उपचुनाव 2020: गुजरात में कांग्रेस पर भारी पड़ गया उसी का नारा, बीजेपी के खाते में 8 सीटें

केके ध्रुव की जीत के बाद कांग्रेस में जश्न का माहौल है.
केके ध्रुव की जीत के बाद कांग्रेस में जश्न का माहौल है.

Gujarat By-Election Results: चुनाव में आपसी छींटाकशी होती रहती है, लेकिन इस बार कांग्रेस एक नारा लेकर आई ‘गांडो चालशे लेकिन गद्दार नहीं’ यानी ‘पागल चलेगा लेकिन गद्दार नहीं’ बीजेपी से चुनाव लड़ रहे पुराने कांग्रेसी विधायकों को कांग्रेस ने भरी सभाओ में गद्दार शब्दों से नवाजना शुरू किया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 11:37 AM IST
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अहमदाबाद. गुजरात की 8 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों (Gujarat By-Election Results) में बीजेपी ने अपना परचम लहराया है. राज्य की 8 की 8 सीटों पर बीजेपी ने कांग्रेस (Congress) को करारी शिकस्त दी है. वहीं, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी (CM Vijay Rupani) ने कहा, कांग्रेस एक डूबता हुआ जहाज है, वे लोगों से जुड़ाव खो चुके हैं. परिणाम उनके खिलाफ हर जगह हैं. विजय रुपाणी ने दो टूक शब्दों में कह दिया गुजरात बीजेपी का गढ़ है और रहेगा.

दरअसल इसी साल राज्यसभा चुनावों के वक्त कांग्रेस के आठ विधायकों ने अपने पदों से इस्तीफे दे दिए थे. इन्हीं इस्तीफों के बदौलत यह उपचुनाव जनता के सर आए. बीजेपी ने इस्तीफा दिए आठ कांग्रेस विधायकों में से पांच को उसी विधानसभा सीट से टिकट दिया. ऐसे में चुनाव बेहद रोमांचक बन गया. सरकार विधानसभा में एक कम्फर्ट बहुमत बनाने की कोशिश में लगी. जबकि कांग्रेस ने खाई हुई 8 सीटों को दोबारा से पाने के लिए चाल खेली.

‘पागल चलेगा लेकिन गद्दार नहीं’ 
बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने बिछी शतरंज पर चाल खेलना शुरू किया. हर चुनाव में आपसी छींटाकशी होती रहती है, लेकिन इस बार कांग्रेस एक नारा लेकर आई ‘गांडो चालशे लेकिन गद्दार नहीं’ यानी ‘पागल चलेगा लेकिन गद्दार नहीं’ बीजेपी से चुनाव लड़ रहे पुराने कांग्रेसी विधायकों को कांग्रेस ने भरी सभाओ में गद्दार शब्दों से नवाजना शुरू किया, लेकिन हर चुनाव की तरह इस बार भी मतदाता खामोश थे. कोरोना काल उसमें भी लॉकडाउन, बिगड़ते आर्थिक माहौल से मतदाता थोड़ा परेशान था. इन स्थितियों में मतदाता नकारात्मक प्रचार से दूरी बनाता दिखा. एक आम समझ यह भी की यह पूरे राज्य के चुनाव नहीं, उपचुनाव है. वैसे भी विधायक सत्तारूढ़ दल का होगा तो इलाके का विकास भी होगा. हालांकि इस बार कई मायनों में बीजेपी की रणनीति कांग्रेस पर भारी पड़ी.
निर्दलीय उम्मीदवारों ने काटे कांग्रेस के वोट


मसलन निर्दलीय उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर कांग्रेस की लीड को काटा जाए. अबडासा में हनिद बावा नामके निर्दलीय उम्मीदवार ने कांग्रेस के उम्मीदवार शांतिलाल सेघानी से भी ज्यादा वोट पाए ऐसा ही हाल मोरबी में दिखा पाटीदारो के वर्चस्व वाली इस विधानसभा सीट पर निर्दलियों ने कांग्रेस उम्मीदवार के ही वोट काटे और बीजेपी के उम्मीदवार कम वोटों से ही सही जीत गया.

