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सैयद सलाहुद्दीन: जानिए पाकिस्‍तान में किस शान से रह रहा है ये ग्लोबल टेररिस्ट

News18Hindi
Updated: July 4, 2017, 9:27 AM IST
सैयद सलाहुद्दीन: जानिए पाकिस्‍तान में किस शान से रह रहा है ये ग्लोबल टेररिस्ट
इस्लामाबाद में है हिज्बुल मुजाहिद्दीन का हेडक्वार्टर

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-विश्वास कुमार/कुणाल सिंह चौहान
 पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI की सरपरस्ती में बैठा आतंक का आका और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का आका सैयद सलाहुद्दीन अपनी ही बुनी साज़िशों के जाल में इस कदर उलझ चुका है कि अब उसे अपनी जान बचाने के लाले पड़ चुके हैं. सलाहुद्दीन पर ग्लोबल टेररिस्ट का ठप्पा लग चुका है, लेकिन आखिर ये सब हुआ कैसे? आखिर अमेरिका सलाहुद्दीन को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने के लिए कैसे मान गया?

कश्मीर में आतंक का कारोबार करने वाले सैयद सलाहुद्दीन पिछले 26 साल से कश्मीर घाटी में अपना आतंक का नेटवर्क चला रहा है, लेकिन ISI की गोद में बैठे सलाउद्दीन कई सालों से पाकिस्तान में रहकर कश्मीर में आतंक की वारदातों को अंजाम दे रहा है. ग्लोबल टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन की लिस्ट में सलाहुद्दीन को शामिल करने के पीछे मोदी सरकार, सिक्योरिटी और इंटेलीजेंस एजेंसीज की कूटनीति है.

गृह मंत्रालय यानी रक्षा मंत्रालय ने हिज़्बुल मुजाहिद्दीन और उसके सरगना सैयद सलाहुद्दीन ग्लोबल टेररिस्ट लिस्ट में शामिल करने के लिए एक डिटेल्ड डोजियर बनाकर अमेरिका की ट्रंप सरकार को सौंपा था. इसी का नतीजा था कि अमेरिका ने सलाहुद्दीन को एक ग्लोबल आतंकवादी घोषित कर दिया. दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका को सौंपे गए भारत सरकार के डोज़ियर में पहली बार पाकिस्तान में रह रहे सैयद सलाहुद्दीन के घर का पूरा पता दिया गया है.

इस्लामाबाद में है सलाहुद्दीन का ठिकाना
सभी जानते हैं कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हीं सैयद सलाहुद्दीन ने अपने आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का हेडक्वार्टर बना रखा है. जहां से ही पाकिस्तान की सरकार की सीनेट, नेशनल एसेंबली और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाएं अपना काम करती हैं. भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के मुताबिक इस्लामाबाद में स्थित G 10/2 नामक पते पर ग्लोबल आतंकवादी और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन का ठिकाना है और आतंक का आका सलाउद्दीन अपनी T2 LAND CRUISER SUV से यहां से आता-जाता है.

इतना ही नहीं सलाहुद्दीन के उक्त बंगले की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा पाकिस्तानी पुलिस, ISI और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के हवाले है. सलाहुद्दीन के दोनों बॉडीगार्डस अनस शकील और करीमुल्लाह कश्मीरी हैं. यानी पाकिस्तान सरकार की सरपरस्ती में पूरी दुनिया की आंखों में धूल झोंक कर सैयद सलाहुद्दीन इस्लामाबाद में चैन से रह रहा है.वर्ष 2011 में सैयद सलाहुद्दीन ने पाकिस्तान में हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के मारे जा चुके आतंकी औरंगज़ेब की बेटी नूरजहां से शादी की थी और उसके बेटे वाफ़ी अहमद को गोद ले चुका है. हिज़्बुल आतंकी औरंगज़ेब श्रीनगर के खानयार इलाके का रहने वाला था. सैयद सलाहुद्दीन पैदा तो हिंदुस्तान में हुआ लेकिन अब अपने ही मुल्क से ही गद्दारी कर रहा है और उसी मिट्टी को बेगुनाहों के ख़ून से लाल कर रहा है.

