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गढ़ी सांपला-किलोई: क्या जाटलैंड में भूपेंद्र हुड्डा को शिकस्त दे पाएगी बीजेपी?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: October 4, 2019, 10:03 AM IST
गढ़ी सांपला-किलोई: क्या जाटलैंड में भूपेंद्र हुड्डा को शिकस्त दे पाएगी बीजेपी?
भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ है किलोई (File Photo)

2014 के विधानसभा चुनाव में भूपेंद्र सिंह हुड्डा से हारे इनेलो नेता रहे सतीश नांदल को बीजेपी ने इस बार अपना प्रत्याशी बनाया है

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  • Last Updated: October 4, 2019, 10:03 AM IST
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नई दिल्ली. हरियाणा की सबसे खास विधानसभा सीटों में गढ़ी सांपला-किलोई भी आती है. वो इसलिए क्योंकि लगातार एक दशक तक सीएम रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा जाटलैंड रोहतक जिले की इस सीट से ही विधायक बनते रहे हैं. वो इस बार भी यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं. गढ़ी सांपला वही ऐतिहासिक गांव है जहां किसान नेता सर छोटूराम का जन्म हुआ था. 2009 से पहले इस विधानसभा क्षेत्र का नाम किलोई था. लेकिन परिसीमन के बाद हसनगढ़ विधानसभा क्षेत्र को खत्म करके किलोई में मिला दिया गया. 2009 और 2014 में भूपेंद्र सिंह हुडडा ने इनेलो के राष्ट्रीय प्रवक्ता सतीश नांदल को हराया था. लेकिन वो इस साल जून में बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने हुड्डा को शिकस्त देने के इरादे से उन्हें मैदान में उतारा है. सवाल ये है कि इनेलो होते हुए बीजेपी में आने वाले नांदल क्या हुड्डा को चुनौती दे पाएंगे?

गढ़ी सांपला-किलोई का राजनैतिक इतिहास जानने के लिए हमें हसनगढ़ और किलोई दोनों की बात करनी होगी. क्योंकि दोनों मिलाकर यह क्षेत्र बना है. हरियाणा राज्य बनने के बाद 1967 में पहला चुनाव हुआ. इसमें हसनगढ़ अस्तित्व में आया. इससे पहले इसका नाम सांपला था. इसमें 31.40 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस की टिकट पर चौधरी छोटूराम के भतीजे श्रीचंद विधायक बने. 1968 व 1972 के चुनाव में चौधरी मांडू सिंह विधायक चुने गए. 1977 में जनता पार्टी के संत कुमार ने विशाल हरियाणा पार्टी से चुनाव लड़ रहे महंत श्रयोनाथ को हरा दिया.

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इस सीट पर भूपेंद्र हुड्डा और उनके परिवार का प्रभाव है (फाइल फोटो)


किलोई विधानसभा सीट

किलोई विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो यह भी हरियाणा के पहले चुनाव यानी 1967 में अस्तित्व में आया. इस चुनाव में संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे स्वतंत्रता सेनानी रणबीर सिंह हुड्डा और अस्थल बोहर मठ के महंत श्रेयोनाथ के बीच मुकाबला हुआ. मठ का जनता पर प्रभाव था. र्निदलीय महंत ने 53.78 वोट लेकर कांग्रेस के हुड्डा को हरा दिया. लेकिन एक बाद ही 1968 कें हुए मध्यावधि चुनाव में रणवीर सिंह हुड्डा ने श्रेयोनाथ को हराकर बदला ले लिया. हुड्डा को 51.93 फीसदी वोट मिले. मठ और कांग्रेस के इस लीडर के बीच लड़ाई यहीं नहीं रुकी.

महंत और कांग्रेस में जारी रहा मुकाबला

जब 1972 का विधानसभा चुनाव हुआ तो रणवीर सिंह हुड्डा के बेटे प्रताप सिंह कांग्रेस की टिकट पर मैदान में उतरे. जबकि महंत श्रेयोनाथ कांग्रेस (ओ) से. इस चुनाव में महंत को 54.37 फीसदी वोट मिले. उन्होंने प्रताप सिंह को हरा दिया था. इसके बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में रणवीर सिंह हुड्डा मैदान में उतरे. लेकिन इस बार वो जनता पार्टी के हरिचंद हुड्डा से हार गए. तब जनता पार्टी की आंधी चली थी. हरियाणा के सियासी जानकारों का कहना है कि इस हार के बाद रणबीर सिंह हुड्डा राज्यसभा चले गए और उनकी प्रदेश की सियासी विरासत छोटे बेटे भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने थाम ली.
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2000 के चुनाव में खुली हुड्डा की किस्मत

इस चुनाव में हरिचंद लोकदल से चुनाव मैदान में उतरे. भूपेंद्र सिंह हुड्डा कांग्रेस से और महंत श्रयोनाथ निर्दलीय. हरिचंद ने हुड्डा को हरा दिया. महंत तीसरे नंबर पर चले गए थे. 1987 के चुनाव में भूपेंद्र हुड्डा लोकदल के उम्मीदवार श्रीकृष्ण हुड्डा से हार गए. साल 1991 कांग्रेस की टिकट कृष्णमूर्ति हुड्डा को मिली. उन्होंने जनता पार्टी के श्रीकृष्ण हुड्डा को धूल चटा दी. 1996 में श्रीकृष्ण हुड्डा सोशल एक्शन पार्टी से चुनाव लड़े और जीत भी गए. कांग्रेस के कृष्णमूर्ति हुड्डा को तीसरे नंबर पर संतोष करना पड़ा. साल 2000 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की किस्मत खुली. उन्होंने 53.48 फीसदी वोट लेकर इनेलो के धर्मपाल को हराया. इसके बाद से लगातार यहां पर कांग्रेस अपना कब्जा जमाए हुए है.

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First published: October 4, 2019, 9:55 AM IST
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