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आबकारी विभाग की नौकरी छोड़ खेती करने लगे, 21 साल से बीजों को बचाने का कर रहे हैं काम

सुदामा साहू ने बनाया देशी बिहन सुरक्षा मंच,  इससे वे पूरे देश में करते हैं बीजों का लेन-लेन

सुदामा साहू ने बनाया देशी बिहन सुरक्षा मंच, इससे वे पूरे देश में करते हैं बीजों का लेन-लेन

ओडिशा के बरगढ़ जिले के काटापाली गांव के सुदामा साहू ने देशी बीजों को बचाने के लिए एक सीड बैंक बनाया है. जिसमें आज 1160 किस्मों के देशी बीजों को सुरक्षित रखा गया है.

भुवनेश्वर. देश के दूसरे किसानों की तरह ही ओडिशा के सुदामा साहू भी परंपरागत धान, दाल और सब्जियों की खेती करते थे. उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव तब आया जब वे 1996 में किसानों के एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बनारस आए. बनारस के उस कार्यक्रम में समाजवादी चिंतक किशन पटनायक का भी एक भाषण हुआ. जिसमें उन्होंने कहा था कि आने वाले समय में देशी बीजों का अकाल पड़ जाएगा. उस समय देश में उदारवाद की नीति चल रही थी और विदेशी बीज कंपनियां भारत में धड़ल्ले से अपना बाजार फैला रही थीं. इसके बाद सुदामा साहू ने देशी बीजों को बचाने के काम शुरू कर दिया. सुदामा साहू 2001 से लगातार देशी बीजों को बचाते आ रहे हैं. वे उनकी शुद्धता बढ़ा रहे हैं और उनके बारे में लोगों में जागरूकता फैला रहे हैं.

ओडिशा के बरगढ़ जिले के काटापाली गांव के सुदामा साहू ने देसी बीजों को बचाने के लिए एक सीड बैंक बनाया है. जिसमें आज 1160 किस्मों के देशी बीजों को सुरक्षित रखा गया है. इसमें धान की 1100 किस्मों के और बाकी सब्जियों के बीज हैं. सुदामा साहू का मन बचपन में पढ़ाई में नहीं लगता था और वे अपने दादा के साथ खेती में लगे रहते थे. उनके दादा ने उनको खेती के गुर बताए. उन्हीं से सुदामा साहू को खेती करने की प्रेरणा मिली. आज सुदामा साहू पूरे देश में देशी बीजों के संरक्षण के लिए मशहूर हो चुके हैं.

देशी बीजों की मॉर्केटिंग में उतरे
देशी बीजों को संरक्षित करने का काम सुदामा साहू लगातार करते रहे. इसी बीच उनको नोएडा में ऑर्गेनिक वर्ल्ड कांग्रेस में शामिल होने का मौका मिला. फिर उन्होंने सोचा कि केवल देशी बीजों के संरक्षण से उनकी सुरक्षा करना कठिन होगा. सुदामा साहू ने देशी बीजों की मॉर्केटिंग में उतरने का फैसला किया. आज सुदामा साहू 4200 क्विंटल धान के बीजों का आर्डर पूरा करते हैं. उनके पास जो धान मौजूद हैं उनमें ब्लैक राइस, रेड राइस और ब्राउन राइस जैसी किस्में हैं. इनमें कुछ किस्में केवल 55 दिन में तैयार हो जाती हैं, जबकि कुछ को तैयार होने में 180 दिन लगते हैं.

