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COVID-19: कोरोना वैक्सीन ने जगाई HIV के भी इलाज की उम्मीद, मॉडर्ना ने किया ट्रायल का ऐलान

WHO के मुताबिक एड्स से दुनिया भर में अभी तक 3 करोड़ 60 लाख से ज्यादा (36.3 मिलियन) लोगों की मौत हुई है. फाइल फोटो

WHO के मुताबिक एड्स से दुनिया भर में अभी तक 3 करोड़ 60 लाख से ज्यादा (36.3 मिलियन) लोगों की मौत हुई है. फाइल फोटो

Moderna HIV Vaccine: एचआईवी के संदर्भ में mRNA वैक्सीन ने विट्रो और बंदरों पर ट्रायल के दौरान उम्मीद जगाने वाले नतीजे दिए हैं, ऐसे में इंसानों पर इसका परीक्षण किया जाना काफी उपयोगी होगा.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. वैश्विक स्तर पर एड्स (HIV) की महामारी के 40 साल बाद वैक्सीन की तलाश को नई उम्मीद मिली है. अमेरिकी दवा और बायोटेक कंपनी मॉडर्ना (Moderna) ने हाल ही में एड्स की दो वैक्सीन (HIV Vaccine) के ट्रायल का ऐलान किया है. ये वैक्सीन भी mRNA आधारित हैं, इसी तकनीक पर कंपनी ने कोरोना वायरस की वैक्सीन (Coronavirus Vaccine) भी बनाई है. मॉडर्ना दुनिया की पहली कंपनी है, जिसने कोविड-19 का mRNA आधारित पहला टीका बनाया.

    मॉडर्ना अपनी एचआईवी वैक्सीन के दो वर्जन का ट्रायल करेगी. ये एड्स की पहली mRNA आधारित वैक्सीन है, जिसका इंसानों पर ट्रायल किया जाएगा. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री के मुताबिक पहले चरण के ट्रायल के लिए 18 से 50 आयु वर्ग के 56 एचआईवी निगेटिव लोगों को चुना गया है. पहले चरण के ट्रायल में चार ग्रुप होंगे. इनमें से दो ग्रुप को वैक्सीन की मिक्स डोज दी जाएगी, वहीं अन्य दो ग्रुप को दो वैक्सीन में से कोई एक दी जाएगी. हालांकि ट्रायल शामिल होने वाले लोगों को यह पता होगा कि वे किस ग्रुप में हैं.

    कैसे होगा mRNA वैक्सीन का ट्रायल
    बता दें कि मॉडर्ना की दोनों वैक्सीन का इस्तेमाल एक दूसरी वैक्सीन के साथ किया जाएगा, जिसे इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव (IAVI) और स्क्रिप्स रिसर्च ने विकसित किया है. दरअसल फॉर्मूला ये है कि मॉडर्ना की दोनों वैक्सीन के पास खास तरीके के बी-सेल पैदा करने की क्षमता है, जिससे प्रभावी एंटीबॉडीज विकसित होते हैं, वहीं दूसरी वैक्सीन वायरस को मारने के लिए इन एंटीबॉडीज को प्रेरित करती है. इस अध्ययन को IAVI ने स्पांसर किया है और पहले चरण का ट्रायल मई 2023 तक चलेगा, इस चरण को पूरा होने में 10 महीने का समय लग सकता है.

    दुनिया में एड्स के कितने मरीज
    विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एड्स से दुनिया भर में अभी तक 3 करोड़ 60 लाख से ज्यादा (36.3 मिलियन) लोगों की मौत हुई है. अनुमान है कि 2020 के अंत तक दुनिया भर में 3 करोड़ 70 लाख से ज्यादा (37.7 मिलियन) लोग एचआईवी संक्रमण के साथ जीवन गुजार रहे हैं. हालांकि एचआईवी का अभी तक कोई इलाज मौजूद नहीं है. लेकिन हाल के वर्षों में प्रभावी रोकथाम, रोग की पहचान और देखभाल के साथ एचआईवी को मैनेज करने में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सफलता हासिल की है. भारत के नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन के 2019 की एचआईवी रिपोर्ट के मुताबिक 23 लाख से ज्यादा लोग एचआईवी संक्रमण के साथ जी रहे हैं. लेकिन, साल 2000 के बाद से भारत में 15 से 49 आयु वर्ग के लोगों में एचाईवी के प्रिवैलेंस ट्रेंड में गिरावट देखी जा रही है. और हाल के वर्षों में यह स्थिर होती दिख रही है.

