जिस लड़की को पति ने सातवीं मंजिल से फेंक दिया, वो फिल्‍म कबीर सिंह की प्रीती है

मां-बाप चाह लें तो किसी पति की रीढ़ में इतना दम नहीं कि लड़की को फेंक दे सातवीं मंजिल से. आपने उसे पैदा किया था. आप ही हैं उसकी मौत के जिम्‍मेदार.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 12, 2019, 11:59 AM IST
जिस लड़की को पति ने सातवीं मंजिल से फेंक दिया, वो फिल्‍म कबीर सिंह की प्रीती है
प्रॉब्‍लम कबीर सिंह नहीं, प्रॉब्‍लम प्रीती सिक्‍का है
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 12, 2019, 11:59 AM IST
हिंदी प्रदेश के शहर कानपुर में एक अपर-मिडिल क्‍लास परिवार में पैदा हुई 28 साल की लड़की हर्षिता. मां-बाप इस घमंड में इतराते हुए कि वो बेटी को बहुत प्‍यार करते हैं. लड़का-लड़की में भेद नहीं करते. उन्‍होंने बेटी की हर ख्‍वाहिश पूरी की. कॉलेज भेजा, हायर एजूकेशन दी, शादी की. सबकुछ ठीक वैसे ही तो किया, जैसे किसी अच्‍छे, समझदार मां-बाप को करना चाहिए.

लेकिन ये सबकुछ अच्‍छा-अच्‍छा कर रहे अच्‍छे मां-बाप की अच्‍छी बेटी को एक दिन उसके पति और सास-ससुर ने मिलकर दहेज के लिए घर की सातवीं मंजिल से धक्‍का दे दिया. लड़की गिरकर मर गई.



लड़की मर गई. मां-बाप रो रहे हैं. अब पुलिस, थाना, कोर्ट-कचहरी करेंगे, पति को जेल भिजवाएंगे, सास-सुसर को सलाखों के पीछे सड़वाएंगे. किसी छोटे शहर, छोटी जाति, छोटे क्‍लास के गरीब, दबे-कुचले लोग नहीं हैं. अपर कास्‍ट हैं, पैसे वाले हैं. इतना तो वो कर ही लेंगे.

पूरा कानुपर शहर हैरान है. दुखी है. अखबार रोज हर्षिता के लिए इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं. एक्टिविस्‍टों ने जुलूस निकाले हैं. महिला अधिकार वाले कचहरी में सभा कर रहे हैं. पूरा शहर सड़कों पर उतर आया है.

1999 की बात है. इलाहाबाद की सबसे पॉश कॉलोनी अशोक नगर में ऊंचे से गेट और बड़े से गार्डन वाली विशालकाय कोठी में रहने वाले एक परिवार ने ऐसे ही अपनी बहू को दहेज के लिए जलाकर मार डाला. लड़की मर गई तो मां-बाप और भाई की आंख खुली. विमेन एक्टिविस्‍टों ने कचहरी में धरना दिया. सभा की. सबने कहा कि दहेज के हत्‍यारों को फांसी हो. मर गई लड़की का जिंदा भाई बोलने खड़ा हुआ तो बहुत कुछ बोला. लड़की के पति और ससुराल वालों को सौ लानतें भेजीं.

कानुपर की हर्षिता, जिसे पति और ससुराल वालों ने सातवीं मंजिल से फेंक दिया
कानुपर की हर्षिता, जिसे पति और ससुराल वालों ने सातवीं मंजिल से फेंक दिया


उस दिन वो इतना कुछ बोला, लेकिन एक बात नहीं बोला. वो नहीं बोला कि जब मेरी बहन ससुराल में पिट रही थी तो हमने उसकी कोई मदद नहीं की. जब वो उस घर को छोड़कर हमारे पास उम्‍मीद और मदद के लिए आई तो हमने “अब पति का घर ही तुम्‍हारा घर है,” कहकर उसे वापस भेज दिया. जब उसने अपनी तकलीफ बताने की कोशिश की तो हमने उसे सहने और एडजस्‍ट करने का पाठ पढ़ाया. मेरी मां ने विदा करते हुए उससे वही कहा था, जो उनकी मां ने उनसे कि “पिता के घर से डोली और पति के घर से अरथी उठती है औरत की.” तो वही तो हुआ जो आपने चाहा था. उठ गई अरथी उसकी. बिना मरे छोड़ा नहीं उसने पति का घर. न आपने छुड़वाया. उस लड़की का भाई सबकुछ बोला, लेकिन ये नहीं बोला कि मेरी बहन नहीं मरती, अगर हमने मदद कर दी होती. अगर एक बार उसका हाथ थाम लिया होता. एक बार भरोसा दे दिया होता.
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ये सारे पढ़े-लिखे, मध्‍यवर्गीय लड़कियों को अंग्रेजी स्‍कूल में पढ़ाने और जींस पहनाने वाले लोग ये मुगालता पालकर बैठे हैं कि वो बड़े आधुनिक हैं. वो लड़कियों को न दबाते हैं, न कूटते हैं. लेकिन फिर भी उनकी जीती-जागती लड़कियां आग में जला दी जाती हैं, सातवीं मंजिल से फेंक दी जाती हैं और उन्‍हें मरने से पहले भनक भी नहीं लगती.

क्‍या कानपुर वाली हर्षिता के मां-बाप ने एक भी बार खुद से ये सवाल पूछा कि कहीं गलती हमारी तो नहीं? कहीं हमने ही अपनी बेटी को सहना और चुप रहना तो नहीं सिखाया. अगर एक बार भी लड़की बोले कि उसके पति ने या दुनिया में किसी ने भी उस पर हाथ उठाया तो उन्‍हें क्‍या करना चाहिए था. या तो आपने ये सिखाया होता कि अपने ऊपर उठा हुआ हाथ तोड़ देना या फिर ये भरोसा ही दिया होता कि कोई तुम्‍हें छूकर देखे, हम तोड़ देंगे.



