जम्मू-कश्मीर में बेहद तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर, अध्ययन में हुआ खुलासा

जम्मू-कश्मीर में बेहद तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर, अध्ययन में हुआ खुलासा
यह अध्ययन नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के इलाकों समेत जम्मू, कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र पर किया गया

अपनी तरह के पहले अध्ययन में ऐसा दावा किया गया है कि हिमालय क्षेत्र (Himalayan region) में करीब 12,000 ग्लेशियर की बर्फ 2000 से 2012 के बीच सालाना औसतन 35 सेंटीमीटर तक पिघली है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 8, 2020, 7:51 PM IST
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श्रीनगर. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में ग्लेशियर (Glaciers in Jammu, Kashmir and Ladakh) काफी तेज गति से पिघल रहे हैं. अपनी तरह के पहले अध्ययन (Study) में ऐसा दावा किया गया है कि हिमालय क्षेत्र (Himalayan region) में करीब 12,000 ग्लेशियर की बर्फ 2000 से 2012 के बीच सालाना औसतन 35 सेंटीमीटर तक पिघली है.

यह अध्ययन नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के इलाकों समेत जम्मू, कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र पर किया गया और ग्लेशियर की मोटाई एवं द्रव्यमान में हुए परिवर्तनों को जानने के लिए कुल 12,243 ग्लेशियरों का अध्ययन किया गया.

पीर पंजाल क्षेत्र में ग्लेशियर तेज गति से पिघल रहे हैं
अध्ययन से संबंधित लेखक, प्रख्यात प्राध्यापक शकील अहमद रोमशू ने कहा, 'सामान्य तौर पर, यह पाया गया कि पीर पंजाल क्षेत्र में ग्लेशियर अधिक गति से प्रति वर्ष एक मीटर से अधिक की दर से पिघल रहे हैं जबकि काराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियर तुलनात्मक रूप से धीमी गति से यानी करीब 10 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से पिघल रहे हैं.’
ग्लेशियर पिघलने की दर अलग-अलग


श्रीनगर में कश्मीर विश्वविद्यालय में अनुसंधान के डीन, रोमशू ने समाचार एजेंसी पीटीआई-भाषा को बताया, 'काराकोरम क्षेत्र में कुछ ग्लेशियर यहां तक की बढ़ भी रहे हैं या स्थिर हैं. अन्य पर्वतीय श्रृंखलाओं जैसे वृहद हिमालयन पर्वत श्रृंखला, जंस्कार पर्वतमाला, शामाबरी श्रृंखला, लेह पर्वतमालाओं में ग्लेशियर बेशक पिघल रहे हैं लेकिन पिघलने की दर अलग-अलग है.'

अनुसंधान टीम ने नासा द्वारा 2000 में और जर्मनी की अंतरिक्ष एजेंसी डीएलआर द्वारा 2012 में किए गए उपग्रह अवलोकनों का इस्तेमाल किया. इस टीम में कश्मीर विश्वविद्यालय के भूसूचना विभाग के तारिक अब्दुल्ला और इरफान राशिद दोनों शामिल थे. उन्होंने इस आंकड़े का उपयोग 12,000 ग्लेशियर वाली समूची ऊपरी सिंधु घाटी में ग्लेशियर की मोटाई में हुए परिवर्तनों को निर्धारित करने के लिए किया.
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