बीजेपी ने रणनीति के तहत जीता चुनावी रण
कांग्रेस द्वारा उम्मीदवारों का चयन सही था लेकिन कांग्रेस के समर्थन में माहौल खड़ा न हो सका और केवल अच्छे उम्मीदवारों से चुनाव नहीं जीते जाते. जमीनी स्तर पर जनता की नाराजगी को वोटों में तब्दील करने की रणनीति सरासर विफल रही. वहीं, बीजेपी छोटी-छोटी चीजों पर भी काम करती रही. दौड़ में एशियन गेम्स विजेता सरिता गायकवाड को सरकार ने डिप्टी एसपी के तौर पर चुनावों से पहले पहले ही नियुक्ति दी. आदिवासी इलाको में इसका एक पॉजिटिव संकेत गया उसके अलावा चुनाव में खड़े किये गए आदिवासी उम्मीदवारों की इलाकें में मजबूत पकड़ तो थी ही. चुनाव प्रचार और बाकि रणनीति ने आदिवासी इलाको की दोनों-कपराडा और डांग सीटो पर जीत पक्की कर दी.

विजय रूपाणी ने खुद संभाला प्रचार का मोर्चा
ऐसा बिलकुल नहीं था की बीजेपी इस चुनाव में कुछ मजबूत स्थिति मे थी. बीजेपी की मुश्किलें कुछ अलग ही थी. संगठन के मुखिया के तौर पर सी आर पाटिल को जुलाई महीने में ही नियुक्त किया गया था. नया संगठन अभी बना नहीं था,यहां तक की जिला प्रमुखों तक की नियुक्तियां बाकी थी. जाहिर सी बात है पुराने संगठन के लोगों की रूचि इन चुनावों में इतनी नहीं होगी. संगठन से ज्यादा सरकार के लिए यह चुनाव अग्नि परीक्षा थे. ऐसे में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने खुद इसका मोर्चा संभाला था. दिन की दो से तीन रेलियां कर रहे थे. पूरा महकमा प्रत्येक सीट जिताने के लिए कोशिश में लगा था.

3 नवम्बर को जब वोटिंग हुआ ६० फीसदी जितना हुआ तो लगा की कहीं एंटी एनकम्बंसी तो नहीं होगी चूंकि उपचुनाव हो, वो भी कोरोना काल में तब इतना वोटिंग प्रतिशत कुछ अलग ही संकेत दे रहा था. लेकिन नतीजे आए तो केवल मोरबी को छोड़कर किसी भी सीट पर कांग्रेस की बीजेपी से कांटे की टक्कर भी नहीं हुई. शुरूआती रुझान में ही इतना अंतर बना की नतीजे आते आते कांग्रेस उम्मीदवारों ने हार स्वीकार करते खुद ने ही मत गणना केंद्र छोड़ दिया.



अब 8 की 8 सीटें जितने पर विधानसभा में बीजेपी की संख्या अब 111 हो गयी है जबकि कांग्रेस महज 65 सीटों पर सिमट कर रह गयी है. 2017 में जब विजय रूपाणी की अगुवाई में चुनाव लड़ा गया तब बीजेपी नर्वस नाईन्टी का शिकार बनते हुए केवल 99 सीटें ही जीत सकी थी लेकिन कांग्रेस के टूटने के बाद हुए उप चुनावों की बदौलत बीजेपी अब 111 के आंकडे पहुंच गई है.

वहींं, कांग्रेस ने इस करारी हार को जनता का जनादेश मानते हुए स्वीकार किया है, लेकिन इतना तय है यह जीत के असली हकदार मुख्यमंत्री विजय रूपाणी है चूंकि उन्होंने चुनाव को फ्रंट फूट पर खेला था. साथ ही में यह भी उतनी ही सचाई है की अगर हार भी होती तभी ठीकरा उनके सर ही फोड़ा जाता.
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