Home /News /nation /

gaushalas has become a profitable business 150 of its products are sold in 124 countries

बिना दूध बेचे इस गौशाला से होती है हर माह 32 लाख की कमाई!

रमेश रुपारेलिया ने गो-पालन को बनाया सफल बिजनेस मॉडल (News 18)

रमेश रुपारेलिया ने गो-पालन को बनाया सफल बिजनेस मॉडल (News 18)

गिर गौ जतन संस्थान (Gir Gau Jatan Sansthan-GGJS) चला रहे गुजरात के राजकोट जिले के गोंडल कस्बे के रमेश रूपारेलिया ने गो-पालन को एक बड़े मुनाफे का बिजनेस बना दिया है. इनके 150 गौ-आधारित उत्पाद आज 124 देशों में बिकते हैं.

राजकोट. देश में गौशालाओं को लेकर ये आम धारणा है कि इनको केवल दूध नहीं देने वाली गायों को शरण देने के लिए बनाया जाता है. इनको बिना किसी मदद के चलाना संभव नहीं है. गुजरात के राजकोट जिले के गोंडल कस्बे के रमेश रूपारेलिया ने इस मिथक को तोड़कर गो-पालन में सफलता की एक नई कहानी लिखी है. गिर गौ जतन संस्थान (Gir Gau Jatan Sansthan-GGJS) चला रहे रमेश रूपारेलिया इस बात की जिंदा मिसाल हैं कि कोई भी बाधा इंसान के हौसले और मजबूत इरादे के सामने ज्यादा देर ठहर नहीं सकती है. बचपन में गरीबी के कारण रमेश रूपारेलिया को पढ़ाई-लिखाई करने का खास मौका नहीं मिल सका. 7वीं कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई छूट गई क्योंकि उनको घर का खर्च चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ी.

शायद ही कोई सोच सकता था कि मजदूरी करने वाला और एक कम पढ़ा-लिखा इंसान जिसके पास कोई खास जमीन भी नहीं हो, वह गो-पालन जैसे बिजनेस को एक नए मुकाम तक पहुंचा सकता है. गिर गौ जतन संस्थान एक ऐसे ही प्रयास के सफल होने की जीती जागती मिसाल है. रमेश रूपारेलिया ने News 18 से एक विशेष बातचीत में बताया कि उन्होंने 2008 में गिर गौ जतन संस्थान को पूरी तरह से व्यावसायिक तरीके से शुरू किया था. आज उनकी कंपनी के 150 गौ-आधारित उत्पाद 124 देशों में बिकते हैं. उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर 4 करोड़ रुपये है. जिसमें से एक करोड़ रुपये निर्यात से आते हैं. रमेश रूपारेलिया का कहना है कि गौ आधारित उत्पादों में वैल्यू एडिशन करना और उनकी डायरेक्ट मार्केटिंग पर जोर देने से किसी भी गौशाला को मुनाफे के बिजनेस में बदला जा सकता है. इसके लिए वे लोगों को ट्रेनिंग देने का एक 6 दिनों का प्रोग्राम भी चलाते हैं.

पुरखों के संचित ज्ञान के साथ टेक्नोलॉजी को जोड़ा
गो-पालन को एक सफल बिजनेस मॉडल साबित करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए रमेश रूपारेलिया ने पहले तो अपने पुरखों के संचित ज्ञान का उपयोग किया और बाद में मार्केटिंग के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी को अपना औजार बनाने से भी परहेज नहीं किया. गिर गौ जतन संस्थान इस समय 100 लोगों को सीधे रोजगार दे रहा है. इसके कर्मचारियों का वेतन न्यूनतम 6 हजार रुपये से लेकर 1.60 लाख रुपये तक है. आज गिर गौ जतन संस्थान में 150 गिर गाएं हैं. जिनमें से केवल 40 दूध देती हैं. इसके बावजूद रमेश रूपारेलिया का गिर गौ जतन संस्थान लाभ कमा रहा है.

