और अंत में जीता भाईचारा! कोरोना महामारी का संकट और सांप्रदायिक सौहार्द

महामारी के समय में भी लोगों ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम की है. फाइल फोटो

महामारी के समय में भी लोगों ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम की है. फाइल फोटो

Hindu Muslim unity in times of Coronavirus: तेलंगाना के करीमनगर जिले के कट्टेपल्ली गाँव में हुई, जहां कुछ मुस्लिम युवक कोरोना से मरे एक व्यक्ति के शव के अंतिम संस्कार के लिए उस समय सामने आए जब परिवारवालों ने शव का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 20, 2021, 8:48 PM IST
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नई दिल्ली. देश भर में कोरोना वायरस (Coronavirus) से संक्रमित लोगों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है और इससे मरनेवालों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि हो रही है. इन सबके बीच ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि लोगों के शव पड़े रहे और उनके परिवारवालों ने उन्हें अंतिम संस्कार के लिए स्वीकार करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर वे शव के नज़दीक गए तो उन्हें भी कोरोना का संक्रमण हो जाएगा. इस तरह की खबरें आ रही हैं कि लोग अपने ही परिवार के लोगों के शवों का अंतिम संस्कार करने से मना कर रहे हैं और उनके ही पड़ोसी दूसरे धर्मों के लोग आगे आकर उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं और ऐसे परिवारों की मदद कर रहे हैं, जो अपने प्रियजनों के शवों का अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहे हैं.

पिछले साल 2020 में भी जब कोरोना अपने चरम पर था, इस तरह की घटनाएँ हुई थीं और इस साल भी इस तरह की कई घटनाएँ हुई हैं. इस तरह की एक घटना तेलंगाना के करीमनगर जिले के कट्टेपल्ली गाँव में हुई, जहां कुछ मुस्लिम युवक कोरोना से मरे एक व्यक्ति के शव के अंतिम संस्कार के लिए उस समय सामने आए जब परिवारवालों ने शव का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया. शनिवार को मोगल्लय्या को कोविड-19 से ग्रस्त होने की रिपोर्ट के सही पाए जाने के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया. रविवार को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी. यह खबर मिलने के बाद उसके परिवार का एक भी व्यक्ति कोरोना से संक्रमित हो जाने के डर से उसके शव का अंतिम संस्कार करने के लिए आगे नहीं आया. इस घटना के बाद उसी गाँव के कुछ मुस्लिम युवकों ने इस व्यक्ति के शव का हिंदू रीति रिवाजों से अंतिम संस्कार किया.

इसी गाँव के मुस्लिम युवक फशी और अली अस्पताल जाकर उसके शव को उस स्थल तक लाए जहां पर अंतिम संस्कार होना था. इसके बाद दोनों ने उसकी अर्थी को अपने कंधे पर उठाकर उसकी चिता तक लाए ताकि वे हिंदू रीति-रिवाजों से शव का अंतिम संस्कार कर सकें. एक मुस्लिम युवक का एक हिंदू के शव का हिंदू रीति से अंतिम संस्कार करने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और उन्हें अपने गाँव के लोगों के साथ-साथ देश भर के लोगों की प्रशंसा मिली.

इसी तरह की एक दूसरी घटना नागपुर के पास खरबी गाँव की है, जहां श्रीराम बेलखोडे नामक व्यक्ति की हृदय गति रुक जाने से मौत हो गयी. उसके घर में उसकी पत्नी, उसकी एक बेटी और एक बेटा है, जो बहुत ही छोटा है. उसके परिवार के लोगों ने अपने रिश्तेदारों को श्रीराम के मरने की खबर दी पर और उन्हें उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए आने को कहा. लेकिन, कोरोना के संक्रमण के डर से परिवार का कोई भी सदस्य या दोस्त शव के अंतिम संस्कार के लिए नहीं आया.
उसी गाँव का एक व्यक्ति सलमान रफीक खान को इस बात का पता चला और उसने उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया. रफीक ने अपने चार अन्य दोस्तों से भी वहाँ आने का आग्रह किया और सभी ने मिलकर दीघेरी श्मशान में इस व्यक्ति का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किया और इसके बाद जाकर उन्होंने अपना रोजा तोड़ा. खरबी गाँव में सलमान रफीक शिव सेना की युवा सेना का कार्यकर्ता है. वह खुद को एक शिव सैनिक कहता है पर मानवता को वह सबसे बड़ा धर्म समझता है.

पिछले साल भी जब कोरोना का कहर लोगों पर टूट रहा था तो सांप्रदायिक सौहार्द की इसी तरह की कुछ घटनाएँ हुई थीं. ऐसी ही एक घटना अप्रैल 2020 में जयपुर में हुई. यहाँ एक व्यक्ति की कैंसर से मौत हो गयी और उसके अंतिम संस्कार के लिए भी उसके मुस्लिम पड़ोसी आगे आए और हिंदू रीति-रिवाजों से उसका अंतिम संस्कार किया. इस व्यक्ति का नाम राजेंद्र बागड़ी था और वह जयपुर के बजरंग नगर भट्टा बस्ती में रहता था. उसे कैंसर था और जयपुर के एक सरकारी अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था. कैंसर से ही उसकी उस दौरान मौत हो गयी.

उसके अपने परिवार में उसका सिर्फ एक भाई था पर देश में लॉकडाउन लगे होने के कारण उसके परिवार का कोई व्यक्ति उसके अंतिम संस्कार के लिए जयपुर नहीं आ पाया. फिर इस क्षेत्र में कोई हिंदू नहीं रहता है. इस खबर के बाद यहाँ रहने वाले मुस्लिमों ने उसके शव का हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार करने का फैसला किया. उसके परिवार के पास उसके अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे, जिसके बाद उन्होंने उसके अंतिम संस्कार के लिए चंदे के माध्यम से पैसे जमा किए.



पूरे प्रोटोकॉल का पालन करते हुए वे उसके शव को लेकर श्मशान तक आए और फिर उसका अंतिम संस्कार किया. भट्टा बस्ती से मुख्य सड़क तक शव को लाते हुए रास्ते में वे ‘राम नाम सत्य है’ बोलते रहे. मुख्य सड़क पर उन्होंने शव को एक ट्रक में रखा और उसे चंदपोल श्मशान तक लेकर आए. शहर में कर्फ्यू होने के कारण सिर्फ आठ लोगों को ही अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति मिली थी. उसकी चिता को बागड़ी के भाई ने आग लगायी और इस तरह हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार संपन्न हुआ.



उसके अंतिम संस्कार में मदद करने वाले मुस्लिम पड़ोसियों ने शोक में डूबे परिवार के खाने पीने की भी व्यवस्था की. इसी तरह की एक घटना भोपाल में भी हुई थी, जब 2020 में वहाँ लॉकडाउन लगा था. समा नामदेव नामक एक व्यक्ति को अपने खाने पीने की ज़रूरत और किराए के लिए अपने पड़ोसियों पर निर्भर रहना पड़ रहा था. कुछ दिनों बाद टीबी के कारण उसकी मौत हो गयी और एक बार फिर उसकी मदद को आगे आनेवालों में उसके मुस्लिम पड़ोसी ही थे. उन्होंने उसके अंतिम संस्कार के लिए सभी जरूरी वस्तुओं की खरीद की, अर्थी तैयार की और उसे उठाकर श्मशान तक लाए, जहां हिंदू रीति रिवाज से उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया.​
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