HD देवेगौड़ा ने किया अरविंद यादव की नई किताब ‘विज्ञान के रामचंद्र’ का विमोचन

‘विज्ञान के रामचंद्र’ का विमोचन

‘विज्ञान के रामचंद्र’ का विमोचन

लेखक के अनुसार, जीवनी में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. कुछ प्रसंग और बातें तो ऐसी हैं, जिनके बारे में प्रोफ़ेसर रामचंद्र राव के परिवारवाले और सबसे क़रीबी मित्र भी नहीं जानते हैं. प्रोफ़ेसर राव ने अपने जीवन पर दो किताबें लिखी हैं. इस जीवनी में कई ऐसी बातें हैं, जो इन दो किताबों में भी नहीं हैं.

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  • Last Updated: February 21, 2021, 4:17 PM IST
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नई दिल्ली. पूर्व प्रधानमंत्री और भारतीय राजनीति के पुरोधा एचडी देवेगौड़ा ने जाने-माने पत्रकार और लेखक डॉ. अरविंद यादव की नई किताब ‘विज्ञान के रामचंद्र’ का विमोचन किया. यह किताब ‘भारतरत्न’ प्रोफ़ेसर सी.एन.आर. राव की प्रामाणिक जीवनी है. इस अवसर पर देवेगौड़ा ने कहा, "प्रोफेसर सीएनआर राव जैसे महान वैज्ञानिक की जीवनी का विमोचन करते सम्मानित महसूस कर रहा हूं." अवसर पर चर्चित पत्रकार डी. पी. सतीश भी मौजूद थे. लेखक के अनुसार, जीवनी में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. कुछ प्रसंग और बातें तो ऐसी हैं, जिनके बारे में प्रोफ़ेसर रामचंद्र राव के परिवारवाले और सबसे क़रीबी मित्र भी नहीं जानते हैं. प्रोफ़ेसर राव ने अपने जीवन पर दो किताबें लिखी हैं. इस जीवनी में कई ऐसी बातें हैं, जो इन दो किताबों में भी नहीं हैं.

जीवनी के प्राक्कथन में वैज्ञानिक ‘पद्मविभूषण’ रघुनाथ अनंत माशेलकर ने लिखा, "प्रोफ़ेसर सीएनआर राव लिविंग लेजन्ड हैं. आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के 70वें जन्मदिन पर कहा था, “आने वाली पीढ़ियों को यक़ीन ही नहीं होगा कि हाड़-माँस का यह व्यक्ति कभी पृथ्वी पर चला भी होगा.” ये शब्द महात्मा के सम्मान में कहे गये थे. प्रोफ़ेसर सीएनआर राव के 85वें जन्मदिवस पर मैं इन्हीं शब्दों को दोहराना चाहता हूं.

जाने माने लेखक और पत्रकार अरविंद यादव ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि प्रोफेसर राव एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्थान हैं. वे अनोखे, अद्वितीय और अद्भुत हैं. मैं ख़ुशनसीब हूँ कि हमारी पीढ़ी ने उन्हें देखा है, स्पर्श किया है, महसूस किया है, अनुभव किया है, उनसे सीखा है और प्रेरणा ली है. मैंने प्रोफ़ेसर सीएनआर राव को एक वैज्ञानिक की तरह, वैज्ञानिकों का नेतृत्व करने वाले एक नायक की तरह, नायकों के नायक की तरह, विज्ञान के लिए नये संस्थान बनाने वाले महाव्यक्ति के तौर पर देखा है. मैंने हमेशा उनमें एक ऐसा दुर्लभ शख़्स पाया है, जो सबसे एक जैसी गर्मजोशी से मिलता है और जिनमें दूसरों के लिए भरपूर हमदर्दी है. उनके भीतर मौजूद बच्चों जैसे उत्साह और जोश को भी मैंने देखा है. मैंने उनके अंदर एक अद्भुत साहसी व्यक्तित्व भी देखा है."

