कैसे होता है अलग-अलग तरीकों से वैक्सीन निर्माण? टीके के बारे में अ से ज्ञ तक सब कुछ समझिए

कोविड-19 महामारी के बीच उम्मीद का कारण साइंस, रिसर्च और वैक्सीन डेवलपमेंट हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

Vaccination in India: वैक्सीन हमारे इम्यून सिस्टम (Immune System) को बीमारी फैलने वाले एजेंट्स के खिलाफ तैयार करती है. ऐसे एजेंट्स, जिन्होंने शरीर को अब तक प्रभावित नहीं किया है. ये शरीर को भविष्य के लिए सुरक्षा देती हैं.

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    (डॉक्टर चंद्रकांत लहारिया)

    नई दिल्ली. आमतौर पर वैक्सीन का विकास एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें सफलता सीमित है. एक नया टीका विकसित करने में औसतन 10 साल लगते हैं, जबकि अन्य में अधिक समय लगता है. प्री-क्लीनिकल (इन-विट्रो) और क्लीनिकल (या मानव) ट्रायल्स के विभिन्न चरणों में प्रवेश करने वाले सभी उम्मीदवारों में से 10% से कम वैक्सीन सफल होती हैं. इसके बाद भी अलग-अलग कोविड-19 वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) के विकास में दुनिया में अभूतपूर्व बढ़त देखी गयी. SARS-CoV-2 के पहली बार मिलने के बाद एक साल से भी कम समय में पहली कोविड-19 वैक्सीन मिल गई थी. फाइजर-बायोएनटेक (Pfizer-BioNTech) को ब्रिटेन ने 2 दिसंबर 2020 को आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति दी थी. अब मई 2021 की शुरुआत तक दर्जनों वैक्सीन का इस्तेमाल जारी है. वैक्सीन उत्पादन में नए प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया जाना इनकी सफलता का एक बड़ा कारण है.

    पारंपरिक तौर पर वैक्सीन जीवित-क्षीण टीकों, निष्क्रिय या मारे गए टीकों और सब यूनिट वैक्सीन के तौर पर विकसित किया जाता है. कोविड महामारी को प्रतिक्रिया के रूप में वैक्सीन वायरल वेक्टर्ड और mRNA प्लेटफॉर्म्स पर आ गईं. इन प्लेटफॉर्म्स पर रिसर्च और डेवलपमेंट वर्षों से चल रहा था. हालांकि, कोविड-19 से पहले कोई भी वैक्सीन इन दोनों प्लेटफॉर्म्स पर तैयार नहीं की गई थी.



    वैक्सीन कैसे काम करती है?
    वैक्सीन हमारे इम्यून सिस्टम को बीमारी फैलने वाले एजेंट्स के खिलाफ तैयार करती है. ऐसे एजेंट्स, जिन्होंने शरीर को अब तक प्रभावित नहीं किया है. ये शरीर को भविष्य के लिए सुरक्षा देती हैं. वैक्सीन को अपने अंदर एंटीजन नाम के कंपोनेंट के लिए जाना जाता है. ये कंपोनेंट आमतौर पर उस पैथोजन का हिस्सा होते हैं, जिनके खिलाफ वैक्सीन तैयार की जा रही है. इनमें बीमारी फैलाने की क्षमता नहीं होती, बल्कि ये एंटीबॉडीज विकसित करने के लिए इम्यून सिस्टम को एक्टिवेट करती हैं. SARS-CoV-2 में स्पाइक प्रोटीन ऑप्टिमल एंटीजन होते हैं. ज्यादातर कोविड-19 वैक्सीन में इन्हें अलग-अलग तरीकों से इंसान के शरीर में भेजा जाता है.

    भारत में वैक्सीन और उसमें इस्तेमाल किए गए प्लेटफॉर्म्स
    फिलहाल भारत में दो कोविड-19 वैक्सीन- कोविशील्ड और कोवैक्सीन का इस्तेमाल किया जा रहा है. ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड वायरल-वेक्टर्ड प्लेटफॉर्म पर आधारित है. जबकि, भारत बायोटेक और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की तरफ से मिलकर बनाई गई कोवैक्सीन एक निष्क्रिय वैक्सीन है. स्पूतनिक भी वायरल-वेक्टर्ड वैक्सीन है.