ग्लोबल आतंकी है सैयद सलाहुद्दीन
सैयद सलाहुद्दीन का असली नाम सैयद मुहम्मद यूसूफ शाह है, लेकिन पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आईएसआई की सरपरस्ती में 11 नवंबर 1991 में आतंकी संगठन हिज्बुल-मुजाहिद्दीन का सरगना बनने के बाद इसने अपना नाम बदल कर सैयद सलाहुद्दीन रख लिया. हैरानी की बात यह है कि इस आतंकवादी का पूरा परिवार आज भी कश्मीर घाटी में ही रहता है.

पाकिस्तान सरकार की शह पर आतंकी सलाहुद्दीन ने इस्लामाबाद शहर में ही G 2/10, GALI NO-1 में जम्मू-कश्मीर रिलीफ ट्रस्ट के नाम पर अपना हेडक्वार्टर बना रखा है और इसी ठिकाने से सलाउद्दीन आतंक का अपना काला कारोबार चलाता है. इस्लामाबाद स्थित सलाहुद्दीन के हेडक्वार्टर के इंचार्ज का नाम मुजाहिद बाबर है और यही वो ठिकाना है जहां ISI के कर्नल जुनैद, कर्नल सुल्तान और मेजर आमिर सलाहुद्दीन से मिलने के लिए उसके हेडक्वार्टर में अक्सर आते-जाते हैं.

हेडक्वार्टर पर 24 घंटे रहता है कड़ा पहरा
हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का हेडक्वार्टर के चारों तरफ ऊंची-ऊंची बाऊंड्रीवाल है.हिज़्ब के हेडक्वार्टर में अंदर आने के लिए एक मेन गेट है. इस गेट पर चौबीसों घंटे सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं.बिल्डिंग में अंदर आने के बाद बांयी तरफ सैयद सलाहुद्दीन यानी हिज़्बुल के दफ़्तर की मेन बिल्डिंग है. यह एक दो मंज़िला इमारत है, जिसकी निचली मंज़िल पर रिशेप्शन एरिया और मिलने वालों के लिए बैठने की जगह है और पहली मंज़िल पर जम्मू-कश्मीर रिलीफ ट्रस्ट का आफिस है.

हिज़्ब के हेडक्वार्टर की मेन बिल्डिंग के पीछे एक स्टोर रुम है और दांयी तरफ गार्डरुम है. इसके अलावा इस कैंपस में एक कैंटीन भी जो कि मेन ऑफिस से करीब 200 से 300 मीटर की दूरी पर है. इसके अलावा हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के हेडक्वार्टर के कैंपस में गाड़ियों के पार्क करने की अलग जगह है और एक बड़ा खेलने का मैदान भी है.

हेडक्वार्टर में मौजूद हैं टेलीफोन एक्सचेंज
हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के हेडक्वार्टर में बाकायदा अपनी एक टेलीफोन एक्सचेंज भी है और बात करने के लिए कई टेलीफोन लाइनें हैं. SIT टीम की एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक उसे हिज़्ब के हेडक्वार्टर के कुछ फोन नंबर भी मिले, जिनके ज़रिए सैयद सलाहुद्दीन अपने आतंक के पैगाम पाकिस्तान में बैठे आतंकियों को भेजता है. उक्त नंबर हैं 051-2614371, 051-2614372, 051-2614373, 051-2614374,051-2614375.

उपरोक्त लैंडलाइन नंबरों के ज़रिए हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का आका सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में अपने कमांडरों से बातचीत करता है. यही वो नंबर हैं जिनके ज़रिए आतंक की साज़िशें पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से होते हुए POK में बने आतंकी ट्रेनिंग कैंप्स और लाचिंग पैड्स तक पहुंचती हैं.

सलाहुद्दीन के सिर पर पाकिस्तान का हाथ
सलाहुद्दीन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पाकिस्तानी सरकार और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI की सरपरस्ती में धडल्ले से आंतकी गतिविधि चला रहा है और उसके नेटवर्क पर कोई भी लगाम कसने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता यानी खुला खेल फ़र्रुखाबादी. जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का? यानी जब पाकिस्तान की सरकार, सेना और ख़ुफ़िया तंत्र ही एक आतंकवादी और उसके मंसूबों को शह दे रहे हों तो फिर भला पाकिस्तान में किस की मजाल की वो सैयद सलाहुद्दीन के ख़िलाफ़ कुछ कर पाए.

