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देवगौड़ा के पीएम बनने के 25 साल पूरे, कहा- मैं राजनीति से रिटायर नहीं होने वाला

एच डी देवगौड़ा ने 1 जून 1996 को भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. (पीटीआई फाइल फोटो)

HD Deve Gowda News: एच डी देवगौड़ा हमेशा कहते आए कि अपने कार्यकाल के दौरान 11 अस्थिर महीनों में उन्होंने वो सब कुछ किया जो वह देश की समस्या दूर करने के लिए कर सकते थे.

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नई दिल्ली. 1 जून 1996 का दिन कर्नाटक के इतिहास में महत्वपूर्ण है. हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा जिन्हें एच डी देवगौड़ा के नाम से जाना जाता है – उन्होंने इसी तारीख को भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. रातोंरात देश के सबसे बड़े पद पर देवगौड़ा का पहुंचना वाकई में अकल्पनीय था. इसलिए भी क्योंकि उनका दिल्ली की राजनीति में ज्यादा दखल नहीं था. जब कथित तीसरे मोर्चे के नेताओं ने उन्हें देश के सबसे ताकतवर पद के लिए चुना तब गौड़ा को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बने महज़ 18 महीने हुए थे.


इस चौंका देने वाली खबर को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया आई थी. कुछ ने इस फैसले का मज़ाक बनाया, तो कुछ न इसे लोकतंत्र की जीत बताया. कुछ ने उम्मीद जताई कि इससे नई दिल्ली की गुटबाज़ी को विराम मिलेगा, वहीं गौड़ा के विरोधी जल भुनकर राख हो गए. कुछ ने यह भी सोचा कि यह सरकार सिर्फ एक साल चलेगी और वो सही थे.





उनके घर कर्नाटक में सिर्फ एक धड़ा ही था जिसने मिट्टी के बेटे के नई दिल्ली तक के इस सफर का जश्न मनाया, बाकी सब मौन थे, दबी आवाज़ में गौड़ा के व्यवहार और उनकी आदतों का मज़ाक बना रहे थे. गौड़ा सौभाग्यशाली रहे. वह अकेले ऐसे पूर्व प्रधानमंत्री हैं जो अपने शपथ ग्रहण के पच्चीस साल देख पाए. यही नहीं, वह एकमात्र पूर्व प्रधानमंत्री हैं जो अब भी राजनीति में सक्रिय हैं और आगे भी रहना चाहते हैं. 88 साल की उम्र में भी राजनीति से उनकी दोस्ती पक्की है.


बतौर प्रधानमंत्री गौड़ा का कार्यकाल बहुत छोटा रहा-सिर्फ 11 महीने. कुछ कहते हैं कि इस दौरान ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके बारे में लिखा जा सके, लेकिन गौड़ा को ऐसा नहीं लगता. वह हमेशा कहते आए कि इन 11 अस्थिर महीनों में उन्होंने वो सब कुछ किया जो वह देश की समस्या दूर करने के लिए कर सकते थे. वह यह बताने से कभी नहीं थकते कि किस तरह जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद छह महीने तक हुए रक्तपात पर उन्होंने काबू पाया.


गौड़ा ने एक पत्रकार को बताया, 'जब मैंने चार्ज लिया, तो मेरी प्राथमिकता कश्मीर थी. गुप्तचर विभाग के प्रमुख श्यामल दत्ता की चेतावनी के बावजूद मैं कश्मीर गया. हालात समझने के लिए मैंने तमाम दावेदारों के साथ बैठक की. मैंने एक पावर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी और स्थानीय टुअर ऑपरेटरों ने बैंक से जो कर्ज़ लिया था, उसे माफ किया. इससे हमारे लिए मित्रभाव पैदा हुआ.'


वह गर्व से बताते हैं कि उन्होंने डॉ. फारूक अब्दुल्ला को भारत लौटने के लिए मनाया ताकि 1996 के चुनाव में हिस्सा ले सकें. वह कहते हैं कि कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली उनकी उपलब्धि है. बांग्लादेश के साथ फरक्का पानी संधि को भी वह अपना प्रयास बताते हैं. उन्हें अफसोस है कि उन्हें और उनसे पहले पी.वी. नरसिम्हा राव को मार्च 1998 में वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान हुए पोखरन टेस्ट के लिए श्रेय नहीं मिलता. वह कहते हैं कि इस टेस्ट को लेकर ज़मीनी तैयारी उनके और राव के दौर में हुई, लेकिन खराब अंतरराष्ट्रीय हालात और घरेलू चिंताओं की वजह से वह आगे नहीं बढ़ पाए.


गौड़ा बताते हैं कि किस तरह उन्हीं के कार्यकाल में दिल्ली मेट्रो के प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिली थी. वह कहते हैं, 'कईयों का कहना था कि मेट्रो महंगी है, इसकी जरूरत नहीं है. राव को भी इस विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन मैं अड़ा रहा और हरी झंडी दी. अफसोस कि 2002 में जब इसका उद्घाटन हुआ तब दिल्ली में रहते हुए भी बीजेपी सरकार ने मुझे नहीं बुलाया.'


रोज़मर्रा के काम के अलावा गौड़ा का कार्यकाल चालबाज़ी और धोखाधड़ी से भरपूर रहा. पीएम बनते ही गौड़ा और जनता दल के तत्कालीन अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने पार्टी के सहसंस्थापक रामकृष्ण हेगड़े जैसे दिग्गज राजनेता को बाहर का रास्ता दिखा दिया. आगे चलकर यह फैसला गौड़ा परिवार पर भारी पड़ा. हेगड़े को हटाने का मलाल आज भी गौड़ा को है. गौड़ा के करीबी और केंद्रीय मंत्री सीएम इब्राहिम ने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी से पंगा लेकर बात और बिगाड़ दी. केसरी ने कसम खाई कि 11 महीने में गौड़ा की सत्ता को धराशायी कर देंगे. गौड़ा बताते हैं, 'कांग्रेस ने जब मेरी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा तो वाजपेयी ने मेरा साथ दिया, लेकिन मैंने मदद लेने से इनकार कर दिया.'


गौड़ा की आदत, रवैया और खाने का तरीका, लुटियन्स दिल्ली में मज़ाक का साधन बना, लेकिन गौड़ा इन सबसे ऊपर उठकर पद पर बने रहे. वह कहते, 'मैं तो एक मामूली-सा किसान बनकर दिल्ली गया और लौटा भी इसी तरह. शायद मैं वहां के लिए फिट नहीं था. मेरे साथ सही व्यवहार नहीं हुआ. वो जगह मुझ जैसे साधारण किसान के लिए नहीं थी.' गौड़ा के दोस्त और दुश्मन दोनों को लगता है कि वह एक बार फिर पीएम पद पर बैठने की उम्मीद करते हैं, पर गौड़ा इसे बकवास बात बताते हैं. लेकिन 16 चुनाव देख चुके गौड़ा कहते हैं, 'मैं राजनीति से रिटायर नहीं होने वाला. मरते दम तक लोगों की सेवा करूंगा.'

Published by:Rakesh Ranjan
First published: