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Opinion: भारत में महंगाई का इतिहास, जानें 1950 से अब तक कब-कैसे हालात बने और राहत मिली

मार्च में खुदरा महंगाई की दर 6.95 फीसदी रही है.

मार्च में खुदरा महंगाई की दर 6.95 फीसदी रही है.

Inflation in India: देश में महंगाई एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है क्योंकि इसका सीधा असर नागरिकों और अर्थव्यवस्था पर पड़ ...अधिक पढ़ें

भारत में अभी महंगाई (Inflation in India) सबसे अहम मुद्दों में से एक है और महंगाई लंबे वक्त से भारत की सबसे बड़ी दिक्कतों में से एक रही है. ऐसे में ये भी जानना जरूरी है कि कब-कब महंगाई ने भारत की जनता को परेशान किया है. आज हम आपको बताते हैं कि भारत में आजादी के बाद महंगाई का क्या इतिहास रहा है. किन-किन सालों में महंगाई ने ज्यादा परेशान किया और किस दशक में लोगों को महंगाई से राहत मिली.

1950 में क्या थे हालात?
भारत को साल 1947 में आजादी मिली थी और उस वक्त 50 के दशक में महंगाई की दर करीब 2% थी. लेकिन 1950 से 60 के बीच में महंगाई दर में उतरा चढ़ाव रहा और 1956-57 के बीच औद्योगीकरण के उपायों के कारण यह 13.8 प्रतिशत हो गई थी. लेकिन इस दशके अंत में यह दर फिर से 3-7 फीसदी तक आ गई.

1960 के दशक में युद्ध का रहा असर
स्क्रिप बॉक्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के बाद महंगाई दर करीब 6 फीसदी तक रही. इस दौरान भारत को 1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान से जंग भी लड़नी पड़ी. इससे एकोनॉमिक डवलमेंट और औद्योगिकरण पर भी काफी असर पड़ा. 1965 के आसपास महंगाई अपनी चरम सीमा पर थी और चीजों के दाम युद्ध की वजह से काफी बढ़ गए थे. हालांकि, साल 1969 आते आते इसमें स्थिरता आई और एग्रीकल्चर सेक्टर का अच्छा सपोर्ट मिली. हरित क्रांति की वजह से महंगाई पर कंट्रोल रहा.

1970 में अलग रही परिस्थितियां
महंगाई दर की अनिश्चितता के मामले में 70 का दशक शायद सबसे अधिक उथल-पुथल भरा दौर था. 1970 के दशक में मुद्रास्फीति औसतन 7.5% थी और 1973 के पहले तेल झटके के बीच 1974 में अंतर्राष्ट्री य कच्चे तेल की कीमतों में 250 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई थी. ये वो दशक था जब पहली बार आजादी के बाद पहली बार 1973-74 में मुद्रास्फीति 20% को पार कर गई. तेल आयात पर भारी निर्भरता की वजह से देश में तेल के रेट काफी ज्यादा बढ़ गए. जब कच्चे तेल की कीमतें कम हुई तो 1979-80 में महंगाई कंट्रोल में आई.

1980 में भी महंगाई बनी संकट
जाता है कि उस वक्त सरकार की विस्तारवादी राजकोषीय नीतियों और उसके मुद्रीकरण की वजह से महंगाई इस स्तर पर थी. इसके बाद राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी हुई थी और इस वक्त ज्यादा नोट छापने जैसे फैसले लिए गए थे. लेकिन, 1980 के दशक में अंतर्राष्ट्री य व्यापार को आंशिक रूप से उदार बनाने के बाद विदेशी खाते में असंतुलन रहा.

1990 में ऐसा रहा हाल
इस दशक को सबसे ज्यादा महंगाई दर वाले दशक के रूप में जाना जाता है. साल 1991 में तो यहां महंगाई की दर 13.9 तक हो गई थी. मगर फिर धीर धीरे इसमें कमी आई. मगर इस दशक में अर्थव्यवस्था को लेकर कई अहम कदम उठाए गए थे, जिनमें उदारीकरण आदि शामिल है.

साल 2000 के बाद मिली आस
जुलाई 2008 में कच्चे तेल की कीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद, 2009 और 2010 में मुद्रास्फीति दर दोहरे अंकों को पार कर गई. 2008 और 2013 के बीच, बढ़ती वैश्विक तेल और धातु की कीमतों के कारण मुद्रास्फीति औसतन 10.1% प्रति वर्ष रही. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए, सरकार ने 2008 और 2009 में कई राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेजों की घोषणा की, जिससे एक बार फिर से राजकोषीय घाटा बढ़ गया जिससे कीमतों पर दबाव पड़ा. हालांकि, 2014 के बाद से आर्थिक मंदी के साथ मुद्रास्फीति का स्तर नीचे था और जीएसटी जैसे उपायों को लागू किया गया. साल 2020 में महामारी के बीच, महंगाई दर बढ़कर 6.6% हो गई. इसके बाद कई हार महंगाई की दर में उतार चढ़ाव देखे गए और वर्तमान परिस्थिति आपके सामने है.

(लेखिका न्यूज़ 18 उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड में डिप्टी एडिटर और सीनियर एंकर हैं.)

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है.)

Tags: Food and water prices, Inflation, Petrol diesel price

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