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Bhojpuri में पढ़ें गुरु पूर्णिमा विशेष: अपना गुरु के मानस-पुत्री रही जा शारदा सिन्हा आ मालिनी अवस्थी

आज गुरु पूर्णिमा ह अउरी आज के दिन सभे अपना गुरु के जरूर इयाद करेला. काहें से कि जे भी कलावान बा, ज्ञानवान बा, उ गुरु के संगत के कारण बा. कहे के मतलब कि कला गुरु के आशीर्वादे से मिलेला.

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कला जीवन के उ सुंदर आभूषण ह, जे के अगर मानव धारण कर लेव त उ एगो हाड़-मास के पुतला से एगो मनुष्य के रूप पा सकेला. हमनी के वेद-पुराण में कई बार ई बात कहल गइल बा कि बिना कला, बिना ज्ञान के मानव पशु के समान होला. एकर माने बा कि रउआ आपन उद्धार करे चाहत बानी, पशु से मनुष्य बने के चाहत बानी त ज्ञान अर्जित करीं, कला के साधीं. अब सवाल बा कि ई कइसे होई? जवाब बा, गुरु के आशीर्वाद से. गुरु के अर्थ ही होला भारी, अउरी ज्ञान सबसे भारी होला. एही से गुरु उ ह जे ज्ञान देला, जे हर तरफ फइलल अंधकार में अंजोर देखावेला. जे भी कलावान बा, ज्ञानवान बा, उ गुरु के संगत के कारण बा. कहे के मतलब कि कला गुरु के आशीर्वादे से मिलेला. एकलव्य जइसन बुद्धिमान अउरी निपुण धनुर्धर के भी धनुर्विद्या सीखे खातिर गुरु द्रोणाचार्य के जरूरत पड़ल. उ सजीव ना सही, उनके मूर्ति ही एकलव्य के साधना के राह देखवलस.

आज गुरु पूर्णिमा ह अउरी आज के दिन सभे अपना गुरु के जरूर इयाद करेला. भारतीय इतिहास में शुरुए से गुरु-शिष्य परम्परा रहल बा. इहां गुरु अपना शिष्य के किताबी ज्ञान, कला-शिल्प, अभ्यास-साधना से लेके जीवन-मूल्य ले के सीख दिहले बाड़ें अउरी ओकरा के एगो बेहतर आ सफल इन्सान बनवले बाड़ें. हमनी के शुरू से गुरु पर निर्भर रहेनी जा. जइसे कि हमनी के पहिलकी गुरु माई होले अउरी हमनी के जनमते उनका प्रकाश से दुनिया देखेनी जा, सबकुछ समझेनी जा. फेर समय आ आवश्यकता के हिसाब से गुरु के रूप बदलेला.

शारदा सिन्हा के उनके गुरु अपना बेटी से बढ़ के मानत रहलें

जब हम गुरु पूर्णिमा पर हिंदी, भोजपुरी, मैथिली समेत अनके भाषा में गवनई खातिर मशहूर आ पद्म भूषण से सम्मानित शारदा सिन्हा से बात कइनी त उ बड़ा भाव-विभोर होके अपना गुरु लोग के बारे में बतवली. बकौल शारदा जी, बचपने में गला के तइयारी आ संगीत के बेसिक शिक्षा उ पं. रामचंद्र झा अउरी पं. रघु झा से लेहली. ओकरा बाद उनके स्कूल अउरी कॉलेज के पढाई चलत रहल. फेर उ ख्याल-गायन खातिर विश्वप्रसिद्ध ग्वालियर घराना के पंडित सीताराम हरी डानडेकर जी से गायन में प्रशिक्षण लेहली. उ बतवली कि अपना गवनई के फाइनल टच देबे खातिर उ श्रीमती पन्ना देवी जी के सान्निध्य में गइली. उनका सभ गुरु जी लोग के उनपर बहुते प्रभाव पड़ल. पंडित डानडेकर जी से जुड़ल एगो संस्मरण के बारे में उ बतवली कि गुरुजी के सामने एगो कार्यक्रम में उनका गावे के मौका मिलल. तब उ बड़ा घबराइल रहली. लेकिन उनके परफॉरमेंस के बाद जब उ अपना गुरु के चरण स्पर्श करे खातिर गइली त उनके गुरु जी आशीर्वाद के रूप में एगो बात कहलें जवन उनके अभियों इयाद बा. उ कहलें, “शारदा, तोहके ईश्वर तहरा गला में उ हरकत देहले बाड़ें जवन दस साल लगातार रियाज़ कइला के बाद आवेला, एकरा के संभाल के रखिहs.”

ई बात उनके अंदर जाके बइठ गइल, जवन उ कबो ना भुलइहें. पन्ना देवी जी से शारदा सिन्हा ठुमरी, दादरा अउरी कजरी सिखली. बकौल शारदा जी, हम कबीर के एगो भजन ‘मन लागो मेरो यार फकीरी में’ गावल करीं. एक बार उहाँ के सामने सुनवनी. उहाँ के हमके ओह भजन में कुछ जगह ठीक करे के कहनी और गाके बतइबो कइनी. हम उहाँ के ओ सीख के कंठस्थ कर लेहनी. एक बार भारतमाता मंडली के प्रोग्राम में पन्ना देवी जी सामने बइठ के हमार इहे भजन सुनत रहनी. भजन समाप्त होखते हमसे मिलनी अउरी एगो अइसन बात कह देहनी जवन हमसे आजुओ ना कहत बनेला. उ कहनी कि, ‘शारदा, हमार औलाद त ना गवलस लेकिन तू गइबू त लोग कही कि पन्ना ही गा रहल बाड़ी.” एकरा से बड़ आशीर्वाद हमरा खातिर का हो सकेला. उ हमरा के अपना बेटी के जइसन मानत रहली. हमरो मन में उनका खातिर माई जइसन प्रेम रहे. काश कि ओह बेरा इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स होइत आ हम उनका साथ के आपन तस्वीर सहेज पवतीं.

मालिनी अवस्थी खातिर अप्पा जी (गिरिजा देवी) सिर्फ गुरु ना माई जइसन रहनी

हिंदी समेत भारत के अनेक लोक भाषा जइसे अवधी, भोजपुरी, बुन्देलखंडी में आपन गायकी के परचम लहरावे वाली भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित मालिनी अवस्थी भी गुरु-शिष्य परम्परा पर आपन विचार साझा कइली. उ अपना गुरु अउरी ठुमरी गायन के जनमानस तक पहुँचावे वाली, सेनिया आ बनारस घराना के गायिका गिरिजा देवी के बारे में विस्तार से चर्चा कइली. बकौल मालिनी अवस्थी, हमनी के गुरु से केवल संगीते ना, जीवन जिए के शैली भी सीखनी जा. कुछ दिन पहिले हम घर में कुछ बोलत रहनी अउरी हमार बेटी हमसे कहलस कि “मां तुमने एकदम अप्पा जी जैसा बोला.” ई हमरा खातिर बड़ा सुंदर कॉम्प्लीमेंट रहे. हर शिष्य अपना गुरु के कुछ अंश अपना अंदर लिआवे चाहेला. हमनी के गिरिजा देवी जी के प्यार से अप्पा जी कहत रहनी हँ जा. अप्पा जी से हम संगीत के अलावा जीवन जिए के भी सीखनी. के तरे से उहाँ के अपना व्यस्त जीवनचर्या के बावजूद अपना पूरा परिवार के एक सूत्र में बांध के रखले रहनी. जब उहाँ के संगीत के दुनिया में कदम रखनी तब माहौल महिला खातिर बहुत कठिन रहे. केहू अपना बेटी के संगीत सीखे ना देव बाकिर उहाँ के पिता जी उहाँ के प्रोत्साहित कइनी. अप्पा जी एगो सशक्त अउरी सफल महिला के प्रतिमान भी रहनी. अप्पा जी सबके बराबर प्रेम करत रहनी. हम उहाँ से उदारता भी सीखनी.

उहाँ के बहुत सरल-सहज रहनी. जइसे आज के जमाना में उहाँ के कोटि के केहू शख्सियत बिना अपॉइंटमेंट के कवनो अजनबी से ना मिलेला. बाकिर उहाँ के दुआर अतिथियन खातिर हमेशा खुलल रहे. हमरा इयाद बा कि हम सब शिष्य लोग उहाँ से एक दिन सीखत रहनी जा अउरी अचानके दू गो आदमी अउरी एगो विदेशी लइकी अप्पा जी के सुने आ देखे आइल. उ लइकी ऑस्ट्रिया से रहे. अप्पा जी इशारे से सबके बइठे के कहनी आ अपना गायन में लागल रहनी अउरी हमनी के सिखावत रहनी. तीनो अजनबी तीन घंटा ले उहाँ के सुनत रहलें. अप्पा जी बिना बतवले ओ लोग के आवे खातिर कुछुओ ना कहनी, बलुक सभके भर पेट खिया-पिया के भेजनी. अइसन विनम्र अउरी मिलनसार रहनी उहाँ के. ई सब सीख रहे हमनी खातिर!

अप्पा जी कबो केहू से संगीत शिक्षा खातिर शुल्क ना लेहनी. जे जवना योग्य रहे, गुरु पूर्णिमा के दिने उहाँ के गुरु-दक्षिणा देव. कई गो लोग वस्त्र भी देव, कई लोग लिफाफा में रूपिया. उ प्रत्येक लिफाफा में से कुछ अंश अपना गुरु घराना में दे दीं. उहाँ के कहीं कि हमार शिष्य जवन भी दक्षिणा देला, ओकर एगो अंश हमरा गुरू-घराना में जाई. उहाँ के हमनी से भी भविष्य में अइसने करे के प्रेरणा दीं. उहाँ के अपना गुरु जी के परिवार के खूब मानत रहनी अउरी हर समय हर परिस्थिति में ओह लोग खातिर उपस्थित रहीं. उहाँ के ई सिलसिला अपना अंतिम दिन ले बनवले रहनी.

हमरा समझ में ई एगो बहुत सुंदर परंपरा ह अउरी हम एकरा के निभावे के पूरा कोशिश करेनी. जब भी उहाँ का हमनी के आशीर्वाद दीं त कहीं कि ‘तुमको गुरु घराने का आशीर्वाद लगे’. उहाँ के अपना हर शिष्य से आत्मीय संबंध रहे. एक बार जब उहाँ के हमरा घरे रुकल रहनी त साझीं के हमार पति ऑफिस से घरे अइनी आ अपना रूम में चल गइनी. हमरा अप्पा जी के अकेले छोड़ के उहाँ के पास रूम में जाये में थोड़ा अटपटा लागत रहे. अप्पा जी तुरते कहनी, “बेटा जाओ, पति काम से थक-हार के आया है उससे पानी-चाय पूछो, दिन कैसा बीता उसके बारे में पूछो.” हम तनी सकुचइनी त उहाँ के कहनी, “अरे मैं तो तुम्हारी मां हूं, तुम तबसे मेरे पास बैठी हो, जाओ जरा पति का हाल-चाल भी पूछ आओ.” हम उ सब सुंदर स्मृतियन के इयाद कs के अक्सर भावुक हो जानी. गुरु-शिष्य के सम्बन्ध हमरा विचार से एतना आत्मीय जरूर होखे के चाहीं.

( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य और सिनेमा के जानकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं. )

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