जनजातीय समाज को भारत के विरुद्ध खड़ा करने का वैश्विक षड्यंत्र

जनजातीय समाज को भारत के विरुद्ध खड़ा करने का वैश्विक षड्यंत्र
नजातीय समाज को भारत के विरुद्ध खड़ा करने का वैश्विक षड्यंत्र (सांकेतिक तस्वीर)

भारत के 705 के लगभग जनजातीय समुदायों को हिन्दू धर्म से अलग पहचान खड़ी की जा रही है? जनजातीय समाज के लिए देश-विदेश की कई संस्थाएं अलग धर्मकोड के लिए या 2021 की जनगणना में हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मांग के लिए संघर्षरत हैं, ताकि विश्व पटल पर हिंदुओं की संख्या को कम किया जा सके.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 9, 2020, 5:31 AM IST
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- राजीव तुली

भारत के कुल क्षेत्रफल का 21% जंगल है और इसका 60% हिस्सा जनजातीय है. भारत के मुख्य खनिज 90% जनजातीय क्षेत्र में है. भारत की जनसंख्या का 8% हिस्सा जनजातीय समाज है. भारत के संदर्भ ये एक बड़ी संख्या है. क्या इस जनजातीय समाज को भारत के विरुद्ध खड़ा करने का कोई वैश्विक षड्यंत्र चल रहा है? वर्तमान परिस्थिति का ठीक तरह से विश्लेषण करेंगे तो इस विचार को गंभीरता से सोचने के लिए हमें मजबूर होना पड़ता है. पिछले कुछ सालों से मनाए जाने वाला 9 अगस्त का ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ कहीं इस वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा तो नहीं. इस बात पर हमें विचार करने और थोड़ा इतिहास खंगालने की आवश्यकता है.

वर्ष 1989 में आईएलओ द्वारा ‘राइट्स ऑफ इंडिजिनस पीपल’ कन्वेन्शन क्रमांक 169 घोषित किया गया, जिसे विश्व के 189 में से केवल 22 देशों ने स्वीकार किया, जिसका मुख्य कारण ‘इंडिजिनस पीपल’ शब्द की परिभाषा को स्पष्ट न करना था. इस संधि में हस्ताक्षर करने वाले वे देश मुख्य थे जिनकी आज भी उपनिवेशिक कॉलोनियां हैं और जहां बड़ी संख्या में वहां के मूलनिवासी लोग दूसरे दर्जे की नागरिकता का जीवन जी रहे हैं.



केवल 22 देशों के स्वीकार करने के कारण इस संधि को विफल माना गया. इसके बाद आईएलओ को इस विषय पर और अधिक आम राय बनाने का दायित्व सौंपा गया. इस दिशा में आगे बढ़ते हुए आईएलओ ने एक ‘वर्किंग ग्रुप फॉर इंडिजिनस पीपल’ का गठन किया. इसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को हुई थी. इसीलिए 9 अगस्त के दिन ‘विश्व इंडिजिनस पीपल डे’ मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की गई. कई देशों में इस दिन अवकाश मनाया जाने लगा. आज भारत में भी इसी 9 अगस्त को ‘विश्व मूल निवासी’ दिवस मनाने की प्रथा प्रारंभ हुई है.
सन 1492 को काफ़ी प्रयासों से, स्पेन और पुर्तगाल के राजाओं के मना करने के बाद भी कैथालिक मिशन द्वारा प्रदान की गई आर्थिक मदद से भारत के व्यापार मार्ग खोजने के मक़सद से निकला कोलंबस ग़लती से अमेरिका के पूर्वी तट पर जा पहुंचा. उस वक़्त समस्त अमेरिकी महाद्वीप पर मुख्यतः पांच मूल निवासियों का आधिपत्य था. वे थे चेरोकी (Cherokee), चिकासौ (Chickasaw), चोक्ताव (Choctaw), मास्कोगी (Muskogee) और सेमिनोल (Seminole). किनारे पर उतरने के बाद कोलंबस इसे भारत समझ बैठा और जिन लोगों को उसने देखा उन्हें इंडियन समझा. वह अक्टूबर के दूसरे सोमवार का दिन था. इसके बाद कुल चार समुद्री यात्रा में स्पेन, पुर्तगाल और ब्रिटिश ने अमेरिका में अपनी साम्राज्य बनाने की पूरी रूप रेखा बना ली थी. इतना विशाल देश होने के कारण अग्रेजों को लगभग 1600 ईसवी तक सुदूर इलाक़ों से संघर्ष का सामना करना पड़ा. सबसे पहला दोतरफ़ा युद्ध अंग्रेज़ों को आज के वर्जीनिया प्रांत में पवहाटन आदिवासियों से करना पड़ा. इन तीन युद्ध की सीरीज में पहला युद्ध 9 अगस्त को हुआ, जिसमें पूरे पोवहाटन क़बीले के लोग लड़ते हुए मारे गए. 250 वर्षों के नेटिव के साथ युद्ध और नरसंहार के बाद भी अधिक सफलताएं हाथ नहीं लगी. तब मिशनरियों के द्वारा मुफ़्त शिक्षा व इलाज के नाम पर उनसे साथ संबंध बनाए गए और बड़ीं संख्या में “सिविलाईज” कर उन्हीं को अपनी सेना में भर्ती कर आपस में लड़ाया गया.