हिज्बुल के ज्यादातर कर्मचारी कश्मीरी
हिज़्बुल के हेडक्वार्टर यानी इस्लामाबाद में काम करने वाले ज़्यादातर कर्मचारी कश्मीरी हैं, जो सलाहुद्दीन के बहकावे में सरहद पार चले गए और अब उसी के आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के लिए काम करते हैं, लेकिन हिज़्बुल की कैंटीन में खाना पकाने वाले सभी कुक यानी खानसामें पाकिस्तानी है. वहीं, हिज़्बुल के हेडक्वार्टर में सलाहुद्दीन के लिए काम कर रहे उसके ज़्यादातर कमांडर शादीशुदा हैं और इस्लामाबाद के जाबा टाउन इलाके में प्रॉपर्टी डिलिंग का धंधा भी करते हैं.

इनमें से कुछ सैयद सलाहुद्दीन के लिए काम कर रहे हैं तो कुछ का अपना रियल एस्टेट का कारोबार है. हिज़्बुल की कमांड काउंसिल के चीफ को हिज़्ब के दफ़्तर में काम करने की एवज में 3000 हज़ार रुपए मिलते हैं, लेकिन उन्हें महीने के 12000 रुपए भत्ते के तौर पर भी दिए जाते हैं. कमांड चीफ को उनके टेलीफोन के बिल के लिए 200 रुपए अलग से दिए जाते हैं.

कॉरपोरेट कंपनी जैसा काम करती है हिज्बुल
हिज़्बुल मुजाहिद्दीन एक कॉरपोरेट कंपनी की तरह काम करता है और पाकिस्तान और POK में हिज़्बुल के कुल 8 ऑपरेटिव विंग हैं. इनमें आतंकियों के आतंकियों का रिकॉर्ड विंग, स्टोर एंड पर्चेस विंग, कम्यूनिकेशन विंग, हेल्थ विंग, मीडिया विंग, फाइनेंस विंग, ट्रांसपोर्ट विंग और लांचिंग पैड विंग शामिल हैं.

हिज्बुल आतंकियों को पालती है आईएसआई
हिज़्बुल खुद को चाहे कितना भी बड़ा आतंकी संगठन बोल लें, लेकिन सैयद सलाहुद्दीन के आतंक की दुकान पाकिस्तान ख़ुफ़िया एजेंसी ISI की बदौलत ही चलती है. हिज़्बुल को पैसे की फंडिंग ISI करती है. इसके अलावा हिज़्बुल मुजाहिद्दीन से हमदर्दी रखने वाले इस्लामी देशों के नागरिक भी उन्हें चंदे के नाम पर पैसे भेजते रहते हैं. दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो सलाहुद्दीन पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी के रहमो-करम और ख़ैरात पर ज़िंदा है. हिज़्ब के आतंकियों को हथियार और ट्रेनिंग देने का ज़िम्मा पाकिस्तानी सेना करती है.

हिज्बुल मुजाहिद्दीन का कम्युनिकेशन विंग
हिज़्बुल आतंकियों की एक टीम VHF वायलेस सेट्स और भारतीय ममोबाइल सिमकार्डस के ज़रिए फील्ड यानी कश्मीर में आतंकी साज़िशों को अंजाम दे रहे आतंकवादियों से लगातार बातचीत करती रहती है और सैयद सलाहुद्दीन के पैग़ाम उन तक पहुंचाती रहती है, एक्सचेंज सेक्शन की टीम हिज़्बुल की नौकरी कर रहे आतंकियों की टीम के ज़िम्मे कॉल्स को मॉनिटर करने की ज़िम्मेदारी होती है.

इसके अलावा वो अपने कमांडरों के लिए मोबाइल फोन और मोबाइल सिम कार्ड भी मुहैया करवाते हैं जबकि वर्कशॉप सेक्शन टीम के पास अपने आतंकवादियों औक कमांडरों को तकनीकी मदद महैया कराने की ज़िम्मेदारी होती है. इसके अलावा ये हिज़्बुल में शामिल हुए नए आतंकियों को ट्रेनिंग भी देते हैं.

1500 से 2000 है फुलटाइम आतंकी
हिज़्बुल मुजाहिद्दीन को एक कंपनी की तरह चला रहे सलाहुद्दीन के संगठन में 1500 से 2000 आतंकी फुलटाइम काम कर रहे हैं. इनमें से 1000 आतंकी शादीशुदा हैं और पाकिस्तान और पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में रह रहे हैं. इन सभी आतंकियों को गुज़ारा भत्ते के तौर पर संगठन 12 हज़ार रुपए देता है. इसके अलावा अगर कोई आतंकी शादी करता है तो उसे एकमुश्त 1 लाख रुपए दिए जाते हैं. इनमें 50 हज़ार रुपए शादी के लिए और दूसरे 50 हज़ार रुपए रोज़गार के लिए दिए जाते हैं.

पाकिस्तान और POK में हैं 50 आतंकी
हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के 50 से ज़्यादा आतंकी पाकिस्तान में फैले उसके अलग-अलग दफ़्तरों में काम कर रहे हैं, जिन्हें हर महीने 3300 रुपए दिए जाते हैं. इन दफ़्तरों में काम करने वाले आतंकियों को मुफ्त खाना और रहने की जगह मुहैया कराई जाती है. जबकि अकेले मुज़फ़्फ़राबाद के आतंकी कैंप में पाकिस्तानी मूल के 100 आतंकी रह रहे हैं. इन आतंकियों को कश्मीरी मूल के आतंकियों से अलग रखा जाता है और उन्हें कश्मीरी आतंकियों से मिलने की मनाही भी है. यानी आतंक का आका अपने आतंकी
संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन में अपने ही आतंक के खिलौनों से भेदभाव करता है.

सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन बना हिज्बुल
पाकिस्तान यानी वो मुल्क जहां दुनियाभर के आतंकवादी किराएदार की तरह रहते हैं. अमेरिका ने ही पाकिस्तान की सरज़मीं पर अल-क़ायदा के आका ओसामा बिन लादेन समेत उसके कई टॉप कमांडरों को मारा था, बावजूद इसके पाकिस्तान बड़ी ही बेशर्मी से अपने यहां आतंक और आतंक के आकाओं को पनाह देने में लगा हुआ है, क्योंकि पाकिस्तान में ही हिज़्बुल मुदाहिद्दीन की बुनियाद रखी गई थी.

अभी राजधानी इस्लामाबाद में G 2/10 गली नंबर-1 में सलाहुद्दीन जम्मू-कश्मीर रिलीफ़ ट्रस्ट के नाम पर
आतंक की फैक्ट्ररी खोली हुई है. सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आतंकी संगठन हिज़्ब-उल-मुजाहिद्दीन इस वक्त पाकिस्तान में सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन है.

पाक को भी आंख दिखाता है हिज्बुल
सैयद सलाहुद्दीन सिर्फ हिंदुस्तान के खिलाफ़ ही ज़हर नहीं उगलता बल्कि गाहे-बगाहे पाकिस्तान की सरकार को भी आंख दिखाने से बाज़ नहीं आता. एक बार अपने बयान में पाकिस्तान की सरकार को सलाउद्दीन याद करा चुका है कि वो उनके लिए भारत से
कश्मीर में जंग कर रहे हैं और अगर पाकिस्तानी सरकार ने उनकी मदद में कोई भी कोताही बरती तो यह लड़ाई पाकिस्तान की सरज़मी पर लड़ी जाएगी.

आतंकी संगठन हिज्बुल का इतिहास
एक कश्मीरी आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन की बुनियाद नवंबर 1989 में मोहम्मद अशरफ़ डार, मक़्बूल इलाही, अब्दुलाह बांगरु, पाकिस्तानी आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी और JKLF के अलगाववादी नेताओं ने मिलकर रखी थी.मास्टर अहसान डार हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का पहला सरगना था. शुरुआती दौर में सैयद सलाहुद्दीन श्रीनगर में हिज़्ब का डिविज़नल कमांडर हुआ करता था, लेकिन 11 नवंबर 1991 को उसे हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का सरगना बना दिया गया और फिलहाल हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का चीफ होने साथ-साथ सलाउद्दीन 14 अन्य आतंकी संगठनों को मिलाकर बनाई गई यूनाइटेड जेहाद काउंसिल का भी सरगना है.

5 डिवीजन में बंटा है जम्मू और कश्मीर
सेंट्रल डिवीजन, नॉर्दर्न डिवीजन, साउथ डिवीजन, चेनाब डिवीजन और पीर पंजाल डिवीजन नाम से बनाए 5 डिवीजन के सेंट्रल डिवीजन में श्रीनगर, बड़गाम और गांदरबल के इलाके को रखा गया है, नॉर्दर्न डिवीजन की हद में कुपवाड़ा, बांदीपुरा और बारामूला
जिले आते हैं, साउथ डिवीजन का इलाका कुलगाम, शोपियां, अनंतनाग और पुलवामा जिले से लेकर चेनाब डिवीजन में डोडा और उधमपुर तक फैला हुआ है जबकि पीर पंजाल डिवीजन एक सरहदी इलाका माना जाता है इसमें रियासी और पुंछ सेक्टर आते हैं.

डिवीजन में तैनात होते हैं कश्मीरी कमांडर
नक्शे पर जमीन को टुकड़ों में बांटने के बाद हिज्बुल मुजाहिदीन ने उन हिस्सों में बर्बादी करने के लिए अलग-अलग कमांडर तय किए हैं और उन्हें इलाके में आतंकी चिंगारी को भड़काने से लेकर उसे आतंकी वारदात तक में तब्दील करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है. यानी इन पांच डिवीजन को संभालने के लिए हिज्बुल मुजाहिदीन के पास अलग अलग कमांडर हैं. चौंकाने वाला पहलू ये है कि इन पांचों ही डिवीजन के कमांडर मूल रूप से कश्मीरियों को ही बनाया जाता है ताकि वो अपनी बातों और जान-पहचान के असर से कश्मीरी नौजवानों को आसानी से बहला फुसलाकर अपनी नापाक हरकतों का हिस्सेदार बना सकें।

दो हिस्सों में बंटा है हिज्बुल मुजाहिदीन
हिज्बुल मुजाहिदीन का संगठन मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंटा हुआ है. एक धड़ा बंदोबस्त के कामों को देखता है जबकि दूसरा गुट ऑपरेशन के लिए जिम्मेदारी होता है. बंदोबस्त का काम देखने वाले गुट को तंजीमी कहा जाता है जबकि ऑपरेशन विंग का नाम असकारी है यानी फौजी कार्रवाई. तंजीमी गुट बंदोबस्त के तौर पर आतंकवाद के लिए जमीन तैयार करता है जबकि असकारी उसे फौजी दस्तों की तरह अंजाम तक पहुंचाता है.

हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी संगठन का ढांचा कॉरपोरेट है, जहां अलग-अलग कामों की जिम्मेदारी अलग-अलग लोगों को बांटी जाती है ताकि कश्मीर में अपने मंसूबों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए की गई कार्रवाई और उसके नतीजे के मुताबिक उनकी जिम्मेदारी तय की जा सके.

हिज्बुल मुजाहिद्दीन-सांगठनिक ढांचा
सुप्रीम कमांडर↓दो डिप्टी सुप्रीम कमांडर↓डिवीजनल कमांडर↓डिस्ट्रिक्ट कमांडर↓लोकल आतंकवादी

कैसे काम करता है हिज्बुल मुजाहिद्दीन
अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन की जमात में शामिल किया है हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना सैय्यद सलाहुद्दीन उर्फ़ मुहम्मद यूसुफ़ शाह उर्फ प्रोफेसर, मूलत: कश्मीरी है और बड़गाम इलाके का रहने वाला है. वर्ष1991 से वो हिजबुल का सुप्रीम कमांडर बना हुआ है और उसने ये बात अपने संगठन में कायम रखी कि हिजबुल मुजाहिदीन संगठन में जिम्मेदारी और फैसला लेने वाली किसी भी पोस्ट के लिए उम्मीदवार की पहली योग्यता उसका कश्मीरी होना है.

यानी वो सिर्फ कश्मीरियों को ही अपने संगठन में अहम जिम्मेदारियां सौंपता है और इस संगठन को कॉरपोरेट की तर्ज पर चलाने के लिए उसने एक कमांड काउंसिल बना रखी है जिसे शूरा कहा जाता है. इस कमांड काउंसिल में 21 सदस्य रखे गए हैं, जिनमें ज्यादातर कश्मीर के ही लोग हैं ताकि दुनिया को इस धोखे में रखा जा सके कि ये सारी लड़ाई कश्मीरी ही लड़ रहे हैं और इसमें पाकिस्तान का कोई लेना देना नहीं.

शूरा पर छोटे-बड़े फैसले की जिम्मेदारी
संगठन में हर छोटा बड़ा फैसला लेने की जिम्मेदारी शूरा की होती है. फिर चाहें संगठन के लिए बजट तय करना हो या फिर डिवीजनल कमांडर्स की नियुक्ति अथवा कोई रणनीतिक फैसले लेन हो, यह सभी को शूरा में तय किया जाता है. फिर उसे अंजाम के लिए आगे बढ़ाया जाता है. संगठन के साथ-साथ आतंकी वारदातों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए फंडिंग की भी जरूरत होती है. इसका इंतजाम शूरा के लोग करते हैं और इसके लिए दुनिया भर में फैले कश्मीरियों से चंदा इकट्ठा किया जाता है और ये उन्हीं
पैसों का कमाल है, जो पत्थरों की शक्ल में हिन्दुस्तानी सिपाहियों के सामने आता है.

हिज्बुल के मोहरे हैं कश्मीरी पत्थरबाज
कश्मीर घाटी में पत्थर उठाने वाले हाथ हिज्बुल मुजाहिदीन के मोहरे होते है, जो पाकिस्तानी झंडा लेकर हिन्दुस्तान के खिलाफ मुट्ठी तानकर खड़े दिखाई देते हैं. हिन्दुस्तानी सुरक्षा एजेंसियां इनकी पहचान ओजीडब्ल्यू (OGW) के रुप में करती है. ओ जी डब्ल्यू यानी ओवर ग्राउंड वर्कर. इनका असली काम आतंक की जमीन तैयार करने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाने का होता है. बुरहान वानी, जाकिर मूसा इसके सबसे सटीक सबूत हैं. ये वो मोहरे हैं जो कश्मीर के लोगों को कश्मीरियत के नाम पर भड़काने
के लिए ही तैयार किए जाते हैं.

संगठन में पाक आतंकियों की भरमार
डोजियर में खुलासा किया गया है कि धारणा के विपरीति हिज्ब कश्मीर के भटके हुए गुमराह लड़कों का संगठन नहीं है, बल्कि असलियत यह है कि इस संगठन में पाकिस्तानी आतंकवादियों की भी भरमार है. इसके अलावा कई और मुल्कों के आतंकी भी कश्मीर में हिन्दुस्तान के खिलाफ आग उगल रहे हैं.

हालांकि हिज्ब के शूरा के 21 सदस्यों में से ज्यादातर सदस्य या तो पीओके में हैं या फिर पाकिस्तान की पनाह में आतंकी वारदात को अंजाम दे रहे हैं, लेकिन शूरा के तमाम सदस्यों का वास्ता कश्मीर से ही
होता है, जो अपने रिश्तेदारों और आस पड़ोस के लोगों को भड़काने, उन्हें आतंकी वारदातों में शामिल करने और उनके मार्फत भारतीय सेना के खिलाफ साज़िशों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए शूरा के यही सदस्य जिम्मेदार होते हैं.

सूडान व अफगान तक फैले हैं तार
अमेरिका ने ऐसे ही भारत की बात को तव्वजो देते हुए हिज़्ब उल मुजाहिद्दीन को एक आतंकवादी संगठन और सैयद सलाहुद्दीन को ग्लोबल टेरिरस्ट घोषित किया है. दरअसल सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक सैयद सलाहुद्दीन का नेटवर्क सिर्फ कश्मीर तक ही महदूद नहीं है, बल्कि वो हिज़्ब उल मुजाहिद्दीन के तार सूडान और अफ़गानिस्तान तक में फैले हुए हैं.

सलाहुद्दीन के आ चुके हैं बुरे दिन
जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीर समझने वाले सैयद सलाहुद्दीन के बुरे दिन आने वाले हैं, जिससे वह डरा हुआ है. खुद पर ग्लोबल टेररिस्ट का ठप्पा लगने के बाद सैयद सलाहुद्दीन को ये डर सता रहा है कि अमेरिका उस पर ड्रोन से हमला करवा सकता है. लिहाज़ा वो अमेरिका के खिलाफ़ अनाप-शनाप बयानबाज़ी कर रहा है.सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका वक्त आने पर सैयद सलाहुद्दीन पर कार्रवाई कर सकता है. इसलिए आतंक के आका सैयद सलाहुद्दीन ने 1 जुलाई 2017 को POK के मुज़फ़्फ़राबाद में
एक रैली आयोजित की.

