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लोकसभा चुनाव 2019: बंगाल में बढ़ रही बीजेपी की धमक, तो रणनीति बदलने को मजबूर हुईं ममता!

ममता बनर्जी की फाइल फोटो

ममता बनर्जी की फाइल फोटो

ममता बनर्जी ने यहां तक ​कहा था कि वह बीजेपी के खिलाफ लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर वाम दलों और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार हैं, हालांकि राज्य स्तर पर लड़ाई जारी रहेगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 31, 2019, 1:27 PM IST
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अनिता कात्याल

तृणमूल सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सालों तक अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार साल 2011 में दशकों पुरानी वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका. वास्तव में, वह अपने मिशन में इतनी प्रेरित थी कि उन्होंने साल 1998 में कांग्रेस भी छोड़ दिया क्योंकि उनका मानना था कि कांग्रेस पार्टी वामपंथियों से लड़ने के लिए गंभीर नहीं थी और वास्तव में दोनों के बीच एक मौन समझौता बना हुआ था. लेकिन एक दशक से भी कम समय के बाद उन्होंने वाम मोर्चे को कमजोर कर दिया और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की हैसियत एक मामूली खिलाड़ी की कर दी. हालांकि अब बनर्जी को दोनों दलों के साथ अपने संबंधों पर एक बार फिर से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा.

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टीएमसी मुखिया के लिए बड़ी चिंता का विषय भारतीय जनता पार्टी है, जो राज्य में लगातार अपनी जगह बनाने की कोशिश में है. नतीजतन, ममता ने वामपंथी दलों और कांग्रेस के खिलाफ बयानबाजी बंद कर दी है और बीजेपी से लड़ने के लिए अपनी ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, जिसका सांप्रदायिक एजेंडा पश्चिम बंगाल, खासकर बांग्लादेश की सीमा से लगे इलाकों में खूब गूंज रहा है.
सीपीएम के प्रति तृणमूल का नरम रुख तब दिखा जब वामपंथी दलों ने हाल ही में कोलकाता में एक विशाल रैली की. पहले के समय में, जिलों और गांवों में तृणमूल के कैडर धमकाते थे और यहां तक ​​कि हिंसा का सहारा लेते थे. इससे लगातार घट रहे वाम समर्थक रैली में नहीं जाते थे.

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ऐसे में तृणमूल ने अप्रत्यक्ष रूप से कम्युनिस्टों को यह सुविधा दी कि वह अपनी ताकत दिखा सकें. तृणमूल उनके खिलाफ कार्रवाई भी धीरे कर रही है ऐसे में माकपा कार्यकर्ता धीरे-धीरे खुद को आगे बढ़ा रहे हैं. यह तृणमूल प्रमुख के हित में है कि वाम मोर्चा और कांग्रेस पश्चिम बंगाल से पूरी तरह से बाहर नहीं हैं.

क्षेत्र में उनकी उपस्थिति तृणमूल विरोधी मतों में विभाजन को सुनिश्चित करती है, अगर विपक्ष इसमें विफल रहा तो वहां बीजेपी अपनी जगह बना लेगी.

तृणमूल प्रमुख को यह एहसास हुआ है कि वाम दलों का सफाया करने के उत्साह में, उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को बीजेपी के पाले में ढकेल दिया है जो कि खुले बाहों के साथ उनका इंतजार कर रहे हैं. राज्य में वामपंथियों का असर जिस तरह घट रहा है, उसी तेजी से बीजेपी बढ़ रही है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 17% वोट शेयर हासिल करने में सफल रही, जबकि लेफ्ट का हिस्सा 43 से घटकर 29% हो गया. यह गिरावट उपचुनावों में भी दिख रहा है.

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वाम मोर्चे के वोट प्रतिशत में और गिरावट बीजेपी को बढ़ावा देगी. दौड़ में आगे रहने की कोशिश में तृणमूल कांग्रेस के लिए बीजेपी को घेरना जरूरी हो गया है और इसके लिए यह जरूरी है कि वाम दलों और कांग्रेस का संयुक्त वोट शेयर 25% से नीचे नहीं जाए.

यह सुनिश्चित करने के लिए कि सीपीएम और कांग्रेस का सफाया नहीं हुआ है, बनर्जी उन सीटों पर काफी कमजोर उम्मीदवारों को मैदान में उतार रही हैं, जहां इन दलों के जीतने का मौका है. उदाहरण के लिए, तृणमूल ने जंगीपुर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी और रायगंज में दिवंगत प्रियरंजन दास मुंशी की पत्नी दीपा दासमुंशी के खिलाफ कमजोर उम्मीदवारों का नाम दिया है.

हाई-प्रोफाइल जादवपुर सीट से इस बार फिल्म स्टार मिमी चक्रवर्ती को टीएमसी ने टिकट दिया है. इस सीट पर पहले ममता बनर्जी सांसद रह चुकी हैं. इसके साथ ही लोकसभा स्पीकर रहे दिवंगत सोमनाथ चटर्जी भी इस सीट से सांसद थे. कांग्रेस ने इस सीट से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है और बांकुरा निर्वाचन क्षेत्र को छोड़ने की योजना भी बना रही है जहाँ तृणमूल ने अनुभवी नेता सुब्रत मुखर्जी को मैदान में उतारा है.

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इससे पता चलता है कि विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में चार सीटों वाली प्रतियोगिता से बचने के लिए ठोस प्रयास किया जा रहा है क्योंकि यह बीजेपी लिए फायदेमंद हो सकता है. जब से बीजेपी ने बंगाल में अपना दायरा बढ़ाया है तब से बनर्जी विपक्षी एकता की पक्षधर हो गई हैं.

बीते दो साल में टीएमसी नेता कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी की ओर से बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठक में भी देखे गए. पिछले साल कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (सेकुलर) सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में जिसमें वाम नेता सीताराम येचुरी और डी राजा भी शामिल थे, इसमें ममता भी शामिल थीं.

तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों दोनों ने संसद में मोदी सरकार को साधने में अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर काम किया है.

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इस साल की शुरुआत में, बनर्जी ने यहां तक ​कहा था कि वह बीजेपी के खिलाफ लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर वाम दलों और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार थीं, हालांकि राज्य स्तर पर लड़ाई जारी रहेगी. यह केवल समय ही बताएगा कि तृणमूल सुप्रीमो अपने किले की रक्षा करने के अपने प्रयास में सफल होती हैं या नहीं.  (यह पत्रकार के निजी विचार हैं.)

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