तब ब्रिटिश सेना के प्रमुख सर जेफ़्री आमर्स्ट थे. उन्होने विश्व के पहले रसायनिक युद्ध के द्वारा छोटी चेचक, टीबी, कालरा, टाइफ़ॉईड जैसी घातक बीमारियों के जंतु-कीटाणु ओढ़ने के कंबल, रुमाल व कपड़ों में मिलाकर लगभग 80 % लोगों को मार दिया. साम्राज्य स्थापित करने के लिए ब्रिटिश सेना ने अमेरिका के मूल निवासियों के साथ यह भयावह हत्याकांड किया था. 1775 तक अंग्रेजों ने अमेरिका की भूमि पर अपना आधिपत्य लगभग स्थापित कर लिया था.

कोलंबस के आने के लगभग 250 वर्षों में मूल निवासियों का रक्तपात करके भी वे केवल थोड़े भू भाग पर ही क़ाबिज़ थे. तभी जॉर्ज वाशिंगटन और हेन्री नोक़्स के नेतृत्व में पहला ब्रिटिश अमेरिकी युद्ध शुरु हुआ और ‘इंडियन रिमुवल ऐक्ट 1830’ के तहत सभी मूल निवासियों को जोर ज़बरदस्ती मिसीसिपी नदी के उसपार धकेला गया. इस संघर्ष मे 30,000 लोग रास्ते में ही मर गए. यह घटना ‘आंसुओं की रेखा' कहलाती है. इस दरम्यान इतनी संख्या में लोग मर गए कि केवल 5 प्रतिशत मूलनिवासी ही जिंदा बचे थे.

12 अक्टूबर, 1992 को कोलंबस के अमेरिका आने के 500 वर्ष पूरे हुए. तब एक बड़ा जश्न मनाने की तैयारी चल रही थी. लेकिन इस उत्सवों के विरोध में ‘कोलंबस गो बैक’ नाम से एक अभियान चलाया गया. इस अभियान को शांत करने के लिए अपराध बोध के भाव से इस दिन को अमेरिका का इंडिजनस पीपल्स डे घोषित किया गया. संयुक्त राष्ट्र को विश्व मूलनिवासी दिवस भी 12 अक्टूबर को ही मनाना था. लेकिन अमेरिका में विरोध और ब्रिटेन-पोवहाटन युद्ध में ब्रिटेन की सत्ता वर्जीनिया प्रांत में स्थापित होने के कारण वहां धर्म प्रचार की शुरुआत करने का मौका प्राप्त हुआ. वह दिन भी 9 अगस्त ही था.

आज भारत के जनजातीय समूह एक भेड़चाल का हिस्सा बनकर 9 अगस्त ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ मानते हैं. जबकि अमेरिका मे रहने वाले मूलनिवासी इस दिन को अमेरिकी नरसंहारों का दिन मानते हैं. हर 9 अगस्त को कई हज़ार लोग संयुक्त राष्ट्र के बाहर इस दिन के विरोध में आंदोलन करते हैं. पिछले कई सालों से 9 अगस्त के दिन ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’ चर्च की अगुवाई में मनाया जाता रहा है. इसमें बड़ी संख्या में भारत विरोधी विचारों का प्रचार किया जाता रहा है. पत्थलगढ़ी जैसी घटनाएं इन अलगाववादी वैश्विक मूलनिवासी षड्यंत्रों का ही प्रभाव हैं.

