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हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला पढ़कर सुप्रीम कोर्ट के जज बोले- सिर दर्द कर गया, लगाना पड़ा बाम

पीठ में मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे के अलावा जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रह्मण्यम भी शामिल हैं. (फाइल फोटो)

पीठ में मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे के अलावा जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रह्मण्यम भी शामिल हैं. (फाइल फोटो)

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (Himachal Pradesh High Court) के फैसले की कॉपी पढ़कर जस्टिस एमआर शाह ने कहा, 'मुझे तो जजमेंट के बारे में पता ही नहीं चल पाया. इसमें इतने लंबे-लंबे वाक्‍य हैं कि समझ में ही नहीं आ रहा है कि आखिर शुरू में क्‍या कहा गया है और अंत में क्‍या?'

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 13, 2021, 2:03 PM IST
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नई दिल्‍ली. सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल (CGIT) के एक मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (Himachal Pradesh High Court) का फैसला उस समय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के लिए परेशानी का सबब बन गया, जब काफी देर जजमेंट पढ़ने के बाद भी जज साहब को कुछ समझ में नहीं आया. इस बात से नाराज़ सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने हिंदी में कहा, 'ये क्‍या जजमेंट लिखा है. मैं इसे 10:10 बजे पढ़ने बैठा और 10.55 तक पढ़ता रहा, लेकिन मुझे अभी तक ये समझ नहीं आया कि कोर्ट आखिर कहना क्‍या चाहता है. हे भगवान! इस तरह की हालत अकल्पनीय है.'

इस पर जस्टिस एमआर शाह ने कहा, 'मुझे तो जजमेंट के बारे में ही अभी तक पता नहीं चल पाया है. इसमें इतने लंबे-लंबे वाक्‍य हैं कि समझ में ही नहीं आ रहा है कि आखिर शुरू में क्‍या कहा गया है और अंत में क्‍या कहा गया है? पूरे जजमेंट को पढ़ने के बाद एक कॉमा दिखाई भी दिया तो वो अटपटे और गलत तौर पर इस्‍तेमाल किया गया था. ये फैसला पढ़ते समय मुझे कई बार अपने ज्ञान और अपनी समझ पर भी शक होने लगा. मुझे फैसले का आखिरी पैरा पढ़ने के बाद अपने सिर पर टाइगर बाम लगाना पड़ा.'

जजमेंट की कॉपी पढ़कर नाराज जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, 'फैसला काफी सरल भाषा में लिखा होना चाहिए जो किसी भी आम आदमी को आसानी से समझ में आ जाए.' उन्‍होंने कहा कि जस्टिस कृष्‍ण अय्यर के फैसले हमेशा ऐसे ही होते थे. उनके जजमेंट पढ़ने वाले को लगता था कि जस्टिस कृष्‍ण अय्यर बोल रहे हैं और वह आसान भाषा में उसे समझ रहा है.
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बता दें कि ये मामला केंद्र सरकार के एक कर्मचारी की याचिका पर आधारित था, जिसमें हिमाचल हाईकोर्ट ने CGIT के आदेश पर अपनी मुहर लगाई थी. CGIT ने एक कर्मचारी को कदाचार का दोषी मानते हुए दंडित किया था. CGIT की ओर से की गई कार्रवाई के संबंध में दंडित कर्मचारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हालांकि जब उसे हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली तो वह सुप्रीम कोर्ट आया.
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