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ब्रांड राहुल कैसे दे पाएगा सुपर ब्रांड मोदी को टक्कर

पिछले दिनों एक कार्यक्रम में पीएम मोदी और राहुल गांधी का आमना-सामना हुआ था.

पिछले दिनों एक कार्यक्रम में पीएम मोदी और राहुल गांधी का आमना-सामना हुआ था.

राहुल गांधी के हाथ अबतक के करियर में सफलताओं से ज्यादा हार ही लगी है.

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    राजीव कुमार

    कांग्रेस के उत्तराधिकारी राहुल गांधी के औपचारिक रूप से राजनीति में शामिल होने के 13 साल हो पूरे हो गए हैं. वैसे तो ये नंबर भारतीय राजनीति के लिए कोई ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है. हालांकि ये अपने आप में राहुल गांधी के लिए काफी महत्वपूर्ण है, जो इस क्षेत्र में बाकियों  के उतने ही बराबर हैं.

    इस क्षेत्र में और लोगों के उलट वो एक परिवार से आते हैं-गांधी परिवार से! जिसके पास व्यावहारिक रूप से ब्लू-चिप स्टॉक है.

    अगर राहुल गांधी, विरासत में मिली गांधी परिवार की राजनीति को आगे बढ़ाते हैं तो ये वक्त है एक बार उन बातों पर ध्यान दिया जाए जो ब्रांड राहुल गांधी को ब्रांड नरेन्द्र मोदी जो अभी प्रधानमंत्री हैं, के बराबर लाएगा.

    साफतौर पर कहा जाए तो राहुल गांधी के हाथ अबतक के करियर में सफलताओं से ज्यादा हार ही लगी है. कांग्रेस की हालिया सफलताओं पर नजर डालें तो इसका श्रेय उनकी मां सोनिया गांधी को ही जाता है, जो राजनीति में अनचाहे और नए सदस्य की तरह शामिल हुईं लेकिन उन्‍होंने दो दशकों तक शासन किया.

    उनकी राजनीति में झिझक कुछ कांग्रेसी चाटुकारों की वजह से खत्म हुई, जो पार्टी को तत्कालीन अध्‍यक्ष सीताराम केसरी से आगे देखना चाहते थे.

    सोनिया के विपरीत, राहुल की अध्यक्षता में पार्टी 2014 के लोकसभा के चुनावों  में सिर्फ 44 सीटों पर सिमट कर रह गई.


    इसके बाद कांग्रेस को लगातार उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और असम में हार का सामना करना पड़ा. इसके अलावा, आलोचकों ने राहुल को ‘पप्पू और युवराज’ जैसे नाम से भी नवाजा. इनमें से कुछ शायद गलत भी हैं.

    पीएम मोदी बनाम राहुल गांधी

    राहुल के जल्‍‍‍द ही कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने की खबरों के बाद ब्रांड राहुल बनाम ब्रांड मोदी की बहस फिर से गर्म हो गई है. क्या इन दोनों ब्रांड को भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एकसाथ देखा जाना संभव है? खासकर जब वे दोनों प्रतिष्ठित प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिए दावेदार हैं?

    इस सवाल पर ब्रांड गुरु और हरीश बिजूर कंसल्ट्स इनकार्पोरेशन के संस्थापक हरीश बिजूर का कहना है, ‘दो ही क्यों? मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए कई लोग दावेदारी पेश कर सकते हैं, अलग-अलग छवि के लोग, लोगों की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं.’

    बीजूर के अनुसार, राजनीतिक हस्तियां, डिटर्जेंट और दूध से अलग नहीं होती हैं. उनका कहना है, ‘अलग-अलग ब्रांड अलग-अलग ऑफर के साथ मौजूद होते हैं और वे लोगों की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं.’

    वहीं इसमें इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीड इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट की प्रोफेसर जयश्री जेठवानी के तर्क हरीश बिजूर से अलग हैं. उनका कहना है, ‘कई ब्रांड एक साथ अस्तित्व में तो हैं लेकिन सुपरब्रांड एक ही बन सकता है. 2014 लोकसभा चुनाव इसका सबसे बेहतर उदाहरण है कि कैसे एक बाहरी दुनिया से आए व्यक्ति को देश के सबसे उंचे पद के लिए चुना गया और वह नमो ब्रांड बनकर उभरा.'

    लेकिन ब्रांड राहुल को कैसे इस जगह देखा जाए. क्या देश ऐसे किसी ड्राइवर के हाथ जिम्मेदारी देना चाहेगा जो अनियंत्रित है.

    मोदी के मुकाबले राहुल का अनुभव भी बहुत कम है. लेकिन जेठवानी इससे अलग पहलु पर देखती हुई कहती हैं, मतदाताओं के साथ ये कभी भी एक मुद्दा नहीं था, उनकी समस्या हमेशा वास्तविक मुद्दों पर होती है जो राहुल के लिए सकारात्मक साबित होगी.

    विशेषज्ञों का मानना है राहुल के साथ एक और महत्वपूर्ण समस्या है, उनकी स्थिरता की कमी. क्या उनका ऑन-एंड-ऑफ रवैया एक ब्रांड को टक्कर दे पाएगा.

    बिजूर का मानना है, ‘इस असंगतता को खुद कांग्रेस के अलावा कोई और ठीक नहीं कर सकता. दुर्भाग्य से, राजनीति एक 24 घंटे वाली नौकरी की तरह है. राजनीतिक दौड़ में आपको जरूरत है अपने प्रतियोगी से तेज दौड़ें.’

    वह राहुल के लिए नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहते हैं, पीएम मोदी ने एक लाइन खिंची जिसके साथ चलना बेशक मुश्किल है. लेकिन एक प्रतियोगी के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं है. उन्होंने कहा, ‘राजनीति में कभी संकट की स्थिति नहीं आती है जब आप समय के साथ उसकी बेहतर प्लानिंग कर लें. हमेशा एक्टिव होना बेहद जरूरी है.

    हालांकि जेठवानी को लगता है, ब्रांड राहुल के लिए अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है.

    उनका कहना है, ‘दिख रहा है कि राहुल मेहनत कर रहे हैं और जटिल मुद्दों पर बेहतर समझ रखते हैं. जेठवानी राहुल के गुजरात कैम्पेन को याद दिलाती हुई कहती हैं, ‘उनके भाषणों और विषयों दोनों में काफी सुधार हुआ है. अगर वे मुद्दों पर मतदाताओं का ध्यान आकर्षित कर सकने में और गुजरात में नए सामाजिक गठबंधन को एक साथ जोड़ने में सफल होते हैं तो एक बेहद दिलचस्प परिणाम देखा जा सकता है.

    जहां तक राहुल के नए उत्साह का सवाल है, कुछ राजनीतिक पंडित बता रहे हैं कि मोदी-लहर में अभी तक कहीं से कोई कमी नहीं आई है.


    बिजूर कहते हैं, ‘हां, कुछ हद तक एक समय बाद यह एक वजह हो सकती है. मोदी जरूर लोगों के प्रिय हैं लेकिन यहां सही और गलत वक्त का कोई भरोसा नहीं. आपको परिस्थिति देखकर बेहतर काम करने की जरूरत होती है.’

    जेठवानी कहती हैं, जनता की राय और उनके विचार हमेशा एक जैसे नहीं रहते, ये आपकी मेहनत और अपनी दिलचस्पी को देखते हुए बदलते रहते हैं.

    एक समय था जब भारत में लड़कों के लिए शादी की औसत उम्र लगभग 23 साल थी, राहुल अभी 47 के बैचलर हैं. भारत जैसे एक रूढ़िवादी देश में, जहां शादी के बंधन को, जीवन को गंभीरता लेने के रूप में देखा जाता है, वहां उनका कुंवारा होना उनकी छवि के लिए नुकसानदेह है?