जीवनी में उस घटना का भी वर्णन है, जिसने रामचंद्र को वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित किया. जीवनीकार के लिखा है, "साल 1945 में हाई स्कूल की एक घटना ने रामचंद्र को वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित किया था. हुआ यूं था कि एक दिन उस ज़माने के सबसे प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रामन यानी सीवी रामन आचार्य पाठशाला में मैडम क्यूरी की एक प्रतिमा का अनावरण करने के लिए आमंत्रित किये गये थे.तय कार्यक्रम के मुताबिक़ रामन आचार्य पाठशाला पहुँचे. उन्होंने मैडम क्यूरी के चित्र का विधिवत अनावरण किया. इसके बाद उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित किया.
रामन की छवि रामचंद्र के मन में समा गयी. उस दिन रामन उसी वेशभूषा में थे, जिसमें वे अक्सर हुआ करते थे. रामन सफ़ेद क़मीज़ और सफ़ेद पतलून पहना करते थे. क़मीज़ पर काले रंग का कोट पहनते थे. सिर पर सफ़ेद रंग की पगड़ी पहनते थे. पगड़ी पारंपरिक दक्षिण भारतीय पद्धति में सिर पर बाँधते थे. यही छवि बालक रामचंद्र के मन में समा गयी. रामचंद्र ने यह भी ग़ौर किया था कि रामन अपने कोट का पल्लू पकड़ कर भाषण दे रहे हैं.

रामन ने रामचंद्र को काफी प्रभावित किया

रामचंद्र को रामन की वाणी, उनके बोलने का अंदाज़, उनके वाक्यों ने बेहद प्रभावित किया. रामचंद्र के लिए रामन की वाणी ओजस्वी थी और उनका भाषण उत्साह को जन्म देने वाला. रामन के विचारों ने उन्हें कुछ इस तरह प्रोत्साहित किया कि वे भी वैज्ञानिक बनने की सोचने लगे. रामन ने मैडम क्यूरी के बारे में भी विद्यार्थियों को बताया. मैडम क्यूरी के संघर्ष और सफलता की गाथा सुनकर कई विद्यार्थियों में जोश भर गया. ऐसे लगा, जैसे उनका विश्वास बढ़ा है.



रामन ने विदा लेने से पहले शिक्षकों से आचार्य पाठशाला के दो या तीन होनहार और प्रतिभाशाली बच्चों को बैंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्थान यानी आईआईएससी भेजने को कहा. रामन इन तेजस्वी विद्यार्थियों को अपनी प्रयोगशाला दिखाना चाहते थे. शिक्षकों ने रामन की प्रयोगशाला की यात्रा के लिए जिन दो बच्चों को चुना, उनमें रामचंद्र एक थे. जब रामचंद्र को यह बताया गया कि उन्हें रामन की प्रयोगशाला ले जाया जाएगा, तब रामचंद्र बहुत प्रसन्न हुए. उनके लिए यह किसी सुंदर सपने के सच होने जैसा अनुभव था.

उत्साह और जिज्ञासा से भरे मन के साथ रामचंद्र अपने शिक्षकों और स्कूल के सहपाठी के साथ भारतीय विज्ञान संस्थान पहुँचे. रामन उन दिनों भारतीय विज्ञान संस्थान के निदेशक हुआ करते थे. उनका रुतबा सबसे बड़ा था. आचार्य पाठशाला के चयनित विद्यार्थियों को रामन ने ख़ुद साथ चलकर भारतीय विज्ञान संस्थान घुमाया और महत्वपूर्ण चीज़ें दिखायीं. वे विद्यार्थियों को अपनी प्रयोगशाला भी ले गये. रामचंद्र और उनके सहपाठी के साथ रामन ने क़रीब आधा घंटा समय प्रयोगशाला में बिताया. रामन जैसे व्यस्त वैज्ञानिक के लिए इतना समय स्कूल के छात्रों के साथ बिताने अपने आप में बड़ी और विरली बात थी. लेकिन रामन जानते थे कि आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं और आज के होनहार विद्यार्थी ही कल के वैज्ञानिक. वे ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय विद्यार्थियों को विज्ञान की दुनिया में लाना चाहते थे. वे जानते थे कि विज्ञान में प्रगति का सीधा मतलब समाज और राष्ट्र की प्रगति है.

