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भारत-पाक के बीच काम नहीं करेगा 'रमजान सीजफायर': असद दुर्रानी

कश्मीर में अशांति

कश्मीर में अशांति

अगस्त 1990 से लेकर मार्च 1992 तक आईएसआई प्रमुख रहे असद दुर्रानी ने भारत-पाकिस्तान से जुड़े कई मसलों पर बात की. जम्मू-कश्मीर में रमजान पर सीजफायर को उन्होंने बेमानी करार दिया.

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    (सुहास मुंशी)

    पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी का कहना है कि कश्मीर में फैली अशांति में पाकिस्तान हर तरीके से शामिल है.

    अगस्त 1990 से लेकर मार्च 1992 तक आईएसआई प्रमुख रहे असद दुर्रानी ने बहुत ही रोचक समय पर अपना पद संभाला. सोवियत देश अफगानिस्तान से वापस जा रहे थे. उसी समय विदेशी आतंकवादियों ने भारत घुसपैठ करना और भारत से लड़ने के लिए स्थानीय कश्मीरियों को ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया.

    यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि 1990 के दशक में दुर्रनी जब आईएसआई का जिम्मा संभाल रहे थे, तब दुलत भी खुफिया ब्यूरो (आईबी) के संयुक्त निदेशक के रूप में कश्मीर में तैनात थे. जिसके साथ मिलकर दुर्रानी ने खुफिया एजेंसियों और उनके कारनामों पर आधारित किताब लिखी है, जिसका नाम 'Spy Chronicles RAW, ISI and the Illusion of Peace' है. बाद में दुलत खुफिया एजेंसी RAW के प्रमुख बने और इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कश्मीर मुद्दे पर सलाहकार बने.

    असद दुर्रानी ने न्यूज 18 के साथ इंटरव्यू में अपने किताब में लिखे कई मुद्दों पर खुल कर बात की. पेश है इंटरव्यू के कुछ अंश...

    एएस दौलत के साथ लिखे आपके किताब में कुलभूषण जाधव पर लिखे चैप्टर में आपने कहा है ''मैं अपने दोस्त से सहमत हूं कि इस केस को खराब तरीके से हैंडल करने के बावजूद जाधव वापस आ जाएंगे. बेहतर तरीका ये होता कि इसकी जानकी रॉ को देनी चाहिए थी और सही कीमत पर उसे भारत को सौंप देना चाहिए था.'' क्या आपको अभी भी लगता है कि पाकिस्तान कुछ कीमत पर जाधव को वापस कर देगा?
    >> मैं दो पहलू पर बात करना चाहूंगा, जो सही है जिसे माना और अपनाया जा सकता है. ऐसे केसों में हमेशा एक्सचेंज ही कीमत होती है. जाधव जैसों के लिए भारत को एक से ज्यादा लोगों को वापस करना पड़ेगा.

    किताब के एक अलग हिस्से में कश्मीर के मुद्दे पर बात करते हुए आपने कहा, ''मुझे लगता है कि तहरीक (आंदोलन) को एक राजनीतिक दिशा देने के लिए हुर्रियत का गठन एक अच्छा आइडिया था. लेकिन इस आंदोलन को किसी और के हाथ में देना और उन्हें अपने हिसाब से खूनी खेल खेलने के लिए छोड़ देना.'' लंबे समय तक पाकिस्तान ने हुर्रियत और कश्मीरी अलगाववाद को एक स्वदेशी आंदोलन बताया. आप इस विचार से असहमत हैं और यह मानते हैं कि हुर्रियत को बनाने और उसे सुविधा देने में पाकिस्तान की भूमिका थी. इसके अलावा जेकेएलएफ, हिज्बुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के माध्यम से अलगाववाद को बढ़ावा दिया गया?
    >>मैं औरों के बारे में नहीं जानता, लेकिन हां हुर्रियत को इस लिए बनाया गया, क्योंकि ऐसे सभी आंदोलनों को राजनीतिक छतरी चाहिए थी. मुझे इस बात पर विश्वास नहीं है कि क्या पाकिस्तान ने इस विरोध को राजनीतिक दिशा देने के लिए क्रेडिट से इनकार कर दिया है.

    दुलत ने कई बार कहा है कि हुर्रियत पाकिस्तानी टीम है और इस समय पाकिस्तानी कश्मीर में स्वतंत्र घूम रहे हैं. क्या आप इससे सहमत हैं, अगर हां तो अभी कश्मीर में पाकिस्तानियों का कितनी भागीदारी है.
    >>मुझे हुर्रियत या पाकिस्तान के प्रभाव और भागीदारी के बारे में पता नहीं है, लेकिन हां, पाकिस्तान में कुछ लोग कश्मीरियों पर भारत की पकड़ को ढीला होता देखना चाहते हैं.

    अगले एक या पांच सालों में आप कश्मीर की स्थिति को कैसे देखते हैं.
    >> ये वो समय था जब हम पतंग उड़ाते थे, इसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. सब बातों की एक बात ये है कि हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि इस तरह के हालात कैसे बन जाते हैं और इसलिए सब कुछ संभव था.