Ramesh Ruparelia

संसाधनों की कमी ही एकमात्र समस्या नहीं
अपनी गौशाला को बनाने के लिए रमेश रूपारेलिया ने पहले तो किराए पर जमीन ली. उस जमीन पर उन्होंने गो-पालन के साथ खेती की और जो मुनाफा हुआ उससे वही 4 एकड़ जमीन खरीद ली. इसके साथ ही रमेश रूपारेलिया ने अपनी गायों के चारे की जरूरतों को पूरा करने के लिए 30 एकड़ जमीन किराए पर ली है. गुजरात में नरेंद्र मोदी जब मुख्यमंत्री थे तो सरकार ने गो-पालन को बढ़ावा देने में मदद करने के लिए किसानों को सहायता देने की योजना चलाई. जिससे तीन साल में गो-पालकों को 10 से 15 लाख रुपये की मदद मिल रही थी. गुजरात गौसेवा आयोग और गोचर विकास बोर्ड के माध्यम से इससे भी रमेश रुपारेलिया को कुछ संसाधन हासिल हुए. फिर भी रमेश रूपारेलिया के लिए सब कुछ आसान नहीं रहा. खाद्य विभाग से अपने उत्पादों की बिक्री के लिए जरूरी लाइसेंस लेने में उनको 9 महीने का समय लग गया. इतना ही नहीं जब उन्होंने अपने उत्पादों के निर्यात के लिए एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कोड लेने की कोशिश की तो एक कंसल्टेंट ने उनसे 10 हजार रुपये ले लिए, जबकि सरकारी फीस केवल 400 रुपये थी.

Ramesh Ruparelia

भविष्य पर जमी हैं निगाहें
गो-पालन को एक मुनाफे का बिजनेस बनाने के बाद अब रमेश रूपारेलिया की निगाहें भविष्य में एक ऐसा निजी विश्वविद्यालय बनाने का सपना देख रही हैं, जहां गो-पालन के सभी पहलुओं से जुड़े विषयों की पढ़ाई व्यावहारिक तरीके से हो सके. इससे देश के युवाओं को आत्मनिर्भर होने में मदद मिलेगी. उनका मानना है कि गौ आधारित इकोनॉमी को बढ़ावा देकर कई समस्याओं को खत्म किया जा सकता है. इससे रोजगार, खेती, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं को खत्म करने में सहायता मिल सकती है.

Ramesh Ruparelia

रांची के गोपालकों के बीच गुजरात के गिर गायों को पालने का बढ़ा प्रचलन, दूध के बेमिसाल फायदे

समझिये गो-पालन के धंधे का हिसाब-किताब
गिर गौ जतन संस्थान में कुल 150 गाएं हैं, जिनमें से दूध देने वाली गायों की संख्या 40 के आसपास रहती है. गर्मी के मौसम में रोजाना 250 लीटर दूध और सर्दी में 325 से 350 लीटर तक दूध होता है. पिछले 20 साल में रमेश रुपारेलिया के गिर गौ जतन संस्थान ने एक ग्राम भी दूध नहीं बेचा है. इस दूध से रोजाना 500 लीटर छाछ बनती है जो 20 रुपये लीटर बिकती है. इतने दूध से रोजाना 7 से 10 लीटर घी तैयार होता है, जिसकी कीमत 3500 रुपये लीटर है. इसके साथ ही घी में कुछ औषधियों को मिलाकर उसे 12000 से 51000 रुपये लीटर भी बेचा जाता है.

रमेश रुपारेलिया गोबर से कंडे बनाकर उसे यज्ञ और हवन के लिए अमेरिका, ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया और मुंबई में बेचते हैं. जबकि गोमूत्र से बायो फर्टिलाइजर और बायो मेडिसिन बनाते हैं. गौशाला में गायों के चारे और दाना पर साल में 35 लाख रुपये यानि करीब 3 लाख रुपये महीना का खर्च होता है. वे हर महीने अपने कर्मचारियों को 6 लाख रुपये वेतन भी देते हैं. रमेश रुपारेलिया ने ऑनलाइन मार्केटिंक के लिए गिर गौ जतन संस्थान में करीब 20 कंप्यूटर भी लगवाएं हैं. जिससे ऑनलाइन मार्केटिंक का काम सुचारू रूप से चलता है. जबकि उनकी कुल आय करीब 32 लाख रुपये महीना है. इस तरह के सफल बिजनेस मॉडल को बनाकर रमेश रुपारेलिया ने एक नई राह दिखाई है.

Tags: Business, Cow, Gaushala, Gujarat Rajkot, News18 Hindi Originals, Rajkot

विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर