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ANALYSIS : हरियाणा में हारने पर आमादा कांग्रेस को जनता ने कैसे दे दिए इतने वोट!

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: October 24, 2019, 12:58 PM IST
ANALYSIS : हरियाणा में हारने पर आमादा कांग्रेस को जनता ने कैसे दे दिए इतने वोट!
सोनिया गांधी के साथ भूपेंद्र सिंह हुड्डा

घर संभालने के लिए कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने हुड्डा से बात की और उन्हें पार्टी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया. इसी के साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से अशोक तंवर को हटाकर यह जिम्मेदारी कुमारी शैलजा को सौंप दी. इस बदलाव के बाद होना यह चाहिए था कि पार्टी को पूरी ताकत से चुनाव में लगना चाहिए था. लेकिन हुआ उलटा.

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  • Last Updated: October 24, 2019, 12:58 PM IST
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जैसे जैसे वोटों की गिनती जारी है हरियाणा के चुनाव (Haryana Assembly Elections 2019) परिणाम सबको चौंका रहे हैं. ज्यादतर एग्जिट पोल ने हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी को 70 से 80 तक सीटें दी थीं. दूसरी तरफ कांग्रेस के दहाई के अंक में पहुंचने तक की संभावना भी मुश्किल दिखाई दे रही थी. लेकिन अभी तक आए रुझानों के मुताबिक बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही 30 सीट पार करती नजर आ रही हैं. जाहिर है अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, तो 90 सीटों वाली विधानसभा में जननायक जनता पार्टी (JJP) और निर्दलीयों की भूमिका खासी अहम हो जाएगी. यह सारी भूमिकाएं तभी बहुत साफ होंगी जब सीटों की फाइनल टैली आ जाएगी.

फिलहाल कांग्रेस की बात करते हैं. अगर किसी आम आदमी से पूछिए, तो वह भी कह देगा कि इस चुनाव को हारने में कांग्रेस ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं उठा रखी थी. जब भारतीय जनता पार्टी अपने पन्ना प्रमुख तक तय कर चुकी थी, तब कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस बात के लिए संघर्ष कर रहे थे कि किसी तरह पार्टी इस चुनाव की कमान उन्हें सौंप दे. शुरू में हुड्डा ने पार्टी से बातचीत की और बाद में दबाव बनाया. जब ये दोनों चीजें काम नहीं आईं तो हुड्डा ने कई बड़ी रैलियां करके अपनी ताकत दिखाई और उनके पार्टी छोड़ने तक की अटकलें लगने लगीं. यह वह समय था जब पार्टी को चुनाव की तैयारी को अंतिम रूप दे देना चाहिए था.

घर संभालने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हुड्डा से बात की और उन्हें पार्टी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया. इसी के साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से अशोक तंवर को हटाकर यह जिम्मेदारी कुमारी शैलजा को सौंप दी. इस बदलाव के बाद होना यह चाहिए था कि पार्टी को पूरी ताकत से चुनाव में लगना चाहिए था. लेकिन हुआ उलटा. लोकसभा चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस का नेतृत्व कर चुके तंवर ने ठीक चुनाव से पहले न सिर्फ कांग्रेस छोड़ दी, बल्कि पार्टी के खिलाफ प्रचार किया. उन्होंने बढ़-चढ़कर कांग्रेस केे चुनाव हारने की घोषणा की.


इन हालात के बीच हुड्डा ने अपनी ताकत पर चुनाव का बिगुल फूंका. केंद्रीय नेतृत्व से उन्हें कितना सहयोग मिला, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि सोनिया गांधी की इकलौती रैली कैंसिल हो गई और राहुल गांधी भी ढंग से कोई सभा नहीं कर सके. प्रियंका गांधी ने तो खैर इस चुनाव में कोई दिलचस्पी ली ही नहीं. सोशल मीडिया पर भी पार्टी खासी ढीली नजर आई.

DUSHYANTA
दुष्यंत चौटाला हरियाणा चुनाव में किंग बनकर उभरे हैं.


हरियाणा के चुनाव भीतर से देख रहे लोग जरूर यह बात कह रहे थे कि हुड्डा ने जाट, जाटव और मुस्लिम का जो समीकरण बनाया है, वह काम कर सकता है, लेकिन कोई इस बात को आत्मविश्वास से नहीं कह पा रहा था.

अब जब चुनाव नतीजे सामने आ रहे हैं, तो कांग्रेस जरूर सोच रही होगी कि शायद इस चुनाव को मिलकर गंभीरता से लड़ा जाता, तो उन्हें कुछ मिल सकता था. इस परिणाम से कांग्रेस को यह तसल्ली भी होगी कि उसके नेताओं ने भले ही पार्टी का साथ छोड़ दिया हो और राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद से पार्टी में एक गफलत का माहौल हो, लेकिन जनता ने अभी उसे पूरी तरह खारिज नहीं किया है.

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भूपिंदर सिंह हुड्डा
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपनी ताकत पर चुनाव का बिगुल फूंका.


हरियाणा का नतीजा इसलिए भी खास है कि पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़े अंतर की जीत यहीं हुई थी. हरियाणा में बीजेपी प्रत्याशियों की जीत का अंतर पांच और छह लाख वोट तक था. छह महीने के भीतर इस अंतर के सिकुड़ने का मतलब है कि लोग किसी भी एक पार्टी या मुद्दे के साथ बुरी तरह नहीं चिपक रहे. अगर दिसंबर 2018 में वे कांग्रेस को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जिताने के बाद इन्हीं राज्यों में लोकसभा में उसे साफ कर सकते हैं तो अगले विधानसभा चुनाव में फिर अपना मन बदल सकते हैं.

दरअसल, लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत में एक विपक्ष चाहिए ही होता है. जनता इस बात को समझ रही है. वह अपने मन का सत्ताधारी दल चुनने के साथ ही उसके लिए एक ताकतवर विपक्ष भी चाह रही है, ताकि सत्ता का संतुलन बना रहे. इसीलिए कांग्रेस के हार की तरफ बढ़ते सारे कारनामों के बीच भी जनता ने उसे प्रतिष्ठा बचाने और आगे की सोचने लायक वोट दे ही दिए.

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First published: October 24, 2019, 12:11 PM IST
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