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मिजोरमः जहां अपनी ही सेना ने गिराए थे बम, आज कहा जाता है 'आईलैंड ऑफ पीस'

वोट डालने के लिए लोग कतार में लगे हुए

वोट डालने के लिए लोग कतार में लगे हुए

मिज़ोरम में स्थिति काफी शांतिपूर्ण है इस मामले में पूर्वात्तर राज्यों में ये सबसे अलग है. यहां तक कि मिज़ोरम को 'आईलैंड ऑफ पीस' कहा जाता है.

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    (एडम सैपरिनसंगा)

    मार्च 1966 में मिज़ोरम देश का ऐसा पहला राज्य बना जिस पर अपने ही देश की वायुसेना ने बम गिराया. इसकी नौबत तब आई जब लालडेंगा की अगुवाई वाली नेशनल मिज़ो फ्रंट (एनएमएफ) ने भारत से आज़ादी की घोषणा कर दी थी. नेशनल मिज़ो फ्रंट को लगा था कि सरकार राज्य में आए अकाल से ठीक ढंग से निपट नहीं पाई है और निष्क्रिय रही है.

    एनएमएफ की बगावत पूर्वोत्तर में नागा विरोध के बाद दूसरा सबसे बड़ा विद्रोह था. नागा विद्रोह पूर्वोत्तर में इससे पहले करीब दो दशकों से चल रहा था. दोनों पक्षों से मानवाधिकारों के उल्लंघन, हिंसा, लोगों के माइग्रेशन के बावजूद 1986 में सरकार और विद्रोही ग्रुप के बीच समझौता करके इस समस्या का हल निकाल लिया गया.

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    तब से तीन दशक बीत चुके हैं और मिज़ोरम में फिर से चुनाव होने वाले हैं. लेकिन यहां संघर्ष की स्थिति नहीं है. पूर्वोत्तर राज्यों में मिज़ोरम इस मामले में सबसे अलग है. यहां तक कि मिज़ोरम को 'आईलैंड ऑफ पीस' कहा जाता है.

    यह बात सही है कि समझौते के बाद भी थोड़ी बहुत संघर्ष की स्थिति राज्य के उत्तरी सीमा के साथ बनी रही. लेकिन 1994 तक इन छोटे-मोटे विद्रोही ग्रुप के साथ भी सरकार ने शांति समझौता कर लिया. 1990 के दशक में राज्य के पश्चिमी क्षेत्र में ब्रू विद्रोही ग्रुप भी काम करता रहा लेकिन एक दशक पहले वो भी खत्म हो गया.

    इन सबके अलावा, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी) ने भी राज्य में कुछ वक्त के लिए अस्थिरता पैदा की. एनएलएफटी की स्थापना त्रिपुरा में की गई थी और यह संगठन बांग्लादेश से अपने सारे कामों को अंजाम देता था. मिज़ोरम में इसने ब्रू गैंग की मदद से कई अपहरण भी किए लेकिन समय के साथ यह भी खत्म हो गया.

    पर सवाल ये उठता है कि आखिर मिज़ोरम में इतनी शांतिपूर्ण स्थिति क्यों है. दरअसल, 1966 में एमएनएफ विद्रोह के सिर उठाने के बाद से ही चर्च और दूसरे कुछ बौद्धिक वर्ग के लोगों ने मध्यस्थता का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया. 1970 आते-आते इसके खिलाफ प्रदर्शन व कांफ्रेस भी किया गया. भारतीय सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर थेनफुंगा साइलो ने राजनीतिक पार्टी बनाई और राज्य में शांति स्थापित करने के मुद्दे पर चुनाव जीता.

    कांग्रेस पार्टी भी शांति लाने को ही मुद्दा बनाकर 1984 के चुनाव में उभरकर आई. में फिर से उभरकर आई और आज तक 1986 में हुए मिज़ो समझौते का श्रेय खुद लेती आ रही है. क्योंकि इसके नेताओं ने एमएनएफ लीडरशिप की बात तो मानते हुए उन्हें सत्ता पर काबिज़ होने का मौका दिया था.

    लेकिन ऐसा नहीं है कि राज्य में केवल विद्रोही गतिविधियां ही खत्म हो गई हैं. बल्कि राजनीतिक हिंसा भी नहीं हो रही है. यानी कि एक पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर दूसरे कार्यकर्ताओं से लड़ाई झगड़ा करते हुए भी नहीं दिख रहे हैं.

    हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी वायरल हुआ और इसकी निंदा भी गई. वीडियो में दिख रहा था ज़ोरम पीपल्स पार्टी चुनाव से ज़ुड़ा एक कैंपेन कर रही थी वहीं कांग्रेस पार्टी की गाडियों की एक फ्लीट हॉर्न बजाती हुई दिख रही थी. एक दूसरी घटना में कुछ अज्ञात लोगों ने किसी वाहन को कोई नुकसान पहुंचाया था. एमएनएफ ने बयान जारी कर इसकी निंदा की.

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    इस तरह की छोटी घटनाओं की भी निंदा किया जाना सराहनीय है. देश के बाकी क्षेत्रों में ये कम ही दिखता है. मिज़ो पीपल फोरम कई चर्च और कम्युनिटी आधारित इकाई है जो कि चुनावों में किसी भी अवांछित गतिविधि की देखरेख करती है. इसने पिछले चुनावों में कई पार्टियों से समझौता किया है जिसके तहत ये देखरेख करती है और कोशिश करती है कि आचार संहिता का पूरी तरह से पालन हो.

    पिछले दिनों कैंपेन के दौरान जहां कहीं भी आचार संहिता का उल्लंघन हुआ वहां एमपीएफ ने बयान जारी कर या सोशल मीडिया और न्यूज़ पेपर के माध्यम से इसको उजागर किया. यहां तक कि इसके नेता विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से मिले और 'फ्री एंड फेयर' चुनाव करवाए जाने में सहयोग करने की सिफारिश भी की.

    (एडम सैपरिनसंगा फ्रंटियर डिस्पैच में एडिटर हैं. विचार उनके निजी हैं)

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