vidhan sabha election 2017

गुजरात में बीजेपी को 'ग्रहण' लगा सकते हैं ये ‘सप्तर्षि’!

Sanjay Kachot | News18Hindi
Updated: December 9, 2017, 9:04 AM IST
गुजरात में बीजेपी को 'ग्रहण' लगा सकते हैं ये ‘सप्तर्षि’!
Hardik patel, हार्दिक पटेल, Gujarat assembly election 2017, गुजरात विधानसभा चुनाव 2017, gujarat polls 2017, गुजरात चुनाव, PAAS, पास, congress, कांग्रेस, rahul gandhi, राहुल गांधी, patidar quota, पाटीदार कोटा
Sanjay Kachot | News18Hindi
Updated: December 9, 2017, 9:04 AM IST
गुजरात में पहले चरण के चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. जबरदस्त प्रचार, स्टार प्रचारक, सभाओं का सैलाब, जुमलेबाज़ियों का अविरत प्रवाह और सत्ताविरोधी सुरों की सप्तरंगी सरगम! पूरा देश आजकल  दिलो-दिमाग से 'सिर्फ कुछ नहीं, लगभग सारे ही दिन गुजरात में गुज़ार रहा है!' जिस प्रकार से चुनाव का बुखार चढ़ा हुआ है, उससे देश में शायद ही कोई होगा जो प्रभावित नहीं हुआ हो.

गुजरात में चुनाव लड़ रही राजनीतिक पार्टियों और खास रूप से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कि अगर बात करें तो इस बार हालात जरा मुश्किल दिख रहे हैं. समूचे देश में "भाजपा की प्रयोगशाला" माने जाने वाला भाजपा शासित गुजरात 2017 के चुनाव में कई मुश्किलों का सामना करता नज़र आ रहा है. खासकर, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर, प्रवीण राम जैसे युवा नेता और शंकर सिंह वाघेला, कनु कलसारिया तथा छोटू वसावा जैसे शीर्षस्थ और लोकप्रिय नेताओं ने भाजपा की नेतागिरी के नाक में दम कर रखा है.

हार्दिक पटेल
अहमदाबाद जिले के वीरमगाम तहसील के पाटीदार के इस 24 साल के लड़के ने आर्थिक रूप से पिछड़े पाटीदारों के लिए "आरक्षण" की मांग कर, 2015 में 'पाटीदार अनामत आंदोलन समिति" (पास) का गठन कर न सिर्फ पूरे राज्य में बल्कि पूरे देश में "पाटीदार आरक्षण" के लिए अभियान छेड़ दिया।

6 जुलाई, 2015 के दिन मेहसाणा के विसनगर से शुरू हुए इस अभियान ने आंनदीबेन पटेल सरकार की बलि चढ़ाई और गुजरात की पूरी राजनीती को ही बदल के रख दिया. याद रहे,  सवा छह करोड़ गुजरातियों में करीब एक करोड़ मतदाता पाटीदार हैं. हार्दिक की मुहीम से और उनकी सभाओं में उमड़ रही स्वयंभू भीड़ से पाटीदार प्रभावी लगभग 55 सीटों पर भाजपा को भारी नुकसान पहुंचेगा. हार्दिक को रोकने के लिए सेक्स सीडीस,  पुलिस दमन, सभा को संमति न देना, कथितरूप से झूठे केस दाखिल करवाना जैसे हथकंडो का भारी इस्तेमाल किया गया है लेकिन हार्दिक की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. गुरुवार को बोटाद से 3-डी स्क्रीन से 50 स्थलों पर हाईटेक प्रचार करके हार्दिक ने भाजपा की समस्याओं को और बढ़ा दिया है. "आप और आप के परिचित भाजपा को छोड़ किसी को भी वोट देंगे" ऐसी शपथ सूरत की सभा में दिलवाकर हार्दिक ने जैसे भाजपा के सामने सीधा युद्ध छेड़ दिया है !

जिग्नेश मेवानी
1982 में मेउ, मेहसाणा में जन्मे जिग्नेश मेवानी वैसे तो अहमदाबाद की एच.के.आर्ट्स कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर के विद्यार्थी रहे हैं. बाद में कानून में स्नातक और पत्रकारिता से भी जुड़े रहने वाले जिग्नेश लाइमलाइट में आए गोवंशिओ द्वारा प्रताड़ित किए गए जूनागढ़ जिले के ऊना के दलित युवकों के पक्ष में अभियान को छेड़कर.

15 ऑगस्ट, 2016 को अहमदबाद में करीब 20,000 से ज्यादा दलित समुदाय के लिए "दलित अस्मिता मंच" की अगुवाई करके जिग्नेश मेवानी जैसे गुजरात के दलितों के मसीहा बन गए. इस युवा के साथ कन्हैयाकुमार, अरुँधनी रॉय, स्वर्गस्थ गौरी लंकेश और कई एक्टिविस्ट ग्रुप जुड़ने लगे. शुरू में अपने आपको राजनीती से दूर बताने वाले जिग्नेशने आखिरकार उत्तर गुजरात के वडगाम से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में नामांकन भर ही दिया. कांग्रेस ने जिग्नेश को समर्थन घोषित किया है. जिग्नेश गुजरात की करीब 13 से भी ज्यादा दलित प्रभावी सीटों पर भाजपा को असर कर सकता है.