नहीं, आपने उसे क्‍या सिखाया? आपने उसे अच्‍छी लड़की बनना सिखाया. और अच्‍छी लड़की कैसी होती है? अच्‍छी लड़की सहनशील होती है, घर की इज्‍जत बचाने वाली होती है, पति की बुराई नहीं करती, उसे प्‍यार से ठीक करती है, अच्‍छी लड़की सहकर भी चुप रहती है. पलटकर जवाब नहीं देती, न थप्‍पड़ के जवाब में थप्‍पड़ रसीद करती है. अच्‍छी लड़की की अच्‍छाई के गुण उसके जलने और सातवीं मंजिल से धकेल दिए जाने के बाद भी गाए जाते हैं. सब दोषी होते हैं इस हादसे के, सिवा मर गई लड़की के मां-बाप, परिवार, समाज और हमारे देश के महान संस्‍कारों के.

कोई आश्‍चर्य नहीं कि इस देश में फिल्‍म कबीर सिंह क्‍यों हिट है. कबीर सिंह को डिकोड करते आर्टिकल्‍स ने भी प्रीती सिक्‍का और उसके मां-बाप को डीकोड करने की कोशिश क्‍यों नहीं की. क्‍योंकि सच तो ये है कि प्रॉब्‍लम कबीर सिंह था ही नहीं. प्रॉब्‍लम थी प्रीती. प्रॉब्‍लम थे प्रीती के पिताजी, जिन्‍हें सिर्फ आदेश देने और मनवाने की आदत है. कबीर उस पर डॉमिनेट करे, उसे थप्‍पड़ मारे, उस पर हक जमाए, उसे अपनी प्रॉपर्टी समझे तो प्रीती को ये बातें न बुरी लगती हैं, न नागवार. और क्‍यों लगेंगी भला, कबीर सिंह वही कर रहा है, जो प्रीती सिक्‍का के बाप ने पूरी जिंदगी अपनी पत्‍नी और बेटी के साथ किया. जिस लड़की ने जिंदगी में सिर्फ आदेश देने और शासन करने वाला बाप देखा हो, मां को सिर झुकाकर पति की बात मानते देखा हो, बाप को मां पर हाथ उठाते देखा हो, उसका बॉयफ्रेंड उसके साथ ये सब करे तो उसे क्‍यों लगेगा अजीब या बुरा. वो यही देखकर बड़ी हुई है. उसे यही सिखाया गया है. कॉलेज का बॉयफ्रेंड नहीं होता, बाप की मर्जी का लड़का होता तो भी प्रीती पर राज ही करता. प्रीती सिक्‍का उसके थप्‍पड़ का जवाब थप्‍पड़ से नहीं देने वाली थी.



ये प्रीती सिक्‍काएं ही हैं, जिनकी मर्जी के खिलाफ लड़का भरे कॉलेज में उन्‍हें चूम लेता है और वो सिर झुकाकर खड़ी रहती हैं. जिनका पति जब जी में आए दो तमाचे रसीद कर देता है और वो रसोई में छिपकर बुल्‍के चुहाती हैं. जो सारी दुनिया में मुंह मारकर आए आदमी को सुबक-सुबककर सफाई देती हैं कि वो कितनी पवित्र हैं, कि उन्‍होंने किसी और मर्द को अपनी उंगली का पोर भी नहीं छूने दिया. ये वही प्रीती सिक्‍का हैं, जिनका पति उन्‍हें सातवीं मंजिल से धक्‍का दे देता है और वो मर जाती हैं.

लोग कबीर‍ सिंह के नाम को रो रहे हैं, जबकि प्रॉब्‍लम प्रीती है. कानुपर वाले एक्टिविस्‍ट हर्षिता के ससुराल वालों के नाम को रो रहे हैं, जबकि प्रॉब्‍लम हैं हर्षिता के मां-बाप, पूरा समाज, देश, संस्‍कार.

आपकी लड़कियां ऐसे ही मरती रहेंगी क्‍योंकि आप उन्‍हें मरना ही सिखा रहे हैं. आपके हिसाब से बेटी को अंग्रेजी स्‍कूल में पढ़ाना, जींस पहनाना, घूंघट न करवाना, पैर न दबवाना ही आधुनिक होने की निशानी हैं. आप नकली मॉडर्न हैं. आप वही हैं, जिसकी बहू ने हनीमून पर हाफ पैंट के साथ कोहनी तक चूड़ा पहना हुआ था. आप वही हैं, जिन्‍होंने अपनी बेटी को आत्‍मसम्‍मान का पाठ कभी नहीं पढ़ाया, अपनी इज्‍जत करना नहीं सिखाया. आप वही हैं, जिसने बेटी को शौक के लिए पढ़ाया, आत्‍मनिर्भर होने के लिए नहीं. आप वही हैं, जिन्‍होंने बेटी को दहेज और बेटे को अपनी सारी संपत्ति दी. आप वही हैं, जिन्‍होंने ससुराल में लात खा रही बेटी को समझा-बुझाकर वापस लात खाने भेज दिया. आप वही हैं, जो उस दिन कबीर सिंह को देखकर ताली बजा रहे थे और प्रीती सिक्‍का को देखकर आंसू बहा रहे थे.

आप ही हैं लड़कियों की दुर्गति के जिम्‍मेदार. मां-बाप चाह लें तो किसी पति की रीढ़ में इतना दम नहीं कि लड़की को फेंक दे सातवीं मंजिल से. आपने उसे पैदा किया था. आप ही हैं उसकी मौत के जिम्‍मेदार.

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