बॉलीवुड में फिर खड़े होने, अपने घाव भरने की शक्ति है: प्रसून जोशी

प्रसून जोशी प्रसिद्ध गीतकार और फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष हैं. (फाइल फोटो)
प्रसून जोशी प्रसिद्ध गीतकार और फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष हैं. (फाइल फोटो)

बॉलीवुड की मौजूदा मुश्किलों के मद्देनजर सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कुछ उपाय बताए हैं, जिनके जरिए वर्तमान सिनेमा को समृद्ध बनाने में मदद मिलेगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 10:16 AM IST
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प्रसून जोशी
बीती एक सदी के दौरान सिनेमा ने खुद को समाज में चल रही चीज़ों के साथ जिस तरह जोड़ा और उस स्तर का प्रभाव हासिल किया वह शायद ही कोई दूसरा माध्यम कर पाया हो. इसने हमारी आंखों, कानों और दिमाग को अपने जादू में बांधकर नई दुनिया की सैर कराई और हमें नई दुनिया से जोड़ा.

सिनेमा ने कहानी कहने और समझने के तरीके को सदा-सदा के लिए बदल कर रख दिया. भारतीय सिनेमा और उसके संगीत ने समाज के मौजूदा हालात को दिखाने के साथ-साथ उसे परिभाषा भी दी. लेकिन यह प्रदर्शन हमेशा सिर्फ बेहतर ही नहीं रहा, कई बार बेहद बुरा भी रहा. हकीकत में सिनेमा एक ताकत है और इसकी खामियां भी काफी दिलचस्प हैं.

आज फिल्म इंडस्ट्री और खास तौर से बॉलीवुड के कई बेस्वाद पहलुओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं. कुछ लोग खुश हैं क्योंकि कीचड़ में सने पैर दिखने लगे हैं. वहीं कुछ का तर्क है कि फिल्म इंडस्ट्री को बलि के बकरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. इसका मकसद बस देश के बड़े मसलों से ध्यान हटाना है. तो आइए, एक करीबी नजर डालते हैं कि आखिर फिल्मी सितारों से जुड़े मुद्दे ज्यादा विवादास्पद क्यों हो गए.
अंतर क्या है?


क्या सिनेमा उद्योग और दूसरों उद्योगों में कोई अंतर है? तो जवाब है- हां. दूसरी इंडस्ट्री से फिल्म इंडस्ट्री की तुलना इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि इसका काम बिल्कुल अलग तरह का है. फिल्में सामाजिक परतों से निकली होती हैं. इसके निर्माण में ऐसी चीजों की जरूरत होती है, जिन्हें मापा नहीं जा सकता. इसकी कहानियां काफी असरदार होती हैं. कहानियां अंदरूनी तौर पर जिंदगी से जुड़ी हुई हैं और उसके व‍िविध रूपों को द‍िखाती हैं.

हम कह सकते हैं कि दूसरी इंडस्‍ट्रीज के उलट सिनेमा जिंदगी से जुड़े मसलों को दिखाता है. ये सामाजिक-सांस्कृतिक हालात का उपयोग करता है. बाज़ार पर इसका प्रभाव होता है. यहां हमें बाजार शब्द को भूलना नहीं चाहिए. फिल्में ऐसा कारोबार हैं, जिनका बही-खाता भी होता है. ये सिर्फ खुद को प्रदर्शित करने या सिर्फ कलात्मक प्रदर्शन के लिए नहीं हैं. हम पूरा दिमाग लगाकर तैयार की गई एक ऐसी कला की बात कर रहे हैं, जो लोगों के लिए बनाई गई है.



यही है, हमारा वर्तमान सिनेमा. मोटे तौर पर यह कारोबारी ‘कला’ रचने वाली मनोरंजक इंडस्ट्री है. यह इंडस्ट्री ऐसी कुर्सी पर आराम कर रही है, जो कमजोर है और जिसके दरकने के निशान दिखने लगे हैं. अगर ऐसा है तो फिर आखिर इसके अपने ऊंचे मानदंडों से नीचे गिरने के कारण क्या हैं. शुरुआत करने वालों के लिए आइए, उस स्रोत के बारे में जानते हैं, जहां से सिनेमा निकला है.

