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Friendship Day 2021: कुर्सी की चाह ने इन राजनेताओं की दोस्ती पर लगाया ग्रहण, कभी राजनीतिक मंच पर दिखते थे साथ

दोनों बचपन से एक दूसरे को जानते थे. वे दोनों ही दून स्कूल और स्टीफंस कॉलेज साथ ही गए थे.

दोनों बचपन से एक दूसरे को जानते थे. वे दोनों ही दून स्कूल और स्टीफंस कॉलेज साथ ही गए थे.

राजनीति और सत्ता की चाह कब किसे दोस्त से दुश्मन बना दे, कोई कुछ नहीं कह सकता. फिर चाहे बात ज्योतिरादित्य सिंधिया-राहुल गांधी ( Jyotiraditya Scindia-Rahul Gandhi) की हो, या फिर देवेंद्र फडणवीस-उद्धव ठाकरे की. ये सत्ता और राजनीति अब तक कई अच्छे राजनेताओं को दोस्त से दुश्मन बना चुकी है.

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    नई दिल्लीः आज दुनिया भर में फ्रेंडशिप डे 2021 (Friendship Day 2021) की धूम देखने को मिल रही है. कोरोना के बीच भी लोगों में दोस्ती को सेलिब्रेट करने वाले इस खास दिन को लेकर उत्साह कम नहीं हुआ है. हालांकि, भारत में राजनेताओं के बीच इस दिन को सेलिब्रेट करने का चलन ना के बराबर ही देखने को मिला. हालांकि, राजनीति और सत्ता की चाह कब किसे दोस्त से दुश्मन बना दे, कोई कुछ नहीं कह सकता. फिर चाहे बात ज्योतिरादित्य सिंधिया-राहुल गांधी ( Jyotiraditya Scindia-Rahul Gandhi) की हो, या फिर देवेंद्र फडणवीस-उद्धव (Devendra Fadnavis-Uddhav Thackeray) ठाकरे की. ये सत्ता और राजनीति अब तक कई अच्छे राजनेताओं को दोस्त से दुश्मन बना चुकी है.

    आज फ्रेंडशिप डे कि मौके पर अगर राजनीति में दोस्ती की बात करें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया और राहुल गांधी की दोस्ती का ख्याल जरूर आता है. वे दोनों बचपन से एक दूसरे को जानते थे. वे दोनों ही दून स्कूल और स्टीफंस कॉलेज साथ ही गए थे. इतन करीब होने के बाद भी राजनीति में वे साथ नहीं चल पाए. इस साल 10 मार्च को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पिता माधव राव सिंधिया की जयंति पर पहले ट्विटर पर पोस्ट किया और फिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी.

    राहुल गांधी ने इस साल के शुरुआत में कहा कि अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी में अच्छी मेहनत की होती तो वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन अब भाजपा में जाने के बाद वह उन्हें आखिरी सीट मिली है.

    देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे

    राजनीति में यह साफ है कि कोई किसी का नहीं होता. महाराष्ट्र की राजनीति से यह साफ तौर पर स्पष्ट हो गया. जब महाराष्ट्र की बात होती है तो उद्धव ठाकरे और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवींस के कभी मजबूत रहे संबंधों को कौन भूल सकता है. देवेंद्र फडणवींस और मौजूदा सीएम उद्धव ठाकरे के बीच 2017 से मतभेद शुरू हो गए थे. दशकों तक एक दूसरे की पार्टी का साथ देने वाले नेता अब अलग हो चुके हैं. भले ही शिवसेना ने कभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर पलटवार करने का कोई मौका नहीं छोड़ा हो लेकिन उसने कभी भी सीधे तौर पर देवेंद्र फडणवींस पर कभी कोई बात नहीं की.

    मायावती और मुलायम सिंह यादव

    बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच प्रसिद्ध गेस्ट हाउस कांड के बाद राजनीतिक संबंधों में दरार पड़ गई थी. इस गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ केस दर्ज करा दिया था. बसपा प्रमुख ने यह केस 2019 में वापस ले लिया. दोनों ही पार्टियां इस समय उत्तर प्रदेश में प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टी हैं. 2019 में चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के कुछ वक्त के गठबंधन को छोड़ दें तो पिछले दो दशकों ने मायावती और मुलायम सिंह यादव ने कभी भी राजनीतिक मंच साझा नहीं किया है. 2019 में चुनाव हारने के बाद मायावती ने सपा पर कई आरोप लगाए और इस साल ग्राम पंचायत चुनावों नें बसपा ने अकेले दम पर चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान किया.

    नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह

    पंजाब में कभी नवजोत सिंह सिद्धू और मुख्मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच बेहद गहरी दोस्ती हुआ करती थी. लेकिन जैसा कि राजनीति में कहा जाता है कि कब कौन किसका विरोधी हो जाए यह मालूम नहीं. यहां भी ऐसा ही देखने को मिला. इस समय भले ही दोनों एक पार्टी का हिस्सा हों लेकिन दोनों में बहुत ही ज्यादा आपसी मतभेद बने हुए हैं.

    सिद्धू और सिंह के बीच तकरार तब से और बढ़ गई जब अमृतसर (पूर्व) के विधायक ने गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों को लेकर सीएम पर कड़ा हमला बोला. सिंह सिद्धू को कांग्रेस की पंजाब इकाई का प्रमुख बनाए जाने के खिलाफ थे. मुख्यमंत्री ने सिद्धू से मिलने से तब तक इनकार किया था जब तक कि उन्होंने सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी के लिए सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी.

    ममता बनर्जी और मुकुल राय

    इस समय अगर देश में राजनीतिक माहौल में सबसे गर्म राज्य की बात करें तो पश्चिम बंगाल का नाम सबसे पहले आता है. देश के साथ ही पश्चिम बंगाल में अंदरूनी तौर पर भी राजनीति माहौल का पार हमेशा ही ऊपर रहता है. ममता बनर्जी और मुकुल राय की जोड़ी ने मिलकर 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के शासन का अंत कर दिया था. दोनों की ही यह जोड़ी पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे कड़ी जोड़ी थी लेकिन यह 2017 में समाप्त हो गई. इसके बाद मुकुल राय ने बीजेपी का दामन थाम लिया.

    हालांकि अभी भी दोनों नेताओं के बीच राजनीति संबंध बरकार थे जिसके बाद पिछले महीने मुकुल राय अपने बेटे सुभ्रांशू राय के साथ वापस टीएमसी में लौट आए.

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