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got degree from iit in food processing now engaged in eradicating poverty by teaching tribals

फूड प्रोसेसिंग में IIT से ली डिग्री, अब किसानों को सिखाकर उनकी गरीबी हटाने में जुटे

किसानों की रुचि के हिसाब से उनको प्रशिक्षित करते हैं विशाल सिंह

किसानों की रुचि के हिसाब से उनको प्रशिक्षित करते हैं विशाल सिंह

विशाल सिंह का मानना है कि आने वाले समय में नौकरियों में वेतन 15 से 35 हजार रुपये के बीच ही रहने वाला है. ये वेतन किसी को उसके गांव में मिले तो वो ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर सकता है. क्योंकि महानगरों में रहने का खर्च बहुत ज्यादा है.

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भुवनेश्वर. कोई भी सामान्य इंसान यही सोचता है कि अगर किसी युवा ने आईआईटी की पढ़ाई की है तो वह किसी अच्छी नौकरी में जाएगा. ज्यादातर लोग तो यही सोचते हैं कि उसका विदेश जाने का सपना भी पूरा हो जाएगा. लेकिन चंदौली के रहने वाले विशाल सिंह ने एक अलग ही रास्ता चुना. प्रारंभिक पढ़ाई रामनगर के पीएन इंटर कॉलेज और बंगाली टोला इंटर कॉलेज से करने के बाद उन्होंने ओडिशा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, भुवनेश्वर से एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन की डिग्री ली और फिर आईआईटी खड़गपुर से फूड प्रोसेसिंग में पीजी किया.

विशाल सिंह की इच्छा शुरू से ही कुछ अलग हटकर करने की थी. थोड़े समय तक नौकरी और अध्यापन करने के बाद उन्होंने गांव के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने ज्ञान का उपयोग करने का फैसला किया. वह ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में लोगों के बीच आर्थिक स्वावलंबन की बिगुल फूंकने में जुट गए. उन्होंने कुछ समय तक ओडिशा की सेंचुरियन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का भी काम किया.

गांव में मिले युवाओं को रोजगार
विशाल सिंह का मानना है कि युवा पीढ़ी गांव में ही रहे और वहीं पर रोजगार करे. विशाल सिंह का मानना है कि जिस तरह से सरकारी नौकरियां सिकुड़ रही हैं और बड़े उद्योगों की जगह छोटे और मझोले उद्योगों का दबदबा बढ़ रहा है, उससे आने वाले समय में नौकरियों में वेतन 15 से 35 हजार रुपये के बीच ही रहने वाला है. अगर ये वेतन किसी को उसके गांव में मिले तो वो इंसान ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर सकता है. क्योंकि महानगरों में रहने का खर्च बहुत ज्यादा हो रहा है.

vishal singh

ओडिशा को बनाया कार्यक्षेत्र
विशाल सिंह ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई ओडिशा से की थी. इसलिए उनके कई दोस्त ओडिशा से हैं. पढ़ाई के समय वे ग्रामीण इलाकों में कुछ प्रोजेक्ट्स में शामिल हो चुके थे. इसके बाद जब उन्होंने सेंचुरियन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का काम किया तो कई युवाओं के संपर्क में आए. इसके कारण विशाल सिंह ने ओडिशा को अपना कार्यक्षेत्र बनाने का फैसला किया. इसके पहले वे शाहजहांपुर में एक राइस मिल में भी काम कर चुके थे. वह ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में किसानों और आदिवासियों को खेती और फूड प्रोसेसिंग का काम सिखाने में जुट गए. विशाल सिंह ने इसके लिए एक एनजीओ भी बनाया है. उनको महसूस हुआ कि ओडिशा में काम करना जरूरी है. क्योंकि वहां गरीबी बहुत ज्यादा है.

किसानों के प्रशिक्षण में रखा मौसम का ध्यान
पिछले 5 साल में विशाल सिंह करीब 40 हजार किसानों को अपने साथ जोड़ चुके हैं और उन्हें प्रशिक्षित कर चुके हैं. विशाल सिंह खुद एक किसान परिवार से हैं. इसलिए वे किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए समय और मौसम का पूरा ध्यान रखते हैं. मई, जून और जुलाई में विशाल सिंह किसानों को केवल पूरी तरह जैविक खेती का प्रशिक्षण देते हैं. जबकि इसके बाद वे किसानों को दूसरे कामों को सिखाते हैं. एक बार में 900 से 1200 तक लोगों को उन्होंने प्रशिक्षित किया है.

बनाया कई व्यवसायों का लाइव मॉडल
विशाल सिंह ने किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए खेती से जुड़े कुछ बिजनेस के लाइव मॉडल तैयार किए हैं. जिससे वे किसानों की रुचि के हिसाब से उनको प्रशिक्षित करते हैं. इनमें खेती, मछली पालन, औषधीय पौधों का तेल निकालना और फूड प्रोसेसिंग के मॉडल शामिल हैं. इसके साथ ही विशाल सिंह मशरूम के कई तरह के प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग भी देते हैं. कई कंपनियों की सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलटि) फंडिंग की मदद से आदिवासियों को जैविक खेती और फूड प्रोसेसिंग सिखाकर आत्मनिर्भर बना रहे हैं. उन्होंने खुद अपनी फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई है. जिसमें करीब 9 लोग काम करते हैं. इसके अलावा लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए करीब 6 लोग काम पर लगे हुए हैं. वे मशरूम के कई प्रोडक्ट बनाते हैं. कटहल के आटे से लेकर आम के अचार से अमचूर तक वे बनाते हैं. कटहल के आटे में प्रोटीन बहुत होता है. केले के चिप्स सहित कई प्रोडक्ट्स विशाल सिंह बनाते हैं.

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किसानों को देते हैं खेत से बाजार तक सहयोग
विशाल सिंह किसानों और आदिवासियों को केवल प्रशिक्षित ही नहीं करते हैं. वे उनको खेती से लेकर मॉर्केटिंग के काम में हर तरह की मदद भी करते हैं. वे स्वयं सहायता समूह बनवाने में मदद करते हैं. जरूरी तकनीकी जानकारी और बाजार से जुड़ने के लिए मदद देते हैं. वह मानते हैं कि हर ब्लाक में एक कॉमन फैसिलिटी सेंटर होना चाहिए. जहां पर किसानों को फूड प्रोसेसिंग की हर तरह की सुविधा दी जाए. उन्हें प्रशिक्षित किया जाए और जो किसान चाहे उसका फूड प्रोसेसिंग का काम इस सेंटर में हो जाए. वो उसे खुद बाजार में बेचे या फिर फूड प्रोसेसिंग सेंटर वाला ही उसकी मार्केटिंग करे. इसके अलावा एक कस्टमर हायरिंग सेंटर भी होना चाहिए. जहां किसान जरूरी उपकरण सस्ते दाम पर किराए पर ले सके.

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झारखंड में कार्य क्षेत्र बढ़ाकर करेंगे महुआ की प्रोसेसिंग
अगले साल उनका इरादा झारखंड में अपने काम को बढ़ाना है. विशाल सिंह अब महुआ की प्रोसेसिंग में लगने वाले हैं. अब वे महुआ का जूस, चॉकलेट, बेकरी प्रोडक्ट्स और लड्डू बनाएंगे. इन सामानों की बहुत मांग है. विशाल सिंह बताते हैं कि उनके उत्पाद भुवनेश्वर और रायपुर में ही खप जाते हैं. दूसरे शहरों में जाने लायक सामान बनाने के लिए उनको अपनी नई फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगानी पड़ेगी.

Tags: Farmer, Farmer story, Farming, Farming in India, News18 Hindi Originals

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