टूटते रिश्ते
शुरुआत में सिनेमा पौराणिक कथाओं, लोकसाहित्य और कुछ हद तक पश्चिमी दुनिया से निकला था. इसने अपने ज्यादातर विचार कला और साहित्य से लिए. चाहे वो टैगोर प्रेमचंद की कहानियां हों या फिर दूसरे लेखकों की. आत्मा के भीतर जाने की साहित्य की क्षमता बेहद सूक्ष्म और गहरी है. तब सिनेमा- साहित्य के बीच गहरा संबंध था. संगीत और गाने बेहतरीन कलाकारों-शास्त्रीय संगीतकारों, काबिल कवियों और सम्मानित डांसरों से प्रभावित थे. जिन स्थापित विधाओं से कुछ लिया उन्हें लेकर सिनेमा में एक विनम्रता का भाव था.

हां, यह सच है कि सिनेमा एक नया माध्यम था, लेकिन वह बहुत तेजी से एक लोकप्रिय कला में तब्दील हो रहा था. जैसे सिनेमा की मांग बढ़ी वैसे ही अलग कहानियों और कंटेंट की मांग भी बढ़ी. साहित्य, पौराणिक कथाओं और कला से जुड़ा सिनेमा धीरे-धीरे कम होने लगा. अधिकांश फिल्मकार उस स्तर का सिनेमा नहीं बना सके. हां, तब समानांतर सिनेमा का दौर भी था, जिसने इसे समृद्ध किया लेकिन उसकी पहुंच, क्षमता सीमित थी.

इन सबके बीच अभिमान की भावना भी बॉलीवुड के भीतर आने लगी थी. बड़ी संख्‍या उनकी थी जो मानने लगे कि सिनेमा अपने में पूर्ण और व्यापक है. हां, ये सच है कि इस सिनेमाई तकनीक में शानदार बदलाव हुए. चाहे वो कम्प्यूटर ग्राफिक्स हों, एसएफएक्स हों या फिर शूटिंग तकनीक. लेकिन जैसे-जैसे तकनीक विकसित हुई, विषय भी बदलते गए . सिनेमा, ललित कला और साहित्य के बीच की खाई और चौड़ी होती चली गई. सिनेमा का स्कोप तो बढ़ा, लेकिन इसकी आत्मा धुंधली होती गई.

संभवत: मीडिया और मनोरंजन जगत में तेजी से बदलते हालात में लेखकों, गीतकारों, संगीतकारों और सपने बुनने वाले फिल्मकारों को वह जगह नहीं मिली, जिससे वह हकीकत से रू-ब-रू करा सकें. यह सिनेमा के लिए एक नुकसान की तरह था, क्योंकि प्रतिभावान कलाकार कला और समाज के बीच समन्वय स्थापित करते हैं. ऐसे पुरुष और महिला कलाकार एक अलग तरीके की काबिलियत के साथ आते हैं. उनके पास ‘अपने अनुभव किए सत्य’ होते हैं. एकदम मौलिक अनुभव. यही कारण है कि यह कलाकार समाज से गहराई से जुड़े होते हैं. उनका काम और विचार अनुगूंज पैदा करते हैं. ये मौलिक सृजन होता है. खरी रचनात्‍मकता!

ललित कला के इन कलाकारों से संबंध कमजोर होने का असर सिनेमा की सामाजिक हकीकत से संबंध कमजोर होने के रूप में दिखा. ऐसे में उन लोगों ने फिल्में बनाईं जो इसका साहस करते थे. जबकि फिल्में उन्हें बनानी चाहिए थीं, जो वाकई में इन्हें बनाना चाहते थे या फिर इसके हकदार थे. अगर कुछ अपवादों को छोड़ दें तो 'टैलेंटवालों' की जगह 'हिम्मतवालों' का राज कायम रहा.