    वायरल वेक्टर्ड वैक्सीन: एक वेक्टर बीमारी फैलाने वाले एजेंट के वाहक के तौर पर काम करता है. वायरल वेक्टर्ड वैक्सीन में इंसानी सेल तक लक्षित एंटीजन जीन पहुंचाने के लिए वायरस का इस्तेमाल किया जाता है. कई वायरल वेक्टर्स होते हैं, जिनके अलग-अलग फायदे होते हैं. सबसे ज्यादा पहचाने जाने वाले हैं एडीनोवायरस, जो इंसान को हल्की सर्दी और बगैर लक्षणों वाले संक्रमण का कारण बनते हैं.

    कोविशील्ड में चिंपाजी एडीनोवायरस (AZD1222 या ChAdOx1) का इस्तेमाल हुआ है, जिसमें SARS-CoV-2 का स्पाइक प्रोटीन होता है. ह्यूमन एडीनोवायरस भी होते हैं. हालांकि, यहां जोखिम यह है कि किसी व्यक्ति में पिछली सर्दी या संक्रमण उन्हें मानव एडेनोवायरस के एंटीबॉडी के साथ छोड़ सकता है, जो वैक्सीन के साथ हस्तक्षेप कर सकता है. इसी के चलते स्पूतनिक 5 में दो ह्मयूमन एडीनोवायरस Ad5 और Ad26 का उपयोग किया गया है, ताकि दूसरे डोज के साथ हस्तक्षेप को कम किया जा सके. फिलहाल कोविड वैक्सीन में इस्तेमाल हो रहा एडीनोवायरस नॉन-रेप्लिकेटिंग है, जिसका मतलब यह है कि ये मल्टिप्लाय नहीं कर सकता.

    निष्क्रिय या मृत वैक्सीन: जो पैथोजन्स गुणा नहीं कर सकते, वे बीमारी नहीं फैला सकते. ऐसे में फोर्मालिन जैसे कैमिकल का इस्तेमाल कर वायरस या बैक्टीरिया को निष्क्रिय कर उन्हें सुरक्षित इम्यूनोजन में बदला जा सकता है. चूंकि, निष्क्रिय वायरस या बैक्टीरिया मल्टिप्लाय नहीं कर सकता, तो हमें एक से ज्यादा डोज की जरूरत होती है और इम्यून प्रतिक्रिया को सुधारने के लिए अलग पदार्थ की भी जरूरत होती है. इसे एड्जुवेंट कहा जाता है.

    दुनिया के बाकी हिस्सों में क्या हैं हाल
    कई ऐसी कोविड-19 वैक्सीन हैं, जो दुनिया के अन्य हिस्सों में विकसित और लाइसेंस्ड हुई हैं. हालांकि, ये वैक्सीन भारत में उपलब्ध नहीं है. फिलहाल कई कंपनियां भारत में लाइसेंस पाने के लिए तैयार हैं. समझते हैं कि ये वैक्सीन किन प्लेटफॉर्म्स पर तैयार की गई हैं.

    RNA वैक्सीन: प्रोटीन के लिए जेनेटिक सीक्वेंस साथ रखने वाले मैसेंजर आरएनए (mRNA) आमतौर पर फैटी नेनोपार्टिकल्स में मिले हुए होते हैं. ये सेल कोशिकाओं की तरह होते हैं और RNA को तय सेल तक पहुंचा सकते हैं. यहां मैसेंजर RNA इस तरह से काम करता है, जैसे वो इसी सेल का है. इसके बाद सेल मैसेज पढ़ने के लिए अपने प्रोटीन उत्पादन मशीनरी का इस्तेमाल करता है और स्पाइक प्रोटीन बनाता है. इसे बाद होस्ट सेल से रिलीज कर दिया जाता है और फिर ये इम्यून सिस्टेम के साथ मिलता है, जिससे एंटीबॉडी उत्पादन और सेल्युलर इम्युनिटी तैयार होती है.

