250 सालों में पहली बार, अंग्रेजों के समय से चल रही रक्षा भूमि नीति में बदलाव करेगी मोदी सरकार

Defence Land Policy: रक्षा भूमि सुधारों पर विचार करने के साथ केंद्र सरकार एक छावनी विधेयक 2020 को अंतिम रूप देने की दिशा में भी काम कर रही है, जिसका उद्देश्य छावनी क्षेत्रों में विकास पर जोर देना है.

Defence Land Policy: रक्षा भूमि सुधारों पर विचार करने के साथ केंद्र सरकार एक छावनी विधेयक 2020 को अंतिम रूप देने की दिशा में भी काम कर रही है, जिसका उद्देश्य छावनी क्षेत्रों में विकास पर जोर देना है.

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    नई दिल्ली. नरेंद्र मोदी सरकार ने रक्षा भूमि सुधार (Defence Land Reforms) की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए नए नियमों को मंजूरी दी है. इसके अंतर्गत सशस्त्र बलों से सार्वजनिक परियोजनाओं या अन्य गैर-सैन्य गतिविधियों के लिए खरीदी गई जमीन के बदले उनके लिए समान मूल्य के बुनियादी ढांचे (ईवीआई) के विकास की अनुमति दी जाएगी. मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि क्योंकि अंग्रेजों द्वारा 1765 में बंगाल के बैरकपुर में पहली छावनी स्थापित की गई थी, इसलिए ब्रिटिश काल में भारत में सेना के अलावा किसी भी उद्देश्य के लिए रक्षा भूमि का इस्तेमाल करने की नीति प्रतिबंधित थी.


    बाद में अप्रैल 1801 में, ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल ने आदेश दिया, 'छावनी में स्थित कोई भी बंगला और क्वार्टर जो कि जो सेना से संबंधित नहीं है, को किसी भी व्यक्ति को बेचने या कब्जा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.' हालांकि, इस नीति में 2021 में बदलाव आया क्योंकि सरकार रक्षा भूमि सुधारों पर विचार कर रही है और एक छावनी विधेयक 2020 को अंतिम रूप देने की दिशा में भी काम कर रही है, जिसका उद्देश्य छावनी क्षेत्रों में विकास पर जोर देना है.


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    रक्षा मंत्रालय (MoD) के अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि प्रमुख सार्वजनिक परियोजनाओं जैसे मेट्रो, सड़क, रेलवे और फ्लाईओवर के निर्माण - के लिए जरूरत के मुताबिक रक्षा भूमि तभी दी जाएगी, जबकि उतनी ही कीमत की जमीन या फिर उसके बाजार मूल्य का भुगतान किया जाएगा. नए नियमों के तहत, आठ ईवीआई परियोजनाओं की पहचान की गई है, जिन्हें हासिल करने वाला पक्ष संबंधित सेवा के समन्वय से बुनियादी ढांचा प्रदान कर सकता है.


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    इनमें अन्य परियोजनाओं के अलावा निर्माण इकाइयां और सड़कें शामिल हैं. नए नियमों के मुताबिक, छावनी क्षेत्रों के तहत आने वाली जमीन का मूल्य स्थानीय सैन्य प्राधिकरण की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा निर्धारित किया जाएगा, जबकि छावनी के बाहर की भूमि के लिए दर जिलाधिकारी तय करेंगे. वित्त मंत्रालय ने प्रस्तावित गैर-व्यपगत आधुनिकीकरण कोष के मद्देनजर राजस्व हासिल करने के लिए रक्षा भूमि के मुद्रीकरण को एकमात्र तरीका माना है. गैर-व्यपगत कोष से मतलब उस राशि से है जो किसी तय वित्तीय वर्ष में किसी निश्चित सरकारी परियोजना के लिए के आवंटित की जाती है.


    अधिकारियों ने कहा कि रक्षा आधुनिकीकरण कोष की स्थापना को लेकर एक ड्राफ्ट कैबिनेट नोट पर वर्तमान में अंतर-मंत्रालयी (Inter-Ministerial) विचार-विमर्श हो रहा है और जल्द ही एक अंतिम निर्णय की उम्मीद है, जिसके बाद इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाएगा.




    रक्षा भूमि सुधार के संबंध में लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग (सेवानिवृत्त) ने कहा, ''चूंकि रक्षा भूमि पूरे देश में सबसे प्रमुख क्षेत्रों में हैं और सालों राजनेताओं एवं नागरिक अधिकारियों ने मांग की है कि उनका उपयोग विकास गतिविधियों के लिए किया जाए. अब ऐसा लगता है, यह हो रहा है.' उदाहरण के लिए जीटी रोड के साथ - दिल्ली से पेशावर तक - कैंपिंग ग्राउंड और पुराने डिपो हैं जो अब उपयोग में नहीं हैं, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए ब्रिटिश भारतीय सेना द्वारा बनाया गया था. पनाग ने कहा, 'अगर सेना इसका इस्तेमाल नहीं कर रही है, तो आप जमीन का मुद्रीकरण कर सकते हैं और बशर्ते उन्हें वैकल्पिक जमीन दी जाए.'

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