COVID-19: कोरोना काल में खुदकुशी से जुड़े कॉल की संख्या बढ़ी, जान बचा रहे हेल्पलाइन नंबर

आत्महत्या के विचार आने वाले लोगों के कॉल 7 फीसदी हो गए हैं जो पहले एक फीसदी थे. (सांकेतिक तस्वीर: Shutterstock)

आत्महत्या के विचार आने वाले लोगों के कॉल 7 फीसदी हो गए हैं जो पहले एक फीसदी थे. (सांकेतिक तस्वीर: Shutterstock)

Covid Helpline Numbers: पिछले साल से यह हेल्पलाइन कोविड से जुड़ी मानसिक परेशानियों (Mental Problems) से निपटने में लोगों की मदद कर रही है. सात पेशेवर लोगों की टीम रोज़ 40 के करीब कॉल लेती है और अब तक सात हज़ार लोगों की मदद की जा चुकी है.

  • Share this:

नई दिल्ली. कोविड 19 (Covid-19) के बढ़ते मामले और इससे जुड़ी लाचारी ने लोगों की मानसिक सेहत पर असर डालना शुरू कर दिया है. इस वजह से हेल्पलाइन नंबरों पर आने वाले कॉल की तादाद बढ़ गई है. पिछले साल दिल्ली के स्नेही फाउंडेशन के संस्थापक अब्दुल माबूत कोविड ने कोविड से जुड़े मानसिक सेहत के मामलों को देखने वाली मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन की शुरुआत की थी. अब्दुल के मुताबिक कोविड की वजह से लोगों के अंदर लाचारी, घबराहट, दुख, अवसाद, पछतावा और सदमे से होने वाले तनाव के मामले बढ़ गए हैं.

पिछले साल से यह हेल्पलाइन कोविड से जुड़ी मानसिक परेशानियों से निपटने में लोगों की मदद कर रही है. सात पेशेवर लोगों की टीम रोज़ 40 के करीब कॉल लेती है और अब तक सात हज़ार लोगों की मदद की जा चुकी है.

लेकिन माबूद के मुताबिक पिछली लहर के मुकाबले दूसरी लहर में इस तरह के कॉल की तादाद काफी बढ़ गई है. द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में वह कहते हैं – नवंबर के बाद के आंकड़े देखें तो आत्महत्या के विचार आने वाले लोगों के कॉल 7 फीसदी हो गए हैं जो पहले एक फीसदी थे. ज्यादातर वो लोग हैं जो कोविड के बाद आर्थिक दिक्कत या लाचारी से जूझ रहे हैं.

Youtube Video

माबूद बताते हैं कि ऐसे में ज्यादातर हम व्यक्ति से देर तक बात करते हैं ताकि वह आत्महत्या जैसे विचार से बाहर निकल सके. सच यह है कि कोई मरना नहीं चाहता और जैसे ही हम उन्हें सुनने लगते हैं, वो बाहर निकलने लगते हैं. इन कॉल्स में वो युवा भी हैं जिनके बाहर निकलने की वजह से परिवार संक्रमित हुआ और अब वो पछता रहे हैं.

यह भी पढ़ें: क्या कोरोना के इलाज में इस्तेमाल होने वाला जिंक है ब्लैक फंगस का कारण? एक्सपर्ट ने की जांच की मांग

ऐसे लोगों के भी फोन आ रहे हैं जिनके पास पैसा है, पहुंच है लेकिन उसके बावजूद वह मरीज़ के लिए सिलेंडर या अस्पताल में बेड का इंतजाम नहीं कर पाए और इस वजह से वह अब सदमे में हैं और डरे हुए हैं.




कई कॉल तो यूपी, मप्र, बिहार के ग्रामीण इलाकों से भी आ रहे हैं. कॉल के जरिए पता चलता है कि किस तरह लोग सोच रहे हैं कि जब दिल्ली जैसे शहर में हालात नहीं संभल रहे तो गांव में कैसे संभालेंगे. एक डर, एक अफरा तफरी का भाव है. जानकार पहले भी कह चुके हैं कि इस तरह की आपदा के बाद डर, घबराहट, अवसाद, अनिद्रा, अकेलापन जैसे हालात बन सकते हैं.

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज