गायों को बचाने के लिए जर्मन महिला ने किराए पर दी अपनी संपत्ति

News18.com
Updated: September 17, 2017, 3:02 PM IST
गायों को बचाने के लिए जर्मन महिला ने किराए पर दी अपनी संपत्ति
जर्मनी के बर्लिन की रहने वाली हैं इरिना. (फोटो साभार- Save cow, help cows/Facebook)
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Updated: September 17, 2017, 3:02 PM IST
जर्मनी की रहने वाली फ्रेडरिक इरिना ब्रनिंग साल 1978 में जब घूमने के लिए भारत आई थीं तब उन्होंने नहीं सोचा था कि वह यहीं की होकर रह जाएंगी. आज वह मथुरा की करीब 1200 गायों का ख्याल रख रही हैं और इसके लिए पैसे जुटाने के लिए उन्होंने बर्लिन की अपनी प्रॉपर्टी को किराए पर दे दिया है.

मथुरा तक के अपने सफर के बारे में इरिना कहती हैं, "मैं एक टूरिस्ट के तौर पर यहां आई थी. मैं यहां जिंदगी को समझने के लिए आई थी और इसके लिए आपको एक गुरु की जरूरत होती है. मैं गुरु ढूंढ़ने के लिए राधा कुंड गई." इसके बाद एक पड़ोसी के कहने पर उन्होंने एक गाय खरीदी और उनकी जिंदगी बदल गई.

इरिना ने गायों पर लिखी किताबें पढ़ीं और हिंदी सीखी. उन्होंने कहा, "मैंने देखा कि बूढ़ी होने पर जब गाय दूध देने के लायक नहीं होती तो लोग अपनी गायों को लावारिस छोड़ देते हैं."

इरिना को लोग प्यार से सुदेवी माताजी कहते हैं. उन्होंने सुरभाई गौसेवा निकेतन नाम से एक गौशाला शुरू की. वह गायों के बारे में कहती हैं, "वे मेरे बच्चों जैसी हैं. मैं उन्हें छोड़ नहीं सकती."

उनकी गौशाला 3300 स्क्वायर यार्ड के क्षेत्र में फैली है. जब भी कोई गाय वहां आती है वह उसका पूरा ख्याल रखती हैं. उसे खाना और दवाई देती हैं. उन्होंने कहा, "आज मेरे पास 1200 गायें और बछड़े हैं. मेरे पास और अधिक गायों को रखने के लिए जगह नहीं है. लेकिन फिर भी जब कोई बीमार, कमजोर या घायल गाय को मेरे पास लेकर आता है तो मैं मना नहीं कर पाती."

इरिना ने अपनी गौशाला में ऐसी गायों को रखने के लिए अलग जगह तैयार की है जिनपर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने गंभीर रूप से घायल गायों और जिनकी आंखें नहीं हैं उनके लिए भी अलग जगह बनाई है. वह बताती हैं दवाईयों, गायों के चारे और करीब 60 कर्मचारियों की तनख्वाह मिलाकर महीने में करीब 22 लाख रुपये का खर्च आता है.

उन्होंने बताया, "बर्लिन में मेरी कुछ संपत्ति है. उसे मैंने किराए पर दे रखा है. इसके पैसे आते हैं. शुरुआत में मेरे पिता मुझे कुछ पैसे भेज देते थे लेकिन अब वह सीनियर सिटिजन हो गए हैं. मैं हर साल उनसे मिलने के लिए बर्लिन जाती हूं. उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती. मुझे स्थानीय प्रशासन से कोई मदद नहीं मिल रही. लेकिन फिर भी मैं अपना काम कर रही हूं."

अपने काम में आ रही मुश्किलों पर वह कहती हैं, "मैं इसे बंद नहीं कर सकती. मेरे यहां 60 लोग काम करते हैं और उन्हें अपने बच्चों और परिवार का ख्याल रखने के लिए पैसों की जरूरत है. मुझे अपनी गायों का ख्याल रखना है, वे मेरे बच्चों जैसी हैं."

उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने उन्हें लॉन्ग टर्म वीज़ा भी नहीं दिया है. उन्हें हर साल अपना वीज़ा रिन्यू करवाना पड़ता है. उन्होंने कहा, "मैं भारत की नागरिकता नहीं ले सकती. यहां की नागरिकता लेने पर बर्लिन की प्रॉपर्टी से जो मुझे किराया मिलता है वह मिलना बंद हो जाएगा. मेरे पिता भारत में जर्मन एम्बेसी में काम करते थे. मैंने गौशाला में उनका पैसा लगाया है."
First published: September 17, 2017
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