    बिजूर इससे असहमत होते हुए कहते हैं, अब ऐसा नहीं है. यहां तक कि बैचलर होना पोजिटिव ही है, यह कहीं-न-कहीं एक कमिटमेंट को दिखाता है. समाज अब बदल गया है, लोग अब अलग तरीके से सोचते हैं.’

    देर से ही सही लेकिन राहुल का एक अलग चेहरा दिख रहा है. और इसका असर सोशल मीडिया पर काफी पोजिटिव दिखा है. बल्कि यह राहुल के सोशल मीडिया टीम का काम है लेकिन इससे उन्हें काफी मदद मिली है.

    बिजूर का कहना है, ‘ट्वीट राजनेता नहीं बनाते’ ये सिर्फ उन्हें उनका काम बना सकता है जो जनता के जीवन को छूता है.

    बिजूर ने अपने तर्क के समर्थन में दो कारण बताए.

    ‘सबसे पहले, सोशल मीडिया पर एक्टिव लोगों की संख्या कम और आला है. दूसरा, आपको वहां लाइक्स और रीट्वीट तो मिल सकते हैं, लेकिन आप अभी भी चुनाव नहीं जीत सकते.’

    वे कहते हैं, ‘मतदाता से अपने लिए वोट कराना आसन काम नहीं है. ट्वीट, फैंटेसी है और वोट वास्तविकता. जिसके लिए आपको जमीनी तौर पर कड़ी मेहनत करने की जरूरत पड़ती है.

    लेकिन क्या रीट्वीट पर राहुल के पुनरुत्थान की कल्पना करना सही है, जहां जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ऑफलाइन है?

    बिजूर कहते हैं, ‘सोशल मीडिया वाली छवि केवल 5% का योगदान देगी.’ वास्तविक छवि तो वास्तविक दुनिया में रहकर बनाई जा सकती है जहाँ मैं और आप रहते हैं.

    हालांकि, जेठवानी ने अपने आभासी आउटरीच में राहुल के लिए एक मौका देखा. उनके अनुसार, भारत का एक बड़ा वोट बैंक युवा हैं. आज के संदर्भ में कोई भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं के साथ जुड़ सकता है. लेकिन निश्चित रूप से, जमीनी मीडिया और लोगों के साथ बातचीत को साथ लेकर ही लाखों लोगों से जुड़ना होगा.’

    गुजरात कैम्पेन के दौरान राहुल गांधी के मंदिर जाने को लेकर काफी चर्चाएं हुईं. क्या राहुल सचमें सॉफ्ट-हिंदुत्व कार्ड खेलने की कोशिश कर रहे हैं. और यह एक बड़ी पुरानी पार्टी और खासकर उनकी छवि के लिए पोजिटिव साबित होगा?

    बिजूर कहते हैं, ‘हम एक धार्मिक राष्ट्र हैं और यही कारण है कि हमारे सारे राजनेता हैं धार्मिक जगहों पर जाकर नाच-गाना शुरू करते हैं.

    वह आगे कहते है, ‘एक नेता का व्यक्तित्व कई पहलुओं से मिलकर बना होता है. इसमें बेशक उनकी निजी छवि है, लेकिन उनके धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और कई अन्य पहलुओं पर भी निर्भर करता है. और इसे बनाना काफी मुश्किल है, मंदिर जाना तो एक छोटा सा हिस्सा है इसका.

    जेठवानी ने कहा, ‘और सिर्फ राहुल की ही बात क्यों करें, पीएम मोदी ने भी अहमदाबाद में स्वामीनारायण मंदिर का दौरा किया, जो कि पाटीदारों को खुश करने के लिए ही था.

    उनका मानना है, ‘वो हमेशा मंदिरों का दौरा करते हैं, ये भी एक खास वोटर को खुश करने के लिए हो सकता है. इसके अलावा ये महिला मतदाताओं से सॉफ्ट कॉर्नर पाने का एक तरीका है.’

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