गुजरात में हार्दिक पटेल का कद बढ़ाने के पीछे कांग्रेस का है बड़ा मकसद

गुजरात में हार्दिक पटेल का कद बढ़ाने के पीछे कांग्रेस का है बड़ा मकसद
हार्दिक पटेल को गुजरात कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है.

कांग्रेस (Congress) आजादी के बाद पहले चार दशकों तक उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में उच्च जातियों और दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों जैसे सबसे अधिक हाशिए के समुदायों के बीच एक साथ गठबंधन करने में कामयाब रही. इस प्रक्रिया में कांग्रेस पिछड़े समुदायों पर ज्यादा निर्भर थी, जिसमें कुर्मी (Kurmis) भी थे.

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(सुमित पांडे)

नई दिल्ली. लंबे समय से गुजरात में आपसी मतभेदों से जूझ रही कांग्रेस (Congress) ने पाटीदार नेता हार्दिक पटेल (Hardik Patel) को प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. पाटीदार आरक्षण आंदोलन से निकले हार्दिक पटेल के खिलाफ कई केस भी चल रहे हैं. पिछले काफी समय से हार्दिक पटेल कांग्रेस में काफी सक्रिय भी हैं. ऐसे में सवाल ये है कांग्रेस ने आखिर हार्दिक पटेल को अचानक इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों दी. ये समझने के लिए हमें 8 साल पीछे जाना होगा.

साल 2012 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. तब राहुल गांधी चुनाव अभियान के लिए यूपी के दौरे पर थे. मायावती राज्य की सत्ता में थीं. 2009 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी को करारा झटका लगा था. वहीं, कांग्रेस यूपी के जरिए केंद्र की सत्ता हासिल करने के लिए ताबड़तोड़ रैलियां कर रही थी.



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इसी दौरान मध्य यूपी में एक चुनावी सभा से पहले राहुल गांधी ने काफिला रोका और यह जानना चाहा कि बेनी प्रसाद वर्मा कहां हैं? ये शब्द गोंडा के सांसद तत्कालीन सांसद बेनी प्रसाद वर्मा तक भी पहुंचे, जो मनमोहन सरकार में इस्पात मंत्री भी रह चुके हैं. तब बेनी प्रसाद ने कहा था- 'राहुल जी रास्ते में मेरे लिए इंतजार कर रहे थे. मेरे आने के बाद ही उनका काफिला आगे बढ़ा.' बता दें कि 27 मार्च 2020 को बेनी प्रसाद वर्मा का निधन हो चुका है.

2009 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले वर्मा के कांग्रेस में शामिल होने से पार्टी को उन क्षेत्रों में छह सीटें जीतने में मदद मिली थी, जहां उन्होंने कुर्मी समुदाय को प्रभावित किया था. ये सीटें थीं यूपी की गोंडा, बाराबंकी, बहराइच, श्रावस्ती, फैजाबाद और खीरी.


यह कांग्रेस का पहला प्रयास था, जिसमें पिछड़े-विशेष रूप से कुर्मी राजनीति पर फोकस किया गया था. मुलायम सिंह यादव के पुराने और भरोसेमंद बेनी प्रसाद वर्मा और अमर सिंह के दबदबे के साथ कांग्रेस के पास एक ऐसा मौका था, जिससे सपा के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती थी.

यूपी और बिहार में यादवों के बाद कुर्मी संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ी भूमि-स्वामित्व वाली पिछड़ी जाति समूह है. बिहार में ये समुदाय काफी हद तक नीतीश कुमार की वजह से जनता दल (यूनाइटेड) से जुड़ा हुआ हैं.

यूपी में कुर्मी समुदाय ने स्थानीय नेतृत्व के प्रभाव में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ समय-समय पर गठबंधन किया. उदाहरण के लिए, अवध क्षेत्र में वर्मा के कारण कुर्मी वोटों पर सपा की पकड़ थी. रूहेलखंड क्षेत्र में कुर्मी आर्थिक और सामाजिक रूप से बीजेपी के साथ थे. पूर्वी यूपी और बुंदेलखंड में जंग बहादुर पटेल और सोने लाल पटेल जैसे कुर्मी नेताओं ने बहुजन समाज पार्टी को 1990 के दशक की शुरुआत में समुदाय में बढ़त बनाने में मदद की. बरेली में संतोष गंगवार ने ये काम किया था.

उत्तर प्रदेश के बाहर कुर्मियों को कई अन्य जाति नामों से जाना जाता है. महाराष्ट्र में कुनबी, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाटीदार या कुर्मी. गुजरात के पाटीदार या पटेल हालांकि राजनीतिक रूप से सबसे अधिक संगठित और प्रभावशाली हैं.


कांग्रेस आजादी के बाद पहले चार दशकों तक उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में उच्च जातियों और दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों जैसे सबसे अधिक हाशिए के समुदायों के बीच एक साथ गठबंधन करने में कामयाब रही. इस प्रक्रिया में कांग्रेस पिछड़े समुदायों पर ज्यादा निर्भर थी, जिसमें कुर्मी भी थे.

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गुजरात में भी कांग्रेस ने परेश दानानी जैसे एक युवा पाटीदार प्रतिनिधि को 2017 में चुनाव लड़ाने के बाद विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में नामित किया था. अब हार्दिक पटेल को राज्य कार्य अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो सीधे तौर पर कुर्मी वोट बैंक को साधने की कोशिश है. (अंग्रेजी में इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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