    एड्स की वैक्सीन बनाने में मुश्किल क्यों?
    भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महामारी विज्ञान और संचारी रोग विभाग के पूर्व प्रमुख और राष्ट्रीय एड्स अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ आर आर गंगाखेडकर ने कहा कि एचआईवी अपना स्वरूप बेहद तेजी के साथ बदलता है, जिससे एंटीबॉडी कवर प्रदान करना मुश्किल हो जाता है. इसके साथ एचआईवी वायरस का बाहरी स्वरूप शुगर कोटिंग से ढंका होता है, जिससे शरीर को इम्यून रेस्पांस पैदा करने में मुश्किल आती है. आईसीएमआर में सीजी पंडित नेशनल चेयर डॉ गंगाखेडकर ने कहा, ‘एंटी एचआईवी वैक्सीन एक चुनौती है, क्योंकि ये वायरस बड़ी तेजी से अपनी प्रतिकृति बनाता है और उतनी ही तेजी से म्यूटेट भी होता है. उच्च प्रतिकृति दर होने की वजह से इम्यून सिस्टम को गच्चा देने वाले म्यूटेंट पैदा होते हैं.’

    एचआईवी वायरस को समझिए
    वहीं डॉ. गगनदीप कंग ने कहा कि एचआईवी के मामले में जब तक शरीर एंटीबॉडी पैदा करता है, तब तक वायरस अपना स्वरूप बदल लेता है और एंटीबॉडीज वायरस को खत्म नहीं कर पाती है. लगातार हो रहे म्यूटेशन की वजह से वायरस एंटीबॉडी को गच्चा देने में कामयाब रहता है. डॉ. कंग ने कहा कि उदाहरण के लिए अगर आप एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के वायरस सीक्वेंस का अध्ययन करें तो पाएंगे कि तीन महीने के अंतराल पर वायरस का स्वरूप बदल गया है, पहले और तीन महीने बाद के वायरस सीक्वेंस में काफी अंतर होगा.

    वैक्सीन बनाने की पिछली कोशिशें
    डॉ. कंग ने कहा कि पहले वायरस के निष्क्रिय रूपों और एडेनोवायरस वायरस वेक्टर आधारित वैक्सीन की कोशिशें हुई थीं, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. उन्होंने कहा कि पहले कुछ एचआईवी क्लिनिकल ट्रायल किए गए थे, लेकिन वैक्सीन के प्रभावी न होने के चलते या तो बंद कर दिए गए और स्थगित कर दिए गए. वहीं एडेनोवायरस वेक्टर वैक्सीन के केस में पाया गया कि ट्रायल में शामिल हो रहे प्रतिभागी एचआईवी के प्रति ज्यादा संवेदनशील थे, बजाय वैक्सीन के चलते सुरक्षित होने के.

    राष्ट्रीय कोविड-19 टास्क फोर्स के विशेषज्ञ सदस्य और संक्रामक रोग सलाहकार डॉ संजय पुजारी ने कहा, ‘एचआईवी की वैक्सीन बनाने में मुख्य चुनौती इम्यून रेस्पांस के सटीक सहसंबंधों की पहचान करने में असमर्थता रही हैं, जिसे एचआईवी की विशाल विविधता के खिलाफ सुरक्षा प्रदान के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता होती है. साथ ही एचआईवी के प्रोटीन (envelope protein) और सीडी8 टी सेल के खिलाफ व्यापक रूप से तटस्थ एंटीबॉडी को प्रेरित करना मुख्य फोकस रहा है.’