Sudama Sahu

नौकरी मिली लेकिन खेती में लगा मन
ऐसा नहीं है कि सुदामा साहू को नौकरी करने का मौका नहीं मिला. उनको आबकारी विभाग में कांस्टेबल की नौकरी मिली थी. लेकिन उन्होंने उसे करना ठीक नहीं समझा और अपनी खेती के काम को ही आगे बढ़ाते रहे. सुदामा साहू केवल 5 एकड़ जमीन के मालिक हैं. जिसमें से एक एकड़ जमीन वे देशी बीजों के शोध के लिए रखते हैं. अपने आस-पड़ोस किसानों को साथ लेकर वे पूरे देश से आ रही देशी बीजों की मांग को पूरा करने का काम करते हैं. बीजों की मांग के हिसाब से ही वे खेती का काम करते हैं. इसी आधार पर किसानों को बीज भी बांटे जाते हैं. बरगढ़ जिले में उन्होंने एक जैविक बाजार बनाया है, जो अभी भी चल रहा है. ‘देशी बिहन सुरक्षा मंच, ओडिशा’ और ‘बीज स्वराज मंच’ के नेटवर्क से वे देशभर में बीजों का आदान-प्रदान भी करते रहते हैं.

 Sudama Sahu

स्कूलों में बच्चों को सिखा रहे खेती
सुदामा साहू ने केवल इतना ही नहीं किया है. उन्होंने स्कूलों में बच्चों को खेती सिखाने के लिए 10 स्कूलों का जिम्मा लिया है. जिसमें से दो स्कूलों को वे खुद संभाल रहे हैं और बाकी स्कूलों में दूसरे लोगों की मदद से खेती सिखाई जा रही है. बच्चों को खेती सिखाने के लिए उन्होंने दो किताबें भी लिखी हैं. इनमें एक किताब है ‘खेती खेती कैसे करें’ और दूसरी किताब का नाम है ‘स्कूलों में जैविक खेती’. इन स्कूलों में बच्चों को सुदामा साहू खेती करना सिखाते हैं. बच्चे खेती का सभी काम करते हैं और जो उपज होती है, वह मिड डे मील में उनको खिलाई जाती है. इसके अलावा सुदामा साहू अनकल्टीवेटेड फूड को भी लोगों के फूड बास्केट में शामिल करने के लिए कोशिश कर रहे हैं. इसमें कई तरह की सब्जियां और साग शामिल हैं.

Sudama Sahu

सरकारी नीतियों को बनाने में किसानों की भूमिका के पक्षधर
सुदामा साहू सरकारी विभागों में पॉलिसी बनाने के लेवल पर भी एडवोकेसी करके किसानों के हितों में नीतियां बनाने का काम करना चाहते हैं. उनका मानना है कि किसानों के पक्ष में नीतियां होने से ही देश में किसानों का हित सुरक्षित रहेगा. बीजों के संरक्षण के लिए सुदामा साहू को कई सम्मान मिल चुके हैं. 2019 में केंद्र सरकार ने उनको ‘बाबू जगजीवन राम’ सम्मान दिया. कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उनको एक लाख रुपये और ये सम्मान दिया. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 2017 में सुदामा साहू को स्टेट एग्रीकल्चर अवार्ड दिया.

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देश की जैव विविधता को दे रहे बढ़ावा
सुदामा साहू को 2012 में सीड साइंटिस्ट सम्मान से नवाजा गया. मुंबई के नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने उनको ‘जैविक गवेषक’ का सम्मान दिया. क्योंकि सुदामा साहू ने 35 तरह के जैविक फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड बनाया है. इतना ही नहीं सुदामा साहू ने धान की चार नई किस्में विकसित की हैं. जिनके नाम सोना हरिल, दसमती, कुसुमकली-1 और कुसुमकली-2 हैं. इसके अलावा धान की चार और नई किस्मों का भी इस साल नामकरण किया जाएगा. सुदामा साहू का कहना है कि धान की एक नई किस्म को तैयार करने में 7 से 8 साल का समय लगता है. इस तरह सुदामा साहू न केवल बीजों को बचा रहे हैं, बल्कि नई किस्में भी विकसित कर रहे हैं. सुदामा साहू जैसे लोग देश की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता को बढ़ावा देने में एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.

Tags: Farmer story, Farming in India, News18 Hindi Originals, Rice

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