प्रियंका गांधी के इन 'ट्रंप कार्ड' ने बढ़ाया सपा-बसपा और बीजेपी का सिरदर्द

प्रियंका गांधी की राजनीतिक एंट्री के बाद से अब हर कोई यही सवाल कर रहा है कि क्या एक मजबूत दावेदारी पेश करने का दावा करने वाली कांग्रेस से बीजेपी को फायदा मिलेगा?

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Updated: March 16, 2019, 6:13 PM IST
प्रियंका गांधी के इन 'ट्रंप कार्ड' ने बढ़ाया सपा-बसपा और बीजेपी का सिरदर्द
प्रियंका गांधी (PTI)
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Updated: March 16, 2019, 6:13 PM IST
(प्रांशु मिश्रा)

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को आगे करके 2019 का सबसे बड़ा दांव खेला है. राजनीति में प्रियंका की एंट्री ने यूपी के सियासी समीकरण को एक बार फिर से उलझा दिया है. यूपी में अब तक बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही थी. लेकिन प्रियंका की एंट्री ने अब मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है.

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प्रियंका गांधी की राजनीतिक एंट्री के बाद से अब हर कोई यही सवाल कर रहा है कि क्या एक मजबूत दावेदारी पेश करने का दावा करने वाली कांग्रेस से बीजेपी को फायदा मिलेगा? क्या कांग्रेस के इस कदम से मायावती को नुकसान होगा? क्या दलित वोट बैंक के लिए कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए प्रियंका गांधी 'ट्रंप कार्ड' साबित हो पाएंगी? अगर कुछ सियासी समीकरणों पर नजर दौड़ाई जाए, तो ऐसे हालात बनते दिख रहे हैं कि कांग्रेस के आने से शायद बीजेपी और सपा-बसपा गठबंधन को सीधे तौर पर फायदा हो सकता है.

यूपी में कांग्रेस का फोकस दलित और ओबीसी वोट पर है, जो अब तक बसपा का वोट बैंक है और लगातार बिखर रहा है. इस वोट बैंक को साधने के लिए देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने यूपी में दलित और ओबीसी कम्युनिटी को संबोधित करने का प्लान बनाया है.


कांग्रेस ने एक तरफ गुजरात में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को अपने पाले में ले लिया. अब यूपी में दलित युवा नेता चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ रावण का खुला समर्थन कर राजनीतिक हलकों में खलबली भी मचा दी.
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कांग्रेस महासचिव बनने के बाद प्रियंका गांधी 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पर भी चलने लगी हैं. गंगा से बड़ी आबादी की आस्था को ध्यान में रखते हुए उन्होंने चुनाव के मद्देनजर यूपी में नदी किनारे की जनता से रू-ब-रू होने का प्लान बनाया और गंगा यात्रा पर निकलने वाली हैं. 18 से 20 मार्च वह इलाहाबाद से वाराणसी तक गंगा में मोटर बोट से जल यात्रा के दौरान बीच-बीच में रुकेंगी. इस दौरान प्रयागराज और बनारस में लोगों से मुलाकात करेंगी. इसके लिए कांग्रेस ने चुनाव आयोग से अनुमति देने की मांग की है.

दरअसल, प्रियंका गांधी का ये प्लान गैर-यादव पिछड़े समुदाय तक अपनी पहुंच बनाने के लिए है. इनमें से ज्यादातर अति पिछड़ा वर्ग (मोस्ट बैकवार्ड क्लास) आता है, जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं और नई अर्थव्यवस्था में समानरूप से बने रहने के लिए जूझ रहे हैं.

कांग्रेस की अभी तक की रणनीति में आए इस 'बदलाव' ने मायावती और अखिलेश यादव की चिंता बढ़ा दी है. वहीं, बीजेपी को भी खासा परेशान कर रखा है. समाजवादी पार्टी के सीनियर नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, 'यूपी की चुनावी लड़ाई में आक्रामक तरीके से एंट्री कर कांग्रेस ने हमारा सियासी समीकरण बिगाड़ दिया है. पहले कमजोर कांग्रेस पार्टी बीजेपी के वोट बैंक को काटने और तोड़ने का ही काम कर रही थी. लेकिन, जातीय समीकरण पर फोकस होकर कांग्रेस अब सपा-बसपा के लिए बड़ी चुनौती बन गई है.'


उन्होंने कहा, 'अगर कांग्रेस यूपी में दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक वोटर्स को साधने में कामयाब हो जाती है, तो यह काफी दिलचस्प होगा. क्योंकि, पिछले दो आम चुनावों में यूपी में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है.'

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उधर, सपा-बसपा गठबंधन के सूत्रों ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस मायावती के वोट बैंक में सेंधमारी करने में सक्षम नहीं होगी. वह मायावती के वोट बैंक को नहीं तोड़ पाएगी, जिसमें ज्यादातर दलित या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल हैं. वहीं, इस गठबंधन में मुस्लिम वोट बैंक का संयोजन भी है जो अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का समर्थन करते हैं.

बता दें कि साल 2009 में कांग्रेस ने 21 सीटें जीतीं थीं. मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा दो पर पहुंच गया और कांग्रेस पार्टी सिर्फ सोनिया गांधी की रायबरेली और राहुल गांधी की अमेठी सीट ही बचा पाई. इतना ही नहीं, कांग्रेस का वोट शेयर भी अब तक के सबसे निचले स्तर 7.5 फीसदी पर आ गया.

वहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ने वाली कांग्रेस ने अमेठी और रायबरेली लोकसभा क्षेत्रों में से 10 विधानसभा सीटों में से महज चार पर जीत हासिल की थी.

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