    mRNA है उम्मीद की नई किरण
    डॉ कंग ने कहा कि मॉडर्ना का ट्रायल बिल्कुल अलग है, क्योंकि यह वैक्सीन डिजाइन करने और उसे तेजी के साथ विकसित करने के लिए एक तकनीक का प्रयोग करती है. ये कोरोना वायरस वैक्सीन के विकास की तरह ही है, जिसमें शरीर की कोशिका वायरस के स्पाइक इनविलप को पैदा कर सकती है, इससे इम्यून रेस्पांस पैदा होता है.

    डॉ पुजारी ने कहा कि एचआईवी के संदर्भ में mRNA वैक्सीन ने विट्रो और बंदरों पर ट्रायल के दौरान उम्मीद जगाने वाले नतीजे दिए हैं, ऐसे में इंसानों पर इसका परीक्षण किया जाना काफी उपयोगी होगा. उम्मीद जताई जा रही है कि mRNA वैक्सीन मानव के RNA में इस तरह का बदलाव करेगी, जिससे एचआईवी के दूसरे वैरिएंट न पैदा हों और इम्यून रेस्पांस सिस्टम से भी बच ना पाएं. डॉ पुजारी ने कहा कि अभी तक mRNA वैक्सीन के विकास में सबसे बड़ा चैलेंज तकनीक का रहा है. लेकिन, कोरोना वायरस की mRNA वैक्सीन बनाकर हमने इसमें सफलता हासिल कर ली है.

    वैक्सीन को लेकर क्या कहते हैं एक्सपर्ट
    एक्सपर्ट्स का कहना है कि एचआईवी वैक्सीन के मामले में दो तरीके हो सकते हैं – एक बचाव और दूसरा इलाज का. डॉ. कंग ने कहा कि बचाव वाली वैक्सीन के केस में यह देखा जाएगा कि वैक्सीन लगवाने के बाद कितने लोगों में एचआईवी संक्रमण फैलता है. या वैक्सीनेशन करवाने वाले लोगों में एचआईवी के खिलाफ प्रतिरोध पैदा होता है कि नहीं. वहीं इलाज वाली वैक्सीन के केस में व्यक्ति के शरीर में इम्यून रेस्पांस पैदा होगा, जो संक्रमित कोशिका को मार देगा और संक्रमण को आगे फैलने से रोकेगा.

    ‘जीवन भर खानी पड़ती हैं दवाएं, होते हैं साइड इफेक्ट’
    डॉ गंगाखेडकर ने कहा कि इलाज वाली वैक्सीन (Therapeutic Vaccine) को व्यापक स्तर पर प्रतिरोधी एंटीबॉडीज पैदा करने के लिए मानव कोशिका को प्रेरित करना होगा. उन्होंने कहा, ‘एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी संक्रमण को फैलने से रोक सकती है, कुछ लोगों को जीवन भर दवाएं खानी पड़ती हैं, और इसके साइड इफेक्ट होते हैं. लेकिन एक चिकित्कीय वैक्सीन और दवाएं एचआईवी का इलाज बन सकती है. हालांकि इनका लंबे समय के दौरान परीक्षण किया जाना चाहिए जिससे कि पता लग सके कि इम्यून रेस्पांस कितने समय तक बना रहता है.’

    उन्होंने कहा कि एचआईवी संक्रमण के मामले कम होते जा रहे हैं, एचआईवी का खतरा भी कम हो रहा है. इसके अलावा अन्य निवारक उपायों के जरिए भी एचआईवी के मामलों में कमी आई है, लेकिन इनके चलते ट्रायल में मुश्किल आती है, जिससे ये पता चल सके कि एचआईवी के खिलाफ वैक्सीन व्यापक स्तर पर प्रतिरोधी एंटीबॉडीज पैदा कर पा रही है या नहीं.’

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