आत्ममंथन
फिल्म उद्योग के भीतर प्रतिभावान लोगों के लिए बड़ा और विविधतापूर्ण कला केंद्र बनने की क्षमता है. जहां कलाकार का संरक्षण मिलने के साथ हर तरह के अवसर हों. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से यह बहुत संकुचित और खुद को दोहराने वाली जगह बन गई.सिनेमा बनाने के लिए फिल्मकारों के भीतर एक अंतर्दृष्टि होती थी. यानी सिनेमा देखने का उनका अपना नजरिया. मुझे किसी नजरिया को लेकर चिंता नहीं, लेकिन सिर्फ एक ही तरह का नजरिया!

हमारे जटिल और गहन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों को सिर्फ एक नजरिए के जरिए ही देखा गया. और इसी कारण बेपरवाही के साथ कई बार इन संदर्भों को तोड़ा-मरोड़ा गया. गलत ढंग से प्रदर्शित किया गया. हम हीरो, हिरोइन, खलनायक, गाने और डांस से इतर भी कहानियां प्रस्तुत कर सकते हैं. इसे सीमित करना दुखद है. वह भी एक ऐसी भूमि पर जहां बड़े-बड़े सांस्कृतिक विचार पैदा हुए हैं.

तकरीबन हर साल 2000 से ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं. बीते सौ सालों के दौरान बीस फिल्में भी ऐसी नहीं हैं, जिन्हें दुनिया की सर्वकालिक महान फिल्मों में स्थान मिले. ऐसे में हमें सोचने की जरूरत है. यह दिखावे में रहने जैसा है कि हम सिर्फ अपने देसी दर्शकों के लिए फिल्में बनाते हैं जो दुनिया के अन्य हिस्सों में नहीं समझी जा सकतीं. या फिर यह सिर्फ मनोरंजन है. ऐसी सोच से भी समस्या का समाधान नहीं होने वाला.

फिल्में सिर्फ कौतुक नहीं हैं, जहां मनोरंजन करने वाला अपनी टोपी में से खरगोश निकाल कर दिखाता है या फिर कोई ऐसा जादुई करतब दिखाए, जिससे लोगों की आंखें फटी रह जाएं. सिनेमा तो जिंदगी, इतिहास, संस्कृति, इंसानी रिश्तों, सामाजिक तानो-बानों से अपनी कहानी उधार लेता है. अपने मुख्य स्रोत के प्रति सम्मान न दिखाना बेईमानी है.


धीरे-धीरे फिल्म जगह ने विविध स्रोतों से खुद को समृद्ध करना बंद कर दिया. साथ ही प्रतिभाशाली कलाकारों को तैयार करने का काम कम किया गया. जबकि इसी दौरान तकनीकी स्तर सुधरा. लेकिन असाधारण कहानियां और विचोरोत्तेजक पटकथा तलाशना बेहद मुश्किल है.

व्यावसायिक कला
निश्चित तौर इस बीच कुछ शानदार काम दिखाई दिए हैं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है. इसे लेकर इंडस्ट्री के अनेक कलाकारों ने चिंता जाहिर की, लेकिन इसे सही प्लेटफॉर्म पर नहीं रखा जा सका. हम लगातार देखते रहे कि दुभार्ग्यपूर्ण रूप से ज्यादातर फिल्में सामान्य श्रेणी की हैं. इसी वजह से बॉलीवुड का ज्यादा झुकाव बड़ी व्यावसायिक फिल्मों की तरफ बढ़ा न कि बेहतरीन आर्ट फिल्मों की ओर.

प्रसून जोशी कहते हैं कि ये दर्शकों के लिए भी आत्मविश्लेषण का वक्त है. (फाइल फोटो)


बॉलीवुड, एक ऐसी इंडस्ट्री है जो लोकप्रिय संस्कृति को निर्धारित करती है. आपसी लोगों के जुटान के दौरान यहां पर आयडिया, कला, कविता और म्यूजिक पर जोशपूर्ण चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इसके बजाए व्यावसायिक उपलब्धियों पर ज्यादा चर्चा होती है. बेहतर कहानी के बजाए पलड़ा व्यावसायिक उपलब्धियों की तरफ ज्यादा झुका होता है.

और ये बात भुला दी गई कि सिनेमा इसके जैसी कलापरक इंडस्ट्री की तुलना दूसरी इंडस्ट्री के साथ नहीं की जा सकती है. बही-खाते के आधार पर इनका मूल्‍यांकन नहीं किया जा सकता.