अंतरराष्ट्रीय ताक़तें जनजातीय समाज को इस देश से तोड़ने का कार्य कर रही है. मूल निवासी दिवस मनाने के लिए प्रोत्साहित करने का इन शक्तियों का उद्देश्य भी वही है. इस षड्यंत्र को समझना होगा. इस दिन से हमारा कुछ संबंध है ही नहीं. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड जैसे देशों मे वहां के मूल निवासियों के साथ जो हुआ, उस प्रकार की परिस्थिति भारत मे निर्माण नहीं हुई. दुर्भाग्य से कुछ विदेशी ताक़तें जनजातीय समाज को गुमराह कर अन्य समुदायों के साथ लड़ाने का काम कर रही हैं. इसके लिए 9 अगस्त के दिन को उन्होंने एक हथियार के रूप मे इस्तेमाल किया है.

हाल के वर्षों में सूचना क्रान्ति और सोशल मीडिया ने इन भौगोलिक और भाषाई अवरोधों को लगभग हटा दिया है. विघटनकारी शक्तियां इनके उपयोग से बलवती हो रहीं हैं. इसके परिणाम भारत की अखंडता के लिए घातक हो सकते हैं. 11वीं सदी से ही धर्म के नाम पर युद्ध और व्यावसायिक समृद्धि एक-दूसरे की पूरक रही हैं. इसका आधार ‘न्यू क्रिश्चियन एकनॉमिक थ्योरी” है, जो अश्वेत या गैरयूरोपीय लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं. इसके लिए विकासशील देशों में विश्व की बड़ी यूरोपियन शक्तियां छद्मरूप से कार्यरत हैं, जो बहुत बड़ी संख्या में मानवीय कार्य के बहाने पहले धार्मिक परिवर्तन और फिर नए राष्ट्र के सिद्धांत पर कार्य करते हैं. मानवाधिकार, पहचान से लेकर अलग देश की मांग करने वाले समूहों को संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनपीओ सहायता प्रदान करती है. भारत से नगालैंड का संगठन (नागालिम) यूएनपीओ का सदस्य है, जो भारत से अलग देश की मांग कर रहा है. नॉर्वे और कई यूरोपीय देश, जातीय और धार्मिक आधार पर नगालैंड को अलग देश की हिमायत कर रहे हैं. पूर्वी तिमोर इसका ज्वलंत उदाहरण है.

1947 में अंग्रेजों द्वारा भारत के दो टुकड़े धार्मिक आधार पर किए गए. क्या इसीलिए बहुत बड़ी संख्या में भारत के 705 के लगभग जनजातीय समुदायों को हिन्दू धर्म से अलग पहचान खड़ी की जा रही है? जनजातीय समाज के लिए देश-विदेश की कई संस्थाएं अलग धर्मकोड के लिए या 2021 की जनगणना में हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मांग के लिए संघर्षरत हैं, ताकि विश्व पटल पर हिंदुओं की संख्या को कम किया जा सके. फिर मिशन संस्थाओं द्वारा इन नए धर्म को ईसाई धर्म में मिलाया जा सके, जो धार्मिक अलगाववाद का कारण बन सके. हमारे देश की विभिन्न राष्ट्रविरोधी ताकतें इसी दिशा मे काम करती हुई दिखाई दे रही हैं. हमारे देश के विभिन्न राज्यों विशेषतः छतीसगढ़, झारखंड, ओडीशा तथा महाराष्ट्र मे चल रहे विभिन्न आंदोलन तथा नक्सल आंदोलन इस अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा बनते जा रहे हैं. अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामजन्मभूमि मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम में जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान की बात कही थी, वही इन सब षड्यंत्रों का उत्तर है. जनजातीय समाज का संबंध राम और रामायण किन्ही से भी छुपा नहीं है.  (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
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