल्का मोटापा भी नुकसानदायक हो सकता है.

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'लॉकडाउन के दौरान घरों में रह रहे लोग, करते नहीं कसरत'



किंग्सवे हॉस्पिटल के कोविड इन्चार्ज डॉ. हर्षवर्धन बोरा के मुताबिक ‘युवाओं में मोटापा पहली लहर के दौरान भी उतना ही खतरनाक था. क्योंकि लॉकडाउन के वक्त ज्यादातर वक्त लोग घर पर रहे, इस वजह से लोगों का वजन बढ़ गया उस पर किसी तरह की कोई कसरत नहीं कर पाना करेले का नीम चढ़ा होना साबित हुआ. मोटे लोग इलाज के दौरान जल्दी प्रतिक्रिया नहीं देते हैं यहां तक कि इस समूह के लोगों में स्लीप एप्निया की वजह से ऑक्सीजन स्तर भी कम रहता है.’

सेनगुप्ता हॉस्पिटल के डॉ. शांतनु सेनगुप्ता बताते हैं , ‘अगर आपने वैक्सीन लगवा ली है, और आप रोजाना कसरत करते हैं तो आपके अस्पताल जाने के खतरा कम रहता है.' अपनी बात को बढ़ाते हुए सेनगुप्ता कहते हैं कि उम्मीद करते हैं कि तीसरी लहर ना आए, लेकिन ऐसे वक्त के लिए लोगों को खुद को तैयार करके रखना चाहिए. रोजाना 1 से 2 घंटे की कसरत, हेल्दी खाना और वैक्सीन खुद को बचाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती है.’

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