सिनेमा अपने महत्व को सिर्फ बैलेंसशीट के जरिए ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि यह सामाज और संस्कृति को भी प्रदर्शित करता है. यह दिमाग को आकार देता है, सपनों को जन्म देता है और कल्पना को उड़ान.


ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक इंडस्ट्री जिसने जाने-अनजाने में कला को किनारे कर दिया संपूर्ण स्वतंत्रता की मांग करती है. यह बाजार में होकर भी कलात्मक छूट की डिमांड करती है. फि‍ल्‍म इंडस्ट्री में ग्लैमर का प्रभाव, लाइफस्टाइल का प्रभाव, और कारोबारी महफि‍लों और पार्टियों में मौजूदगी के लिए पैसे लेने के मामले आनुपातिक तौर ज्यादा बढ़े. ये अंतर इनसाइडर/आउटसाइडर से ज्यादा प्रतिभावान और गैर प्रतिभावान के बीच का है. एक्टर और स्टार के बीच का. एक विजनरी फिल्मकार और बही-खाता संभालने वाले शख्स के बीच का है. ऐसे लोगों के बीच का जो ग्लैमर की बजाए फिल्म बनाने से प्रेम करता है. कोई आश्चर्य नहीं कि उन्माद को पसंद किया गया और अहम मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया.

विरोधाभासी पहचान
बॉलीवुड की पहचान विरोधाभासी हो गई है. क्या ये कोई दिखावटी कौतुक है, अगंभीर है या फिर कोई खास मकसद लिए, वैचारिक और नैतिक, पर झुकाव वाली इंडस्ट्री है.

ये विरोधाभास कई फिल्म अवार्ड शो में दिखाई दिया है. ध्यान सिर्फ हो हल्ले और शोरगुल पर था न कि वास्तविक पुरस्कारों पर. ध्यान उन पर नहीं था जो हकदार थे, बल्कि उन पर था जो कार्यक्रम में मौजूद हो सकते थे. अक्सर काबिलियत की बजाए सामान्यता को सम्मानित किया जाता है.

बहुत कम लोग ऐसे हैं जो खड़े हुए और मुखर होकर इस खोई प्रतिष्ठा को दोबारा स्थापित करने की बात कही. हालांकि, इंडस्ट्री के भीतर के भी कई लोगों ने इसे प्रोत्साहन दिया लेकिन मनोरंजन पर फोकस उसी तरह बना रहा.

ये विरोधाभासी पहचान तब भी सामने आती है, जब फिल्मी सितारे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर सिनेमा के पर्दे से इतर अपना रुख दिखाते हैं. दर्शक तभी दुविधा में होते हैं, जब पूरी तरह से मनोरंजन आधारित इंडस्ट्री को सामाजिक सरोकारों पर मुखर होते हुए देखते हैं. मुखर होने के बाद यह सितारे न जाने कहां गुम हो जाते हैं.


निश्चित तौर पर हर नागरिक के पास अपनी बात कहने का अधिकार है. लेकिन सार्वजनिक मंच पर ऐसा करने के लिए मुद्दों की गहराई से समझ और उनके प्रभावों की जानकारी होनी चाहिए. यह सिर्फ वास्तविक परेशानियों के प्रति ही अन्याय नहीं करता, बल्कि ये स्टार ब्रांड क्रिएट करने की बजाए लोगों के मन में भ्रम पैदा करता है.

ब्रांड बनने और एक वास्तविक स्टार ब्रांड होने को लेकर भी गलत व्याख्या हो सकती है. ‘रची’ वास्तविकता सिर्फ कुछ समय के लिए प्रभावकारी होती है. चालबाजियों की उम्र छोटी होती है. ‘रची’ वास्तविक कभी भी असली गंभीरता को उपलब्‍ध नहीं हो सकती.

आगे का रास्ता
अब सवाल ये है कि बॉलीवुड का आगे का रास्ता कहां जाता है. तो शुरुआत करने वाले लोगों को आत्मविश्लेषी होना होगा और गंभीर आलोचना के लिए भी तैयार रहना होगा. लेकिन इस दौरान हमें ये भी याद रखना होगा कि सब कुछ गलत ही नहीं है.