    मार्च 2020 में क्लीनिकल ट्रायल तक पहुंचने वाली पहली कोविड-19 मॉडर्ना की वैक्सीन mRNA- 1273 थी. प्लेटफॉर्म के तौर पर mRNA टीकों के कई फायदे होते है, क्योंकि ये तेजी से काम कर सकते हैं और इसमें लंबे दौर के लिए सुरक्षा को लेकर चिंता करने की गुंजाइश कम होती है. ये न्यूक्लियस में आसानी से प्रवेश नहीं कर सकतीं और ब्लडस्ट्रीम को आसानी से छोड़ भी नहीं सकतीं.

    सब यूनिट वैक्सीन: एक वैक्सीन जिसमें प्रोटीन पूरी तरह या उसका कुछ हिस्सा हो, तो उसे प्रोटीन या सब यूनिट वैक्सीन कहा जाता है. जीव के अंग जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रेरित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, उन्हें पूरे जीव से शुद्ध किया जा सकता है, या केवल प्रोटीन के रूप में अलग से सिंथेसाइज्ड किया जा सकता है. कई सब यूनिट या प्रोटीन वैक्सीन बैक्टीरियल या फंगल सेल में तैयार होती हैं. ऐसे में ज्यादा प्रोटीन आसानी से बनाया जा सकता है. कई कंपनियां SARS-CoV-2 के स्पाइक प्रोटीन पर आधारित प्रोटीन वैक्सीन पर काम कर रही हैं.

    इन प्लेटफॉर्म्स पर किया जा रहा है विचार
    Live-attenuated वैक्सीन: यह पारंपरिक प्लेटफॉर्म है, जिस पर पहले ही बड़ी संख्या में वैक्सीन उपलब्ध हैं. इस प्रक्रिया में पैथोजन को नॉन-पैथोजनिक बनाने के लिए कमजोर किया जाता है, लेकिन इम्यूनोजेनिसिटी बचा ली जाती है. चूंकि पूरा वायरस पूर्ण विकसित बीमारी का कारण बन सकता है, इसलिए वायरस को रोग पैदा करने में असमर्थ होने के लिए म्यूटेशन पेश किया जाता है, लेकिन प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रेरित करने की क्षमता होती है. भारत की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स इस तरीके से SARS-CoV-2 वैक्सीन विकसित कर रही हैं.

    डीएनए वैक्सीन: ये टीके प्रोटीन के लिए जीन कोड के लिए सीक्वेंस ले जाने वाले आरएनए टीकों से मिलते जुलते हैं. ये ऐसे प्रोटीन होते हैं, जो सही इम्यून सिस्टम के सुरक्षा प्रतिक्रिया को तैयार करते हैं. हालांकि, इसकी प्रक्रिया mRNA से ज्यादा जटिल होती है. DNA उम्मीदवार को मैसेंजर आरएनए बनाने के लिए होस्ट सेल के पहले सेल में और फिर न्यूक्लियस में प्रवेश करना होता है. इसके बाद मैसेंजर आरएनए सीक्वेंस को वहां ले जाएगा, जहां प्रोटीन बनता है. डीएनए को सेल्स में ले जाना चुनौती भरा हो सकता है और इस तरीके में बिजली का इस्तेमाल करना या स्किन या मसल में इम्यून सेल में प्रवेश करने के लिए प्लासमिड पर डीएनए को रखना शामिल है. भारत की जायडस कैडिला की वैक्सीन इस तरीके से वैक्सीन का निर्माण कर रही है.

    निष्कर्ष
    कोविड-19 महामारी के बीच उम्मीद का कारण साइंस, रिसर्च और वैक्सीन डेवलपमेंट हैं. विश्व स्तर पर हो रही वैक्सीन शोध और विकास ने आगे की ओर लंबी छलांग लगाई है. साथ ही कई वैक्सीन उम्मीदवारों की उपलब्धता ने उम्मीद जगाई है कि हम वायरस और बीमारी के खिलाफ जल्द ही जीत हासिल करेंगे. अंत में जब वैक्सीन को क्लीनिकल ट्रायल डेटा और डेटा की समीक्षा के बाद लाइसेंस मिलता है, तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वे कौन से प्लेटफॉर्म पर बनी हैं. एक व्यक्ति को इस घातक बीमारी से बचाना ही इनका एक मकसद होता है.