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आधार मामलाः पढ़ें देश के 'दूसरे सबसे लंबे' केस की खास बातें

News18.com
Updated: September 26, 2018, 11:53 AM IST
आधार मामलाः पढ़ें देश के 'दूसरे सबसे लंबे' केस की खास बातें
आधार के लिए महिला आंखों की स्कैनिंग की प्रक्रिया से गुज़रते हुए

इस मामले में हाईकोर्ट के पूर्व जज केएस पुट्टास्वामी सहित करीब 31 याचिकाएं दायर की गई थीं.

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  • Last Updated: September 26, 2018, 11:53 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट बुधवार को केंद्र के महत्वपूर्ण आधार कार्यक्रम और इससे जुड़े 2016 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कुछ याचिकाओं पर फैसला सुना दिया. अदालत ने कहा है कि आधार संवैधानिक रूप से वैध है. अदालत ने कहा कि सरकार डाटा सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 10 मई को इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था. बता दें कि इस मामले की अंतिम सुनवाई इस साल 17 जनवरी से 10 मई तक चली जिसकी 38 अलग-अलग दिनों में सुनवाई हुई.

इस मामले में हाईकोर्ट के पूर्व जज केएस पुट्टास्वामी की याचिका सहित करीब 31 याचिकाएं दायर की गई थीं. 10 मई की सुनवाई में अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने पीठ को जानकारी दी थी कि 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले के बाद सुनवाई में लगे दिनों के संदर्भ में यह 'दूसरा सबसे लंबा' मामला बन गया है.

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वेणुगोपाल ने कहा था कि केशवानंद भारती मामले में पांच महीने सुनवाई हुई थी और इस मामले में निरंतर साढ़े चार महीने सुनवाई हुई. यह इतिहास में निरंतर सुनवाई के संदर्भ में दूसरा सबसे लंबा मामला है. इस मामले में सबसे आधारभूत तर्क दिया जा रहा है कि यह इससे पहले नौ जजों की पीठ द्वारा दिए गए निजता के अधिकार के फैसले के विरुद्ध है.

ये हैं केस से जुड़ी खास बातें-


कितनी याचिकाओं को किया गया था शामिल?10 मई को संवैधानिक पीठ ने केएस पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की अगुवाई में 29 याचिकाओं पर सुनवाई करके फैसले को आरक्षित कर दिया था. इन याचिकाओं में आधार स्कीम की संवैधानिक वैधता को चैलेंज किया गया था.

क्या था बहस का मूल मुद्दा

याचिकाओं में कहा गया था कि आधार संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा लोगों को दिए गए निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है. इसके अलावा इसकी वजह से बड़ी संख्या में लोग कल्याणकारी योजनाओं से बाहर हो जाते हैं. यह भी तर्क दिया गया कि संसद में विरोध न हो इसके लिए आधार से जुड़ा विधेयक, धन विधेयक के रूप में संसद में लाया गया था.

कब शुरू हुई अंतिम सुनवाई 

मामले में अंतिम सुनवाई, 17 जनवरी 2018 को शुरू हुई थी.

याचिकाकर्ताओं की ओर से किसने आधार पर बहस की

कपिल सिब्बल, गोपाल सुब्रमण्यम, केवी विश्वनाथन, आनंद ग्रोवर, श्याम दीवान, पी चिदंबरम जैसे वरिष्ठ वकीलों ने याचिकाकर्ताओं की ओर से मामले में बहस की.

आधार की सुनवाई के मामले की ये थीं खास बातें-

- आधार की वजह से लोगों को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है. क्योंकि दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आधार के इनरोलमेंट में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

- निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

- आधार का डिएक्टिवेशन सिविल डेथ की तरह है. संविधान राज्य को अधिकार नहीं देता बल्कि राज्य के अधिकारों की सीमा को तय करता है. किसी का आधार डिएक्टिवेट किया जाना सिविल डेथ की तरह है.

- यूआईडीएआई का डाटा कलेक्ट करने वाली एजेंसियों से कोई सीधा संबंध नहीं है. इसलिए लोगों का जो डाटा कलेक्ट किया जाता है उसकी सत्यनिष्ठा संदिग्ध है.

- कोई भी बायोमेट्रिक और व्यक्तिगत सूचना एक बार डिजिटल दुनिया में पहुंचने के बाद वापस नहीं लिया जा सकता. किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सूचना को खतरे में नहीं डाला जा सकता.

- संसद द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया अवैधानिक है. धन विधेयक के रूप में पेश करके राज्यसभा को इस मामले में विचार से बाहर करने की कोशिश की गई है जो कि उचित नहीं है.

सरकार ने कैसे किया बचाव-

इस मामले में सरकार का पक्ष एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने रखा. उन्होंने सरकार ने अपने पक्ष में ये बातें कहीं-

- एक्ट को इस तरीके से बनाया गया है कि किसी की भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कम से कम हनन करता है.

- 2009 से लेकर 2016 के बीच आधार पूरी तरह स्वैच्छिक था लेकिन तब भी लोगों ने आधार कार्ड बनवाया.

- नेशनल फूड सिक्योरिटी का सेक्शन 12 अनाजों के वितरण के मामले में आधार का प्रावधान करता है जिससे पारदर्शी तरीके से अनाजों का वितरण किया जा सके और उनकी डिलीवरी को सुनिश्चत किया जा सके.

- आधार डेटा को एक ही जगह सेंट्रलाइज़्ड तरीके से स्टोर किया जाता है. इसके लिए 2048 बिट के एनक्रिप्शन का प्रयोग किया जाता है. इनरोलमेंट की प्रक्रिया से जुड़े सभी लोगों के बैकग्राउंड के बारे में ऑडिट ट्रेल के माध्यम से पता लगाया जाता है.

- अधिकार निरंकुश नहीं है. राज्य के हितों की रक्षा के लिए लोगों के अधिकारों पर तर्कसंगत रोक लगाई जा सकती है.

- इस मामले में निजता के अधिकार का कोई मतलब नहीं हैं. वास्तविक चैलेंज ये है कि आधार सुरक्षित है या नहीं.

- बैंक फ्रॉड, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मुद्दों से निपटने के लिए बायोमेट्रिक ज़रूरी है,

- कोई भी व्यक्ति ये कहकर कि उसके पास पैन कार्ड नहीं है, आसानी से टैक्स देने से भाग सकता है लेकिन आधार-पैन लिंक कर देने से ऐसा नहीं हो पाएगा.

 

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First published: September 26, 2018, 8:11 AM IST
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