रामन का व्यक्तित्व रामचंद्र को लगा करिश्माई

बालक रामचंद्र जितना समय रामन के साथ रहे, उतना समय वे उनसे लगातार प्रभावित होते रहे. रामन का व्यक्तित्व उन्हें करिश्माई लगा. रामन का रौब, उनका रुतबा उन्हें बेहद प्रभावशाली लगा. ज्ञान-विज्ञान की बातों से रामन ने हमेशा के लिए रामचंद्र का मन जीत लिया. रामन की ठाट-बाट, उनके पहनावे ने भी रामचंद्र के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला. दिलचस्प बात यह रही कि भौतिक-विज्ञान के बारे में जो बातें रामन ने कहीं, रामचंद्र उन्हें समझ नहीं पाये. लेकिन इस दौरान उनके मन में एक विचार कुंडली मारकर बैठ गया. यह विचार था, रामन जैसा बड़ा वैज्ञानिक बनना. बालक रामचंद्र जान गये कि रामन जैसा बनने से प्रसिद्धि मिलेगी, सम्मान मिलेगा और समाज में बड़ा ओहदा और रुतबा मिलेगा."

महात्मा गांधी के दर्शन से रामचंद्र के जीवन में क्या बदलाव आये, इसे बताते हुए आंध्रप्रदेश सरकार के विशेष कार्य अधिकारी (मीडिया) पद पर तैनात डॉ. अरविंद यादव ने इस पुस्तक में लिखा है, "एक दिन स्कूल में एक शिक्षक ने विद्यार्थियों को बताया कि महात्मा गांधी मद्रास आने वाले हैं. शिक्षक ने कहा कि वे महात्मा गांधी की सभा में शामिल होंगे. उन्होंने बच्चों से कहा कि वे अपने साथ उन बच्चों को साथ ले जाने के लिए तैयार हैं, जो गांधीजी को देखना चाहते हैं. शिक्षक की बस एक शर्त थी. मद्रास जाने-आने और वहां रहने के लिए जो ख़र्च होगा, उसका भार बच्चों को ही उठाना होगा. बच्चों को बताया गया कि मद्रास-यात्रा के लिए चार रुपये का ख़र्च होगा. बालक रामचंद्र के मन-मस्तिष्क पर महात्मा गांधी छाये हुए थे. जैसे ही शिक्षक ने मद्रास वाली बात बतायी, रामचंद्र बहुत उत्साहित हुए. उन्होंने अपने शिक्षक के साथ मद्रास जाने का मन बना लिया. उस दिन स्कूल से घर लौटते ही रामचंद्र ने शिक्षक के प्रस्ताव के बारे में बताया. पिता ने कहा कि महात्मा गांधी को देखने के लिए मद्रास जाने की ज़रूरत नहीं है, वे किसी न किसी दिन बैंगलोर आएँगे और तब वे ख़ुद रामचंद्र को महात्मा से मिलाने ले चलेंगे. यह बात सुनकर रामचंद्र उदास हुए. उन्होंने पिता से शिक्षक के साथ मद्रास भेजने की गुज़ारिश की. गुज़ारिश के तरीक़े से पिता जान गये कि अगर नहीं भेजा गया, तो रामचंद्र उदास ही रहेंगे. इसी लिए बच्चे की ख़ुशी को ध्यान में रखते हुए नागेश राव ने रामचंद्र को महात्मा गांधी को देखने के लिए अपने शिक्षक के साथ मद्रास जाने की इजाज़त दे दी. रामचंद्र की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. मन चंचल हो उठा.

जब समय आया, तब रामचंद्र अपने शिक्षक और कुछ सहपाठियों के साथ मद्रास के लिए रवाना हुआ. कुछ विद्यार्थी ही मद्रास-यात्रा पर आये थे. किसी न किसी कारण कई विद्यार्थियों के अभिभावकों ने उन्हें मद्रास यात्रा पर नहीं भेजा था. कई विद्यार्थी इस वजह से नहीं आ पाये, क्योंकि यात्रा के लिए ज़रूरी राशि बड़ा भार थी.