    दोनों ही देशों के लोगों को न्यूक्लियर हमले का डर सताता है. दोनों ही देश में सात दशकों से दुश्मनी चल रही है और दोनों के पास न्यूक्लियर बम है. कई बार ऐसे हमले करने को लेकर बात हो चुकी है. क्या भारत या पाकिस्तान कभी इस हथियार का प्रयोग कर सकते हैं?
    >>नहीं, हमने कभी भी न्यूक्लियर हथियारों का प्रयोग करने के बारे में नहीं सोचा. यह दोनों ही देशों के लिए अंतिम फैसला होगा. उन्हें उपयोग न करने के लिए जो कुछ भी संभव होगा सब किया जाएगा.

    भारत ने हाल ही में कश्मीर में संघर्ष विराम का आदेश दिया है और भारतीय प्रतिनिधिमंडल एंटी-टेररिज्म कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद रवाना हो गया है. क्या आपको लगता है कि ये दोनों घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं? क्या हम दोनों देशों के बीच की दुश्मनी को खत्म करने की शुरुआत कर रहे हैं?
    >>मैंने किसी भी गंभीर कोशिश या दिल पिघलाने वाले उठाए गए कदम के बारे में नहीं सुना है. कॉन्फ्रेंस मुझे कभी भी रोचक नहीं लगा और ना ही रमजान सीजफायर जैसे उठाए गए कदम. वे इससे कुछ और बेहतर कर सकते हैं या फिर दोनों को सांस लेने की जगह दे सकते हैं. यह संभव है कि सीजफायर का प्रस्ताव इसलिए लाया गया, क्योंकि स्थिति बिगड़ती जा रही थी.

    किताब के एक हिस्से में आपने लिखा है कि हाफिज सईद को सौंपने की राजनीतिक लागत बहुत अच्छी थी, लेकिन क्या आपको लगता है कि दोनों देशों के बीच विश्वास के प्रतीक के रूप में, एक दिन एक सैयद सलाहुद्दीन या मसूद अजहर या दाऊद इब्राहिम जैसे किसी को भारत को सौंप सकते हैं? क्या आप दोनों देशों के बीच सहयोग के लिए इस तरह के कदम को एक बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला मानेंगे?
    >>इस तरह के छोटे मामलों पर न तो विश्वास और न ही आत्मविश्वास बनाया जाता है. अधिक संभावना है कि इन चीजों को भारत में "शांति" और पाकिस्तान में "आत्मसमर्पण" के रूप में देखा जाएगा. किसी भी अंतरराष्ट्रीय मामले में विश्वास तभी बढ़ता है जब ''साझा हित'' हों.

    तमाम लोग यह दावा कर रहे हैं कि नवाज शरीफ जिन कानूनी मामलों का सामना कर रहे हैं, उसके पीछे ''कुछ छिपे हाथ हैं''. क्या आप भविष्य में ऐसी किसी संभावना के बारे में सोचते हैं?
    >>पहली बात यह कि मैं राजनीतिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता. आंतरिक हो या बाहरी. इस मामले में मैं ''छिपे हाथ'' के बारे में नहीं जानता, ना ही किसी संभावना की भविष्यवाणी कर सकता हूं.

    जैसा कि दुलत ने सुझाव दिया है, क्या आपको लगता है कि भारत से नासीर जंजुआ या जनरल बाजवा, या पाकिस्तान से अजीत डोवाल या जनरल बिपीन रावत को निमंत्रण की कोई संभावना है?
    -संभावनाएं, निश्चित रूप से बहुत संभावना नहीं हैं.

    क्या दो कोरियाई लोगों के बीच चल रही बातचीत आपको विश्वास करने के लिए प्रेरित करती है कि पाकिस्तान और भारत के बीच इस तरह की एक संवाद और पारस्परिक विश्वास विकसित किया जा सकता है, जिससे उन्हें जल्द ही बड़े स्तर की वार्ता आयोजित की जा सकती है? एक संबंधित सवाल - आपकी राय में आगरा वार्ता किसने बिगाड़ दी?
    -दो कोरियाई हमारे लिए कोई आदर्श मॉडल नहीं हैं. हमने अतीत में उनके मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है. जब आगरा कि बात होगी तो मैं दुलत से अलग राय रखता हूं, जिन्हें बेहतर आभास है.

    क्या अफगानिस्तान कभी भारत और पाकिस्तान के बीच सहयोग के लिए एक आम आधार बन सकता है?
    - एक चरण में मैंने अफगानिस्तान को सबसे संभावित क्षेत्र माना जहां हम सहयोग कर सकते थे, क्योंकि दोनों देशों के पक्ष में कुछ था. मैंने इसे ''बेस्ट लेवल प्लेयिंग फील्ड'' घोषित किया. लेकिन दिल्ली के कुछ सर्किलों में, चाणक्य अभी भी परम गुरु हैं. ''पड़ोसी का पड़ोसी''!

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