इसी सिनेमा ने हमें नायक भी दिए हैं. महान कहानियों को अमर बनाया है. बड़े स्तर पर लोगों को प्रभावित किया और समय की जरूरत के हिसाब से अपना अवदान दिया. कई बेहतरीन फिल्मकार, लेखक, अदाकार, संगीतकार, टेक्निशियन और मेहनत से काम करने वाले क्रू मेंबर्स भी इंडस्ट्री ने दिए. ऐसे लोग जो दर्शकों के ढाई घंटे के एंटरटेनमेंट के लिए दिन-रात काम कर सकते हैं.

लेकिन रचनात्‍मक आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई होती है. भारतीय संस्कृति की असंवेदनशील तरीके से अवहेलना करना, महिला प्रताड़ना पर आंखें मूंदे रहना, अनुचित सामग्री बनाना वास्तविक कलाकारों का काम नहीं हो सकता.

इसलिए अंध बचाव और साजिशों की थ्योरी की बजाए इंडस्ट्री को ऐसे लोगों की जरूरत है जो असली शुभचिंतक हों. जो अपने आत्मविश्लेषण से न भागें. मैंने एक अन्य जगह किसी दूसरे प्रसंग पर लिखा था, ‘ मुझे खुद को भी है टटोलना, है कमी तो है तो बोलना, दाग हैं तो छुपाएं क्यों, सच से नजरें हटाएं क्यों.’


चाहे वो सही स्रोतों से आने वाले फंड का मामला हो, महिला सुरक्षा का मामला हो, तनख्वाह की समता का मामला हो या फिर रोजाना काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी का मामला हो.

न्यूज़ 18 के कार्यक्रम में प्रसून जोशी की फाइल फोटो


खुद से पैदा किया गया ये घाव सिनेमा के लिए आखिरी पड़ाव नहीं है. सिनेमा का क्षेत्र अनंत संभावना से भरा हुआ है. बॉलीवुड अपनी कमियां और ताकत को पहचानता है. इसे ठीक करने में पूरी तरह सक्षम भी है. इंडस्ट्री में कई ऐसे मंच हैं, जहां पर मुद्दे उठाए जाते हैं और उनका साफ-सुथरा समाधान भी निकलता है. निश्चित तौर पर इसे बेहतर समन्‍वय से किया जा सकता है. यह मानना ठीक नहीं होगा पूरा सिस्टम ही टूट चुका है.

दर्शकों को भी ध्यान देना होगा
बॉलीवुड इस वक्त जिस मुश्किलों से गुजर रहा है, उसे देखकर कई लोग आनंदित हो रहे हैं. ये दर्शकों के लिए भी आत्मविश्लेषण का वक्त है. अगर ‘ऑन स्क्रीन’ और ‘ऑफ स्क्रीन’ हीरो के अंतर को समाज में जानबूझकर कमजोर किया गया तो इसके लिए सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री जिम्मेदार नहीं.

सामान्य फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर हिट करवाना. शादियों में एक गाने पर डांस करना और फिर बाद में उसे महिलाओं को किसी वस्तु जैसा दिखाने के लिए जिम्मेदार ठहराना, सिर्फ पाखंड है. 'दिमाग घर पर रखकर आने वाली' फिल्मों पर पैसा खर्च करने के बाद उन्हीं फिल्मकारों से जटिल सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर अकलमंदी और अर्थपरक बातों की उम्मीद ठीक नहीं.

अभिव्यक्ति की पवित्रता, कलात्मक ईमानदारी और उत्कृष्टता के लिए आत्म विश्लेषण की जरूरत होती है. ऐसे में अनचाही चीजों को दरकिनार कीजिए, लेकिन विनती है कि ऐसी बातों को शामिल कीजिए, जिसे सिनेमा को आपको दिखाना पड़े.

इसके लिए कला और योग्यता को केंद्र में रखना होगा. और फिर हम देखेंगे कि किस तरह सिनेमा चमकेगा. साथ ही ये सिनेमा निर्माता और दर्शक दोनों को समृद्ध बनाएगा.

(प्रसून जोशी प्रसिद्ध गीतकार और फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष हैं.)
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