111 साल पहले ही बन गया था पहला तिरंगा, रंग और प्रतीक कुछ अलग थे

111 साल पहले ही बन गया था पहला तिरंगा, रंग और प्रतीक कुछ अलग थे
भारत का राष्ट्रीय ध्वज.

पहले राष्ट्रीय ध्वज को सरदारसिंह राणा और मैडम भिखाईजी कामा ने फ्रांस में डिजाइन किया था. इसे पहली बार जर्मनी के स्टटगर्ट शहर में आयोजित इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में 22 अगस्त 1907 को फहराया गया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 15, 2018, 7:56 AM IST
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विजय सिंह परमार

हो सकता है कि आप तिरंगे के इतिहास से वाकिफ हों. बहुत लोगों को ये भी पता हो कि कब और कहां पहले तिरंगे को फहराया गया. लेकिन इस गौरवशाली इतिहास की चर्चा हर बार दिलचस्प लगती है.

पहले राष्ट्रीय ध्वज को सरदारसिंह राणा और मैडम भिखाईजी कामा ने फ्रांस में डिजाइन किया था. इसे पहली बार जर्मनी के स्टटगर्ट शहर में आयोजित इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में 22 अगस्त 1907 को फहराया गया था. दुनिया भर के सोशलिस्टों के इस कॉन्फ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व किया था सरदारसिंह राणा और मैडम काम ने.



न्यूज 18 से बातचीत में सरदारसिंह राणा के प्रपौत्र राजेंद्र सिंह राणा बताते हैं, "कॉन्फ्रेंस की रिवायत थी कि प्रतिनिधि अपने देश के झंडे के साथ आते थे. भारत ब्रिटेन का ग़ुलाम था और उसके पास अपना झंडा नहीं था. लिहाजा सरदारसिंह और मैडम काम ने भारत के झंडे का डिजाइन किया. खुद उसे सिल कर तैयार किया. इसमें तीन रंग थे, इसमें तीन रंग थे, हरा, पीला और लाल. साथ ही इसमें आठ कमल थे और आधा चंद्रमा के अलावा सूर्य भी था. झंडे पर वंदे मारतम् भी लिखा था. इसमे चांद मुसलमानों और सूर्य हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर था. आठ कमल उस वक्त ब्रिटिश हुकूमत के दौरान के आठ प्रदेशों के प्रतीक के तौर पर थे. इसके तीन रंग हरा रंग मुसलमानों, पीला रंग हिंदुओ और लाल रंग सोशलिस्टों को प्रदर्शित करता था." राजेंद्र सिंह 1996 से 2014 तक भावनगर से लोकसभा सदस्य रहे हैं.
इसी परिवार के सर्वदमन सिंह बताते हैं, "जर्मनी जाते समय उन्होंने तीन और झंडे तीन अन्य स्वाधीनता सेनानियों को सौंपे कि अगर कहीं वे गिरफ्तार कर लिए गए तो कॉन्फ्रेंस में वे झंडे को लेकर पहुंच सकें. मैडम कामा ने पहली बार भारत का झंडा फहराया. उन्होंने इस मौके पर जोरदार भाषण दिया."
राणा परिवार ने इस झंडे को सुरक्षित रखा है. आजादी की लड़ाई में सरदारसिंह राणा की भूमिका महत्वपूर्ण थी.

पहला तिरंगा देखते लोग


दरअसल, जिस रिवॉल्वर से मदन लाल ढिंगरा ने लंदन में कर्जन विलि को मारा था उसे भी सरदारसिंह ने मुहैया कराया था. इस सिलसिले में उनके पेरिस स्थित घर की तलाशी भी हुई थी.

राणा परिवार के मुताबिक पहले बनाए गए तीन झंडों में से एक वीर सावरकर को उनके फ्रांस दौरे में दिया गया था. वहां से लौट कर जो संग्रहालय में है. दूसरा मैडम काम के पास था, जिसका अब किसी को पता नहीं है और तीसरा राणा परिवार के पास सुरक्षित है.

सरदारसिंह राणा का जन्म 10 अप्रैल 1870 को सुरेंद्रनगर जिले के कंथारिया गांव में हुआ था. वे पेरिस इंडिया सोसायटी के संस्थापक सदस्य थे और होमरुल सोसायटी के वाइस प्रेसिडेंट भी. वे बैरिस्टर की डिग्री हासिल करने को लंदन गए थे. उन्होंने लंदन में इंडिया हाउस बनवाने में भी अहम भूमिका निभाई. 1899 में अपने आभूषणों के कारोबार के लिए पेरिस चले गए. वहां से भी वे देश की आजादी की लड़ाई के लिए सक्रिय योगदान करते रहे. सरदारसिंह राणा का निधन गुजरात के वेरावल कस्बे में हुआ. अब उनका परिवार भावनगर में रहता है.

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