रामचंद्र के लिए बैंगलोर से मद्रास तक का रेल का सफ़र बहुत सुहाना था. यह पहली बार था, जब रामचंद्र ने बिना किसी परिवारवाले के साथ बैंगलोर के बाहर यात्रा की थी. मन गदगद था. अपने नायक, देश के सबसे सम्माननीय नेता से मिलने की इच्छा पूरी होने जा रही थी. रामचंद्र महात्मा गांधी को देखना चाहते थे, उनका भाषण सुनना चाहते थे.

जब रामचंद्र अपने शिक्षक के साथ सभास्थल पहुंचे, तब वहां मौजूद लोगों के हुजूम को देखकर वे दंग रहे गये. गांधीजी का भाषण सुनने, उन्हें देखने के लिए हज़ारों लोगों की भीड़ जुटी थी. जब गांधीजी सभास्थल पहुंचे और रामचंद्र ने उन्हें देखा, तब वे उनकी सादगी और व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित हुए. जैसा सुना था, महात्मा को ठीक उन्होंने वैसे ही पाया था. गांधीजी को देखने के लिए लोगों में जिस तरह का उत्साह था, गांधी के प्रति लोगों में जो सम्मान था, उनको लेकर लोगों के मन में जो विश्वास था, उससे बालक रामचंद्र का सीधे साक्षात्कार हो रहा था. ये वे क्षण थे, जब रामचंद्र भी मन ही मन अपने जीवन को राष्ट्र को समर्पित करने का संकल्प ले रहे थे.

मद्रास में उस दिन गांधीजी ने अपने भाषण से लोगों में जोश भरा था. विश्वास दिलाया था कि आज़ादी अब ज़्यादा दिन दूर नहीं है. गांधीजी को प्रत्यक्ष देखने और उनके प्रभाव और करिश्माई व्यक्तित्व का दर्शन करने के बाद प्रसन्नता से भरे मन के साथ रामचंद्र बैंगलोर लौटे. रामचंद्र ने माता-पिता और अपने सभी रिश्तेदारों से अपना अनुभव साझा किया. सभी रामचंद्र की ख़ुशी देखकर फूले नहीं समा रहे थे."

अपनी मां से बहुत प्यार करते थे रामचंद्र

रामचंद्र के जीवन के सबसे दुखद दिन के बारे में बताते हुए लिखा गया है, "रामचंद्र के जीवन का सबसे दुखद दिन, माँ का महाप्रयाण. साल 1988 की बात है. रामचंद्र की माँ नागम्मा अपने घर पर पूजा कर रही थीं. पूजा-स्थल पर दीये जले हुए थे. अचानक नागम्मा की साड़ी में आग लग गयी. यह एक दुर्घटना थी. इस दुर्घटना में नागम्मा झुलस गयीं. उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. घर पर जब यह दुर्घटना हुई, तब रामचंद्र एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अपनी पत्नी के साथ गोवा गये हुए थे. गोवा में जब रामचंद्र को इस दुर्घटना के बारे में पता चला, तो उन्हें गहरा सदमा पहुँचा. उन्हें ऐसे लगा मानों उनके पाँव के नीचे से धरती हट रही है. रामचंद्र अपनी माँ से बहुत प्यार करते थे. वे माँ पर जान छिड़कते थे. माँ उनके लिए भगवान थीं. गुरु थीं, मार्गदर्शक थीं. माँ की ख़ुशी में रामचंद्र की सबसे बड़ी ख़ुशी थी. माँ झुलस गयी हैं और अस्पताल में भर्ती हैं, इस ख़बर ने रामचंद्र को बुरी तरह हिला दिया. पत्नी इंदुमति ने उन्हें संभाला और हिम्मत दिलायी. रामचंद्र समारोह को बीच में छोड़कर बैंगलोर के लिए रवाना हुए. चूँकि उस समय हवाई यात्रा कर गोवा से बैंगलोर आने की कोई सुविधा नहीं थी, रामचंद्र सड़क-मार्ग से बैंगलोर के लिए रवाना हुए. सारे सफ़र के दौरान वे अपनी माँ के स्वस्थ्य होने की दुआ करते रहे. बैंगलोर पहुँचते ही वे सीधे अस्पताल गये. मां को देखकर उन्हें आभास हो गया कि वाक़ई माँ की हालत नाज़ुक है. रामचंद्र को बहुत दुख हुआ. पीड़ा हुई.

