कोरोना से मौत पर मुआवजे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से बोले एसजी मेहता- गरीबों को मुफ्त राशन, बेहतर इलाज प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट में कोरोना पीड़ितों के लिए 4 लाख रुपये के मुआवजे की मांग वाली याचिका पर सुनवाई जारी है. (फाइल फोटो)

Hearing in SC on Petitions seeking ex gratia of Rs 4 lakhs: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी त्रासदी में मरने वालों की संख्या बहुत अधिक हो तो सरकार छोटी संख्या वाली त्रासदी के जितना मुआवजा हर व्यक्ति कैसे दे पाएगी.

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नई दिल्ली. कोरोना वायरस संक्रमण के मौत पर चार लाख रुपये मुआवजे की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी त्रासदी में मरने वालों की संख्या बहुत अधिक हो तो सरकार छोटी संख्या वाली त्रासदी के जितना मुआवजा हर व्यक्ति कैसे दे पाएगी. वहीं याचिकाकर्ता का दावा था कि चार लाख ना सही, लेकिन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण कुछ तो स्कीम बनाए, यह कानूनन उसका कर्तव्य है. इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसा नहीं है सरकार के पास नहीं पैसा नहीं है, लेकिन हम ये समझते हैं कि पैसा मुआवजे के बजाय किसी और तरीके खर्च होना चाहिए. इस पर जस्टिस एमआर शाह ने कहा कि हां जब आप कहते हैं कि पैसा नहीं है तो इसका बहुत अलग मतलब निकलता है.

याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील एसबी उपाध्याय ने कहा कि हमने केंद्र से 4 लाख रुपये मुआवज़ा देने को कहा था, क्योंकि उनकी योजना यही है, उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार योजना बनानी होती है. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या यह पूर्व अनुग्रह भुगतान 2015 के पत्र द्वारा कवर किया जा सकता है? उपाध्याय ने कहा कि हमारा पहला अनुरोध है कि उसे 2021 तक बढ़ाया जाना चाहिए, धारा 12 में कहा गया है कि योजना बनानी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह बहुत स्पष्ट है कि 2015 अधिसूचना यहां लागू नहीं है, तो इस बात पर जोर नहीं दिया जा सकता कि 4 लाख रुपये दिए जाएं.



इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आपदा राहत की परिभाषा अब पहले से अलग है. जो नीति पहले थी, उसमें प्राकृतिक आपदा के बाद राहत पहुंचाने की बात थी. अब इसमें आपदा से निपटने की तैयारी भी शामिल है. इस पर सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि अगर मुआवजा तय करने का ज़िम्मा राज्यों पर छोड़ा गया तो देश के अलग-अलग हिस्से में अलग-अलग मुआवजा होगा.

'22 लाख हेल्थ केयर वर्कर्स का बीमा'

ऐसे में मेहता ने कहा कि प्रवासी मज़दूरों को विशेष ट्रेन चला कर मुफ्त में उनके राज्य भेजना, उन्हें ट्रेन में भोजन देना, गरीबों को राशन देना, ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाना, उसके ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था करना, यह सब आपदा प्रबंधन का ही हिस्सा है. 22 लाख हेल्थ केयर वर्कर्स का बीमा भी इसी के तहत किया गया है
तुषार मेहता ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि आपदा प्रबंधन कानून के तहत की जा रही व्यवस्था में अंतर है. कुछ राज्यों ने अपनी तरफ से मौत के लिए मुआवजे की घोषणा की है. लेकिन यह आपदा राहत कोष से नहीं. आकस्मिक निधि, मुख्यमंत्री राहत कोष आदि से है. इस पर न्यायाधीश ने कहा कि आप अपने लिखित नोट में इन बातों का ब्यौरा दें.

कोर्ट ने फिर पूछा कि क्या NDMA ने फैसला लिया है कि मुआवजा नहीं दिया जा सकता? इस सवाल पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस बारे में अभी कोई सूचना नहीं है. लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि हमारा केस यह है ही नहीं कि सरकार के पास पैसा ही नहीं है. हमारा केस यह है कि हम आपदा प्रबंधन से जुड़ी दूसरी बातों पर ज़्यादा फोकस कर रहे हैं.

केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोरोना प्राकृतिक आपदा की परिभाषा में आता है. लेकिन कोरोना के मामले में मुआवजा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि मुआवजा ऐसे मामले में दिया जाता है, जो एक बार हो. जैसे भूकंप या बाढ़. कोरोना लगातार हो रहा है, इसलिए मुआवजा देना संभव नहीं.

'मुआवजे के बजाय, सुविधाएं बेहतर करने में पैसा खर्च हो'

दूसरा सरकार प्राकृतिक आपदा के तहत जो पैसा खर्च कर रही है, वो बीमारी को कंट्रोल करने में जा रहा है. जैसे अस्पताल, वैक्सीन, दवा, ऑक्सीजन, गरीबों को अनाज देना वगैरह. तीसरा केंद्र और राज्य सरकार के संसाधन सीमित है. टैक्स से जो पैसा आ रहा है, उसी का इस्तेमाल हो रहा है. एक बार मृतक के परिवार को पैसा देने से अच्छा है कि सुविधाएं बेहतर करने में पैसा खर्च हो. ये सरकार की नीति है.

दूसरी ओर याचिकाकर्ता रीपक कंसल ने कहा की आर्थिक तंगी या पैसे की कमी को वजह से सरकार मुआवजा देने से नहीं बच सकती, क्योंकि मुआवजे का प्रावधान कानून में है. फिर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या निजी अस्पताल में या कॉन्ट्रैक्ट में काम करने वाले डॉक्टर को मुआवजा दिया जा रहा है. तुषार मेहता ने कहा कि डॉक्टर इंश्योरेंस से कवर होते हैं, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के डॉक्टर को ये सुविधा नहीं है. 22.12 लाख डॉक्टरों को बीमा दिया गया है.

'आप ट्विटर से परेशान न हों'

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या एनडीएमए ने कोई फैसला लिया है कि कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा या अभी विचाराधीन है. इस पर तुषार मेहता ने कहा कि कल मेरी बात को ट्विटर पर ट्विस्ट करके डिबेट किया गया. मैं कह रहा हूं कि नैचुरल डिजास्टर जैसे भूकंप को टालने या कम करने के लिए सरकार कुछ नहीं कर सकती. लेकिन कोरोना जैसी महामारी को सोशल डिस्टेंसिंग या और तरीके से कम किया जा सकता है. लेकिन मेरी बात को ट्विटर पर गलत तरीके से पेश किया गया. इस पर जस्टिस एमआर शाह ने कहा कि आप ट्विटर से परेशान न हों. आप कोर्ट की बात करें. तुषार मेहता का जवाब था- मैं तो ट्विटर पर हूं भी नहीं, मुझे एक दोस्त ने बताया.

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