Tripura Election Result 2018: 'लालगढ़' में इस तरह कामयाब हुई भगवा ब्रिगेड!

Tripura Election Result 2018: 'लालगढ़' में इस तरह कामयाब हुई भगवा ब्रिगेड!
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त्रिपुरा में लगातार 25 साल से लहरा रहे लाल झंडे को उखाड़कर भगवा लहराना आसान नहीं था, लेकिन अमित शाह ने ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया कि बीजेपी यहां जीरो से हीरो बन गई

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त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत आसान नहीं थी, क्‍योंकि राज्‍य की सत्‍ता में लगातार 25 साल से काबिज वामपंथी सरकार फिर से वापसी करने के लिए पूरा जोर लगा रही थी. जबकि बीजेपी को शून्य से शुरुआत करनी थी. संगठन भी खड़ा करना था और चुनाव में जीत की ओर बढ़ना भी था.

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह शतरंज के खिलाड़ी रहे हैं. शतरंज के कोई तयशुदा नियम नहीं है, जैसा मौका वैसी चाल. इसलिए दूसरी पार्टियों के नेताओं को भी बीजेपी के रंग में रंगने से परहेज नहीं किया. 52 साल के आरएसएस प्रचारक से चुनाव रणनीतिकार बने सुनील देवधर को नॉर्थ ईस्ट का प्रभारी बनाया.

देवधर ने तीन साल पहले सत्ताधारी वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ बीजेपी का चुनाव अभियान संभालने के लिए त्रिपुरा का रुख किया. अमित शाह ने राहुल गांधी और लेफ्ट के केंद्रीय नेताओं से पहले त्रिपुरा में कैंप किया.



सियासी जानकारों का कहना है कि अमित शाह ने 2 साल में 18 दिन त्रिपुरा को दिए हैं. ऐसा आज तक नहीं हुआ कि कोई पार्टी अध्यक्ष निजी तौर पर हर ब्लॉक और बूथ स्तर पर ट्रेंड का अध्ययन किया, संगठन तैयार किया और छोटी पार्टियों से समझौता किया.
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पार्टी ने दो दशक से लेफ्ट का चेहरा रहे माणिक सरकार की काट खोजी. सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से को भाजपा के वोट में बदलने के लिए 'मोदी लाओ' की जगह 'माणिक हटाओ' के नारे पर जोर दिया. देवधर ने कहा 'माणिक सरकार में गरीब और ज्यादा गरीब हो रहे हैं. त्रिपुरा की जनसंख्या की करीब 67 फीसदी आबादी बीपीएल कार्ड धारक है.'

पार्टी महासचिव राम माधव और देवधर ने 23 जनवरी को दिल्ली के कंस्‍टीट्यूशनल क्लब में त्रिपुरा पर लिखी गई एक किताब 'माणिक सरकार दृश्यम और सत्यम' का विमोचन किया. इसके माध्यम से त्रिपुरा में माणिक सरकार का कच्चा-चिट्ठा खोलने की कोशिश की. त्रिपुरा में हो रही राजनीतिक हत्याओं और वहां के पिछड़ेपन के मसले को लेकर जनता के बीच गए.

चुनाव से पहले बीजेपी ने पूर्वोत्तर प्रेम दिखाना शुरू किया. पार्टी ने यह दावा किया कि 2014-15 के मुकाबले 2016-17 में पूर्वोत्तर के लिए दोगुनी परियोजनाएं दी गईं हैं. इस तरह धीरे-धीरे त्रिपुरा में पार्टी को जीरो से हीरो बनाने का काम किया.

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वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अमिताभ सिन्हा कहते हैं कि "बीजेपी ने यहां सत्ताधारी पार्टी से ज्यादा ताकत लगाई. उसने पूर्वोत्तर को को अपने विस्तार का हिस्सा बनाया. क्योंकि हिंदी पट्टी में वह पहले से ही मजबूत है. पूर्वोत्तर के चुनावों के बहाने ही बीजेपी ने यहां की 25 लोकसभा सीटों पर भी निशाना साधा है. उसमें जीत के लिए रिहर्सल की है. इस समय पूर्वोत्तर के 8 लोकसभा क्षेत्रों में बीजेपी और 7 में कांग्रेस का कब्जा है. दो सीटों पर सीपीआई (एम) और शेष पर क्षेत्रीय दलों के सांसद हैं."

 
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