अल्पेश ठाकोर
2011 में "क्षत्रिय ठाकोर सेना" का गठन करने वाले 40 वर्षीय यह युवा ओबीसी नेता ने ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ में फैली सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की मंशा लिए "OSS (OBC, SC, ST) एकता मंच" से प्रारम्भ तो किया, लेकिन इनकी कथित रूप से छुपी इच्छा यह थी की हार्दिक पटेल द्वारा शुरू किया गया "पाटीदार अभियान" कहीं अनुसूचित जाति-जनजातियां और अन्य पिछड़ों को मिले आरक्षणों में सेंध न दाल दे. शायद इसी वजह से अल्पेश को पाटीदारों के सामने इन सारी जातियों ने आपना नेता घोषित कर दिया. दारुबंदी के खिलाफ अल्पेश द्वारा शुरू किये गए अभियान को सरकार ने गंभीरता से लिया और कानून में भारी सुधार भी किये.

बावजूद इसके भाजपा सरकार अल्पेश को अपने पक्ष में नहीं ले पायी और वह बाकायदा कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस ने भी उत्तर गुजरात के राधनपुर से उन्हें टिकट देकर सक्रिय राजनीती का हिस्सा बना दिया. अल्पेश ठाकोर उत्तर गुजरात के मेहसाणा, पाटन, पालनपुर, डीसा, उंझा, मानसा, हिम्मतनगर, अहमदाबाद के आसपास की विधानसभा क्षेत्र में बसे ठाकोर मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं.

प्रवीण राम
गुजरात सरकार में ‘फिक्स्ड पे’ पर काम कर रहे तक़रीबन 4.5 लाख और कॉन्ट्रैक्ट पर रहे 10 लाख सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों के लिए "जन अधिकार मंच' से लड़ने वाले प्रवीण राम मूलतः अन्य पिछड़े समुदाय के 27 साल के युवा नेता हैं.

यह प्रवीण राम की मुहीम का ही असर था की गुजरात सरकारको सांतवे वेतन आयोग के तहत सैलरी में बढ़ोतरी करनी पड़ी. प्रवीण राम भी भाजपा से पीड़ित होकर, कांग्रेस का रुख कर चुके हैं. इस युवा नेता जूनागढ़ के तलाला सीट के कांग्रेस उम्मीदवार भगवान धाना बारद को अपना समर्थन जाहिर कर चुके हैं. प्रवीण राम जूनागढ़ जिले में सोमनाथ, तलाला, केशोद, मांगरोल, जूनागढ़, मेंदरडा, ऊना, केशोद जैसी सीटों पर भाजपा को परेशान कर सकते है.

शंकरसिंह वाघेला
मूलरूप से जनसंघी और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके शंकरसिंह वाघेला राजकीय शंतरज के बड़े खिलाडी माने जाते हैं. जनसंघ, भाजपा, राष्ट्रीय जनता पार्टी, कांग्रेस और अब 'जन विकल्प मोर्चा' का गठन करने वाले ये बेबाक नेता 2017 के चुनाव में राज्य की करीब 100 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रहे हैं.

राजपूत, ठाकोर, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति-जनजातियों पर पकड़ रखनेवाले इस नेता के प्रत्याशी भले ही जित न पाए, लेकिन ये वोटों का बंटवारा करके भाजपा और कांग्रेस दोनों को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में है. उत्तर गुजरात, अहमदाबाद और मध्य गुजरात पर उनकी पकड़ से करीब 50 से ज्यादा बैठकों पर शंकरसिंह वाघेला का प्रभाव रहेगा.

छोटू वसावा
अलग "भिलिस्तान" की मांग कर रहे छोटुभाई वसावा मूलरूप से भील आदिवासी नेता हैं और 2007 से जनता दल से झगड़िआ सीट से लगातार चुनाव जीतते आए हैं. छोटुभाई के एक वोट ने गुजरात में हुए राजसभा इलेक्शन का रुख बदल दिया था. यही वजह है की कांग्रेस ने इस बार छोटू वसावा द्वारा बनाई गई "भारतीय ट्राइबल पार्टी" के साथ 5 सीटों पर गठबंधन कर लिया.

पंचमहाल, गोधरा, छोटा उदेपुर, वाघोदिया, दाहोद, डेडियापाडा, मांगरोल, मोरवा हदफ़ और दक्षिण गुजरात के आदिवासी प्रभावी क्षेत्रों पर छोटू वसावा और उनकी पार्टी भाजपा को जबरदस्त टक्कर दे सकती है. आदिवासी मतदाओं में छोटुभाई की इस कदर लोकप्रियता है की वो वोट मांगते नहीं, लोग सामने से उन्हें वोट देने चले जाते है !

डॉ. कनु कलसारिया
बड़े ही सेवाभावी, स्वच्छ और गाँधीवादी नेता डॉ. कनु कलसारियाने अपने डाक्टरी के पेशे से लाखों लोगों की सेवा की. राजकीय स्वरूप में सेवा का बीड़ा उठाया तो पहलीबार केशुभाई सरकार में वह भाजपा से 1997 में चुनकर आए. बाद में भाजपा से ही वो 2002 और 2007 के चुनाव महुवा (भावनगर) से जीते. हालाँकि, महुवा में निरमा के प्लांट के खिलाफ चले किसानों के आंदोलन में नेतागिरी को लेकर उनकी तत्कालीन राज्य सरकार के साथ भारी अनबन हुई और उन्होंने भाजपा से इस्तीफा दे दिया.

2011 में पर्यावरण मंत्रालय ने इस प्लांट को नामंजूर किया. बाद में वह "सद्भावना मंच' बनाकर गारियाधार से चुनाव लड़े लेकिन हार गए. 2014 में वो आम आदमी पार्टी (आप) से जुड़े. अब निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उन्होंने उम्मीदवारी की है. कनु कलसारिया की 'क्लीन इमेज" आज भी  भावनगर, अमरेली और सौराष्ट्र के कई लोगों को लुभाती है. वह सौराष्ट्र के इस इलाकों में मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं.

 
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर