एक 'हिंदूवादी' पिता की संतान सोमनाथ चटर्जी कैसे बने कट्टर कम्युनिस्ट

सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं. सोमवार सुबह कोलकाता में उनका 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया.

फर्स्टपोस्ट.कॉम
Updated: August 13, 2018, 9:45 AM IST
एक 'हिंदूवादी' पिता की संतान सोमनाथ चटर्जी कैसे बने कट्टर कम्युनिस्ट
पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का 89 साल की उम्र में निधन हो गया.
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Updated: August 13, 2018, 9:45 AM IST
(सुरेंद्र किशोर)

सोमनाथ चटर्जी भारतीय राजनीति की एक विशेष हस्ती थे. वह मशहूर वकील और हिंदू महासभा के संस्थापक अध्यक्ष निर्मलचंद्र चटर्जी के पुत्र थे. सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं. सोमवार सुबह कोलकाता में उनका 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया.

एक बार सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में बीजेपी के खिलाफ कुछ बोल रहे थे. इस पर सुषमा स्वराज ने टोकते हुए कहा कि चटर्जी साहब, आप याद रखें कि आपके पिताजी ने आपका नाम सोमनाथ रखा था जिस नाम का मशहूर मंदिर है इस देश में. इस पर उस समय थोड़ी देर के लिए ऐसा लगा लगा कि सोमनाथजी का बीजेपी के प्रति रोष थोड़ा कम हो गया.

याद रहे कि आम तौर पर सीपीएम के किसी नेता का भाषण बीजेपी की आलोचना के बिना पूरा  नहीं होता.

 यह तो हुआ नाम और पार्टी में विरोधाभास. पर एक समय उनके पिताश्री निर्मल चंद्र चटर्जी ने तो और भी कमाल कर किया था.


दिवंगत चटर्जी अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापक अध्यक्ष थे. फिर भी उन्होंने कम्युनिस्टों की रिहाई के लिए अभियान चलाया था. कहां हिंदू महासभा और कहां कम्युनिस्ट! दो छोर एक जगह मिले थे. पर सवाल नागरिकों के अधिकार का जो था .

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सन 1948 में जब केंद्र सरकार ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगाया और कम्युनिस्टों को गिरफ्तार करना शुरू किया तो उसका विरोध करने के लिए एनसी चटर्जी ने आॅल इंडिया सिविल लिबर्टी यूनियन बना ली. चटर्जी सीनियर तब कोलकाता हाईकोर्ट के नामी वकील थे. यूनियन के जरिए उन्होंने कम्युनिस्टोें की रिहाई के लिए जोरदार अभियान चलाया.

उसी दौरान ज्योति बसु का इस चटर्जी परिवार से लगाव बढ़ा.

हालांकि सोमनाथ चटर्जी सन 1968 में सीपीएम के सदस्य बने. ज्योति बसु का सोमनाथ चटर्जी पर स्नेह बना रहा.

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जब सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा के स्पीकर पद से इस्तीफा देने के पार्टी के निर्देश को मानने से इनकार कर दिया तो पाॅलित ब्यूरो ने 2008 में सोमनाथजी को सीपीएम से निकाल दिया.

याद रहे कि भारत-अमेरिका न्यूक्लियर समझौता विधेयक के विरोध में सीपीएम ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. तब पार्टी ने उन्हें स्पीकर पद छोड़ने को कहा.

पद नहीं छोड़ने के चटर्जी साहब के अपने तर्क थे. याद रहे कि वह दस बार लोक सभा के सदस्य चुने गये थे.वह संभवतः स्पीकर के पद को वह ऐसा नहीं मानते थे जिस पर किसी पार्टी का आदेश चले. सोमनाथजी सिर्फ एक बार 1984 के लोस चुनाव में ममता बनर्जी से हारे थे.

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कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में ममता बनर्जी ने सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र में करीब 20 हजार मतों से हराया था.

सन 2009 में सोमनाथजी का चुनाव क्षेत्र बोलपुर कर दिया गया.

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सोमनाथ चटर्जी को भले पार्टी ने  निकाल दिया, पर उनका सीपीएम से भावनात्मक संबंध बना रहा. एक बार उन्होंने कहा था कि मेरी इच्छा है कि मेरी अंतिम यात्रा लाल झंडे के साथ ही पूरी हो. जानकार सूत्रों के अनुसार कुछ औपचारिकताएं पूरी नहीं होने के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है.

इस देश की राजनीति के लिए वह एक बड़ा यादगार क्षण था जब लोकसभा में सुप्रीम कोर्ट के जज वी.रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जा रहा था.

10 मई, 1993 को वह प्रस्ताव सोमनाथ चटर्जी ने ही  पेश किया था. उन्होंने सदन से मांग की कि ‘न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा के लिए रामास्वामी के खिलाफ सदन कार्रवाई करे. ’यह और बात है कि सदन में वह प्रस्ताव पास नहीं हो सका क्योंकि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने मतदान का बहिष्कार कर दिया.'

सोमनाथ चटर्जी का जन्म असम के तेजपुर में 25 जुलाई, 1929 को हुआ था. उनकी पढ़ाई कोलकाता और कैम्ब्रिज में हुई. श्रमिक नेता और वकील सोमनाथ जी प्रभावशाली वक्ता थे . वह 1989 से 2004 तक लोकसभा में सीपीएम संसदीय दल के नेता रहे. 2004 में वह सर्वसम्मति से लोक सभा के स्पीकर चुने गए थे.पर पार्टी  से मतभेद के कारण वह 2008 में दल से निकाले गए.

सोमनाथ चटर्जी की शादी 1950 में जमींदार परिवार की रेणु से हुई. उनके एक पुत्र और दो पुत्रियां हैं. पुत्र प्रताप चटर्जी कोलकाता हाईकोर्ट में वकील हैं.

‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ रहे सोमनाथ चटर्जी पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम के अध्यक्ष भी थे. उस दौरान उन्होंने पश्चिम  बंगाल में उद्योग लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किए.

जब वह सरकारी कामों से विदेश जाते थे तो उनके साथ गए अपने परिजन का पूरा खर्च सोमनाथजी अपनी जेब से देते थे. स्पीकर की जिम्मेदारी संभालते समय भी उन्होंने अपने सरकारी आवास पर पहले से हो रहे कुछ गैर जरूरी सरकारी खर्चों में कटौती कर दी थी.

(यह लेख पूर्व में छप चुका है)
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