अस्पताल में इलाज जारी रहा, लेकिन माँ के स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ. नागम्मा की काया दुबली-पतली थी और इसी वजह से दुर्घटना में आग ने उनके शरीर को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया था. जब डॉक्टरों ने कहा कि हालत में सुधार की गुंजाइश कम है, तब रामचंद्र के पिता नागम्मा को घर ले आये. रामचंद्र ने घर पर देखा कि माँ किसी से बात कर रही हैं, जबकि उनके आसपास कोई नहीं था. रामचंद्र को यह समझने में देर न लगी कि माँ भगवान से बात कर रही हैं. जब रामचंद्र माँ के क़रीब पहुँचे, तब उन्होंने अनुभव किया कि वे भगवान से शिकायत कर रही हैं. वे भगवान से कह रही थीं, “आख़िर आप अपने भक्तों को ही क्यों दुख देते हैं? हे भगवान! आप अपने भक्तों की ही परीक्षा क्यों लेते हैं? दुनिया में कई लोग हैं, जिन्होंने काफ़ी बुरे काम किये हैं. आप इन बुरे लोगों को सज़ा क्यों नहीं देते?”

इसके कुछ दिन बाद भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रबंधन समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी. बैठक में संस्थान के कोर्ट के अध्यक्ष जहाँगीर रतनजी दादा भाई टाटा भी मौजूद थे. बैठक में संस्थान की योजनाओं और परियोजनाओं पर चर्चा की जा रही थी. संस्थान के निदेशक होने के नाते इस बैठक में रामचंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका थी. इस बैठक के दौरान एक व्यक्ति रामचंद्र के पास आया और उसने उनके कान में यह बुरी ख़बर दी कि उनकी माँ का निधन हो गया है. यह ख़बर सुनने के बाद रामचंद्र का मन शोक और पीड़ा में डूब गया, लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं पर क़ाबू बनाये रखा. किसी से कुछ नहीं कहा और बैठक में अपनी भूमिका निभाते रहे. वे जे. आर. डी. टाटा की बग़ल में बैठे हुए थे, लेकिन उन्होंने टाटा को भी यह ख़बर नहीं दी. रामचंद्र नहीं चाहते थे कि उनके जीवन की दुखद घटना का असर उनके कामकाज और संस्थान के कार्यों पर पड़े. वे मानते थे कि उनकी माँ का निधन उनके लिए व्यक्तिगत क्षति है. जब बैठक समाप्त हुई, तब रामचंद्र ने कहा कि वे सबके साथ भोजन नहीं कर पाएँगे, क्योंकि उन्हें एक ज़रूरी काम के लिए अपने घर जाना है. निदेशक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने के बाद रामचंद्र अपने घर पहुँचे. अपनी माँ के शव को देखकर वे अपनी भावनाओं पर क़ाबू नहीं पा सके. दुनिया में अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को रामचंद्र ने अश्रुपूर्ण विदाई दी. यह दिन रामचंद्र के जीवन के सबसे दुखदायी दिनों में एक बन गया.

माँ के निधन के बाद रामचंद्र का एक दिन भी ऐसा नहीं बीता, जब उन्होंने माँ को न याद किया हो. वे हर दिन पूजा के समय सबसे पहले माँ को याद करते हैं. माँ की स्मृति को नमन किये बिना उनकी पूजा और उनका दिन पूरा नहीं होता. माँ भौतिक रूप से चली गयीं, लेकिन मानसिक और भावनात्मक रूप से वे कभी रामचंद्र से जुदा नहीं हो सकती हैं.
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