सारे विपक्षी दल साथ आ जाते तो भी... ‘आता तो मोदी ही’

सारे विपक्षी दल साथ आ जाते तो भी... ‘आता तो मोदी ही’
5 लाख रुपये तक आयकर छूट इस साल अंतरिम बजट में मध्यम आय वाले लोगों को राहत प्रदान करने के लिए मोदी सरकार ने पांच लाख रुपये तक के टैक्सेबल आय को आयकर से मुक्त कर दिया. इसका फायदा भी लोकसभा चुनाव में देखने को मिला है. दरअसल, मध्यम आय वाले लोगों की भारी तादाद है, जिन्होंने शायद कमल का बटन दबाने में काफी उत्साह जताया है.

उत्तर भारत के कई राज्य ऐसे हैं, जहां विपक्ष एक हो जाता तो भी बीजेपी को रोका नहीं जा सकता था.

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पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर लगातार एक लाइन चल रही है- ‘आएगा तो मोदी ही.’ अब मोदी आ गए हैं. बीजेपी और एनडीए रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन कर रही है. ऐसे में उन लोगों को एक आंकड़ा ज़रूर देखना चाहिए, जिन्हें लगता है कि विपक्षी एकता से मोदी या बीजेपी को रोका जा सकता था. यह आंकड़ा है वोट प्रतिशत का.

उत्तर भारत के कई राज्य ऐसे हैं, जहां विपक्ष एक हो जाता तो भी बीजेपी को रोका नहीं जा सकता था. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी का वोट प्रतिशत 50 या उससे ज्यादा रहा है. ऐसे में अगर विपक्ष मिल भी जाता तो कुछ नहीं बिगड़ता.

बीजेपी के वोट प्रतिशत के सामने कैसे टिकता संयुक्त विपक्ष
कुछ और राज्य ऐसे हैं, जहां बीजेपी का वोट प्रतिशत काफी ज्यादा है. कर्नाटक, छत्तीसगढ़, झारखंड और गुजरात में भी वोट प्रतिशत 50 या उससे ज्यादा है. एक उदाहरण उत्तर प्रदेश का ले लीजिए. कहा जाता है कि दिल्ली के सिंहासन का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है. यहां पिछली बार बीजेपी और सहयोगी पार्टी ने 73 सीटें जीती थीं.
उत्तर प्रदेश में मतों का अंतर काफी कुछ कहता है


इस बार उत्तर प्रदेश में बीजेपी का वोट प्रतिशत 49 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है. यहां पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन था. इन दोनों पार्टियों को मिलाकर करीब 37 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं. इस बात की खासी आलोचना हुई थी कि गठबंधन में कांग्रेस शामिल क्यों नहीं है. अगर कांग्रेस शामिल हो भी जाती, तो कुल वोट करीब 43 से 44 फीसदी होता. यानी तीन पार्टियों के मिलने के बाद भी अंतर छह फीसदी के करीब होता. इससे समझ आता है कि आप किसी को भी मिला लेते, लेकिन आना तो मोदी को ही था.

दिल्ली का भी उदाहरण ले लेते हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार यहां कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात कर रहे थे. कांग्रेस के कई नेता भी इसके पक्ष में थे. यह दावा किया जा रहा था कि अगर दोनों पार्टियां साथ आ गईं, तो बीजेपी एक भी सीट नहीं जीत पाएगी.

दिल्ली में आप और कांग्रेस मिलकर भी मुकाबले में नहीं थे
जितना आंकड़ा आया है, उसके मुताबिक दिल्ली में बीजेपी को 56 फीसदी के आसपास वोट मिल रहे हैं. कांग्रेस को 22 फीसदी के आसपास और आम आदमी पार्टी को 18 फीसदी के आसपास वोट मिल रहे हैं. दोनों मिलाकर 41 फीसदी होते हैं. उसके बाद भी बीजेपी से 15 फीसदी का फर्क है. इस फर्क को किसी भी लिहाज से भर पाना संभव नहीं है.

उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में जहां बीजेपी जीती है, वहां उसके उम्मीदवार का अंतर काफी बड़ा है. जहां वह हारी है, वहां अंतर काफी कम है. इसी से समझ आता है कि इस बार बीजेपी और बाकी पार्टियों के बीच कितना फर्क था. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार कहा था कि पार्टी को 50 फीसदी वोट लाने ही होंगे. इसी तरह विपक्षियों को साथ होने के बावजूद रोका जा सकता है. इस बार बीजेपी ऐसा करने में कामयाब हुई है. कम से कम ऐसे कई राज्यों में तो कामयाब हुई ही है, जहां की सीटें दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने के लिए बेहद अहम मानी जाती हैं.

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