इस रैली का मकसद अमेरिका को ये जताना था कि उसने उस पर जो ग्लोबल आतंकवादी का ठप्पा लगाया है वो ग़लत है. दरअसल जिस दिन से अमेरिका ने हिज़्ब के सरगना को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित किया है उसी दिन से सैयद सलाहुद्दीन तिलमिलाया हुआ है और अपनी खिसियाहट में वो अमेरिका के ख़िलाफ़ बयाबबाज़ी पर भी उतर आता है...इतना ही नहीं सलाहुद्दीन ने जोश-जोश में अमेरिका को ये जता दिया कि कश्मीर का आवाम उसके साथ खड़ा है.

अब आतंक का आका बोलेगा तो उसका धमकी देना तो लाज़िमी है, लेकिन सैयद सलाहुद्दीन जोश-जोश में यह भूल गया कि वो अमेरिका जैसे मुल्क को धमकी दे रहा है. अमेरिका को चैलेंज देते हुए उसने कहा कि वो उस पर ग्लोबल टेररिस्ट के ठप्पे को साबित करके दिखा दे.सैयद सलाहुद्दीन अमेरिका को नसीहत देना भी नहीं भूला. उसके मुताबिक अमेरिका उसको ग्लोबल टेरिरिस्ट और उसके आतंकी संगठन हिज़्ब उल मुजाहिद्दीन को ग्लोबल आतंकवादी संगठन घोषित करके एक ग़लती तो कर ही चुका है, लेकिन वो ये भूल गया कि वो जो कश्मीर में कर रहा है वो आतंकवाद नहीं, बल्कि कश्मीर की आज़ादी की लड़ाई है.

अमेरिकी कार्रवाई से बौखलाया पाकिस्तान
दरअसल, सैयद सलाहुद्दीन पर आतंकवादी का लेबल लगने के बाद से पाकिस्तान भी बौखलाया हुआ है, क्योंकि सैयद सलाहुद्दीन उसकी सरज़मी से आतंक की अपनी नर्सरी चला रहा है और इसकी वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की साख भी गिरी है. ये बात तो सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में दुनियाभर के आतंकी पनाह लेकर कर छिपे बैठे हैं. लिहाज़ा अब पाकिस्तान को ये डर सता रहा है कि अगर अमेरिका ने सैयद सलाहुद्दीन के खिलाफ़ को कार्रवाई कर दी तो ये उसके मुंह पर एक करारा तमाचा होगा.

जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान दुनिया में अपनी गिरती हुई साख बचाने के और खुद एक आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश का लेबल लगने से बचने के लिए पाक में भारत के खिलाफ़ साज़िश रच रहे आतंक के आकाओं पर दुनिया को दिखाने के कार्रवाई की नौटंकी करता रहता है, लेकिन अब सारी दुनिया जान चुकी है कि आखिर पाकिस्तान की असलियत क्या है. दरअसल ये पाकिस्तान की ही बुनी एक साज़िश है जिसके ज़रिए वो सूफ़ी कश्मीर को सलाफिस कश्मीर में बदलना चाहता है, लेकिन
भारतीय सेना और उसकी सुरक्षा एजेंसिया बार-बार पाकिस्तानी साज़िशों को नाकाम करके उसके सभी मंसूबों पर पानी फेर देती है.

हिंदुस्तान का मुकुट है कश्मीर
हिन्दुस्तान का मुकुट माने जाने वाले कश्मीर घाटी को आतंकवादी हरकतें सिरदर्द की तरह पूरी तरह जकड़े हुए हैं. अब अगर सिरदर्द है तो कहीं न कहीं और कोई न कोई वजह भी होगी और वो वजह है हिज्बुल मुजाहिद्दीन. हिज्ब ने धरती की जन्नत कहलाने वाली कश्मीर घाटी को जहन्नुम बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है. हिज्ब जम्मू और कश्मीर को करीब पांच हिस्सों में बांटा है और अपनी जरूरत के मुताबिक जम्मू कश्मीर के अलग- अलग हिस्सों में आतंक की चिंगारी भड़काने का काम करता रहा हैं ताकि हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानी फौज चैन से न बैठ सके.

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First published: July 4, 2017, 9:27 AM IST
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