क्या सरकार की कश्मीर रणनीति सफल रही? आतंक का खात्मा ही नहीं, अब तक बनी रही शांति भी है जवाब

क्या सरकार की कश्मीर रणनीति सफल रही? आतंक का खात्मा ही नहीं, अब तक बनी रही शांति भी है जवाब
जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में दो आतंकियों को मार गिराया गया है. (सांकेतिक फोटो)

अगर हमारा प्राथमिक मकसद आतंकियों (Terrorists) का खात्मा होता और पाकिस्तान (Pakistan) की ओर से सीमापार होने वाली घुसपैठ को रोकना है, हम कह सकते हैं कि हमें सफलता मिल रही है.

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लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा
3 मई को, हमने उत्तरी कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों (counter-terrorist operations) के दौरान एक कमांडिंग अधिकारी और उनकी टीम की शहादत की दुखद खबर सुनी. लगभग तुरंत ही, सोशल मीडिया (Social Media) और वॉट्सऐप ग्रुप कश्मीर में सेना की संचालन प्रक्रियाओं में कमजोरियां निकालने में जुट गये, सुरक्षा बलों की हुई मृत्यु के बनाम आतंकियों की मृत्यु का और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद (Terrorism) की एक नई लहर के उदय को लेकर सूक्ष्म विश्लेषण किया जाने लगा.

तीन दिन बाद, आतंकवादी समूह हिजबुल मुजाहिदीन (Hizbul Mujahideen) के नेता रियाज नाइकू (Riyaz Naikoo) को दक्षिण कश्मीर में एक मुठभेड़ में मार गिराया गया. इसके बाद तुरंत ही यह सफलता मीडिया की सुर्खियों में आ गई कि हमारे शहीद बहादुरों का बदला कैसे लिया. यह भी दावा किया गया कि नाइकू की हत्या ने दक्षिण कश्मीर में पाकिस्तान समर्थक आतंकी संगठनों की कमर तोड़ दी है.

मीडिया वर्तमान को बढ़ावा देता है और भूत-भविष्य को भुला देता है



ये दोनों घटनाएं वही दिखाती हैं जिसे रॉबर्ट डी. कापलान 'वर्तमानता' का बढ़ावा कहते हैं. अपनी पुस्तक, 'द रिवेंज ऑफ ज्यॉग्राफी' (भूगोल का बदला) में, उन्होंने लिखा है, "मीडिया वर्तमानता को बढ़ाता है, गुस्से और उत्साह और मूल्यों- चाहे जो भी मामला वर्तमान में हो, अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए. दूसरे शब्दों में, मास मीडिया युग में राजनीति हमारे द्वारा अनुभव की गई बातों से ज्यादा गहरी होगी, क्योंकि अतीत और भविष्य हम इसमें दोनों को ही भूल जाएंगे.”



अकेली घटनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करने से न केवल कश्मीर (Kashmir) में राजनीति बल्कि संघर्ष के समाधान के लिए एक व्यापक रणनीति का मसौदा तैयार करने की बात भी जटिल हो जाती है. एक आतंकी हमले का बदला लेने के लिए सोशल मीडिया पर मांग की जा रही थी, जबकि एक सफल ऑपरेशन होता है तो वह इस मांग को पूरा करता है. जिसके चलते हम एक अच्छी तरह से सोचा-समझा रास्ते का अनुसरण करने के बजाय एक के बाद एक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते जाते हैं.

आतंकियों के खात्मे में भारत को मिली है बड़ी सफलता
यह अक्सर पूछा जाता है कि क्या हम जम्मू-कश्मीर में सफल हो रहे हैं. यह इस पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं, आपको अलग-अलग उत्तर मिल सकते हैं. मेरे हिसाब से, ज्यादा उचित सवाल यह होगा- इसके उद्देश्य और पैरामीटर्स क्या हैं जिनपर इस सफलता को मापा जा रहा है.

अगर हमारा प्राथमिक मकसद आतंकियों का खात्मा होता और पाकिस्तान (Pakistan) की ओर से सीमापार होने वाली घुसपैठ को रोकना है, हम कह सकते हैं कि हमें सफलता मिल रही है. 2015 से 1 हजार से ज्यादा आतंकियों को उनके शीर्ष नेताओं के साथ खत्म कर दिया गया है और कश्मीर में सिर्फ 250 सक्रिय आतंकी बचे हुए हैं. पाकिस्तान की ओर से अब भी आतंकियों की घुसपैठ जारी है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि नियंत्रण रेखा पर और उसके पार भारतीय सेना ने जो कार्रवाईयां की हैं, उनसे उस (पाकिस्तान) पर काफी दबाव है. इन सबको भारत की आक्रामक कूटनीति से और भी सहारा मिला है.

अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद, कश्मीरी आबादी का हुआ शांतिपूर्ण एकीकरण
हालांकि, अगर हमारा उद्देश्य शेष भारत के साथ कश्मीरी आबादी का शांतिपूर्ण मनोवैज्ञानिक एकीकरण है, तो इसमें सफलता मिली है. घाटी में आतंकवाद बड़े स्तर पर है और राज्य का एक बड़ा वर्ग अलग-थलग महसूस करता है. अनुच्छेद 370 (Article 370) के प्रावधानों को खत्म करने के बाद किए गए विकास के वादे को अब भी महत्वपूर्ण तरीके से लागू किया जाना है.

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