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ज्ञानवापी विवाद: जानिए क्या है हिंदू पक्षकारों का तर्क जिसे सुनकर कोर्ट ने दिया आदेश

अब पुरातात्विक विभाग काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी परिसर का सर्वे करेगा.

अब पुरातात्विक विभाग काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी परिसर का सर्वे करेगा.

आइए जानते हैं की ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi mosque) पर अपना मालिकाना हक जताने वाले पक्षकारों ने अदालत में दाखिल अपनी याचिका में क्या कहा. ये याचिका वाराणसी में भगवान विशेश्वर की तरफ से नेक्स्ट फ्रेंड की भूमिका में वाराणसी के रहने वाले विजय शंकर रस्तोगी व अन्य ने दाखिल की है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 8, 2021, 10:03 PM IST
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एहतेशाम खान
वाराणसी. वाराणसी के सिविल जज आशुतोष तिवारी ने गुरुवार को आदेश दिया की पुरातात्विक विभाग (Archeological Department) की एक पांच सदस्यीय टीम ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi mosque) का सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट कोर्ट को दे. इस आदेश को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद में अदालत की कार्रवाई भी इसी प्रकार शुरू हुई थी. इस मामले के अंतिम फैसले में पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को अहमियत दी गई थी.

आइए जानते हैं की ज्ञानवापी मस्जिद पर अपना मालिकाना हक जताने वाले पक्षकारों ने अदालत में दाखिल अपनी याचिका में क्या कहा. ये याचिका वाराणसी में भगवान विशेश्वर की तरफ से नेक्स्ट फ्रेंड की भूमिका में वाराणसी के रहने वाले विजय शंकर रस्तोगी व अन्य ने दाखिल की है.

बादशाह अकबर की कहानी का है जिक्र
याचिका में इस विश्वनाथ मंदिर या विशेश्वर मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास बताया गया है. कहा गया है की बादशाह अकबर के जमाने में एक बार वाराणसी और उसके आस-पास बहुत भयंकर सूखा पड़ा था. बादशाह ने सभी धर्म गुरुओं से बारिश के लिए दुआ करने का आग्रह किया. एक आग्रह वाराणसी के धर्म गुरु नारायण भट्ट से भी किया गया. नारायण भट्ट के दुआ करने पर 24 घंटे में ही बारिश हो गई. इससे बादशाह अकबर बहुत खुश हुए.



नारायण भट्ट ने बादशाह से भगवान विशेश्वर का मंदिर बनाने की इजाजत मांगी. बादशाह अकबर ने अपने वित्त मंत्री राजा टोडर मल को मंदिर बनाने का आदेश दिया. और इस तरह भगवान विशेश्वर का मंदिर ज्ञानवापी इलाके में बन गया. ये पूरा ज्ञानवापी इलाका एक बीघा, नौ बिस्वा और छह धूर में फैला है. मान्यता के मुताबिक खुद भगवान विशेश्वर ने यहां अपने त्रिशूल से गड्ढा खोद कर एक कुआं बनाया था जो आज भी मौजूद है. ज्ञानवापी परिसर में चार मंडप है. यहां पर धर्म का अध्य्यन किया जाता था.

औरंगजेब को दी गई थी गलत जानकारी
याचिका में लिखा गया है की 18 अप्रैल 1669 को किसी ने उस वक्त के बादशाह औरंगजेब को गलत जानकारी दी. बादशाह से शिकायत की गाई की मंदिर में अंधविश्वास सिखाया जा रहा है. फिर औरंगजेब ने मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया जिसका जिक्र अरबी भाषा में लिखी मा असीर-ए-आलमगीरी में है. ये किताब कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल में मौजूद है.

याचिका के मुताबिक मंदिर का कुछ हिस्सा ध्वस्त नहीं किया गया. और यहां पर पूजा होती रही. मंदिर के बगल में ही ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी गई जिसमे मंदिर के मलबे का इस्तेमाल हुआ. हालांकि याचिका में ये नही लिखा है कि मस्जिद किसने बनवाई. औरंगजेब ने या फिर वहां के लोकल मुसलमानों ने.

हिंदू-मुलसमानों में रहा है विवाद
तब से ही हिंदुओं और मुसलमानों में इस बात को लेकर विवाद होता रहा है. इस बाबत पहला दंगा 1809 में हुआ था. ज्यादातर विवाद मुसलमानों के मस्जिद के बाहर मंदिर के इलाके में नमाज पढ़ने की वजह से हुआ है. अंग्रेज अफसरों ने वक्त-वक्त पर सरकार को इस पर अलग-अलग राय दी है. याचिका में दावा किया गया है कि अंग्रेजों ने 1928 में पूरी जमीन हिंदुओं को दे दी थी. इस आधार पर हिंदू पक्षकार पूरे ज्ञानवापी परिसर पर अपना मालिकाना हक मांग रहे है.

हालांकि अभी ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी लंबित है. 1991 के प्लेस ऑफ वरशिप एक्ट के मुताबिक जो धार्मिक स्थल 15 अगस्त 1947 को जिस स्थिति में थी वो आगे भी ऐसी ही बरकरार रहेगा. इस कानून का हवाला देकर मुस्लिम पक्षकारों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को निचली अदालत में दर्ज मुकदमे को खारिज करने की मांग की है. फिलहाल निचली अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे करने का आदेश भले ही दे दिया हो लेकिन इस पर आगे हाईकोर्ट को भी निर्णय लेना है.
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