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कोरोना में सबसे बड़ी चिंता कैसे रुके पलायन

Anil Rai | News18Hindi
Updated: March 28, 2020, 6:24 PM IST
कोरोना में सबसे बड़ी चिंता कैसे रुके पलायन
लखनऊ के चारबाग बस अड्डे पर बैठे यात्री

Corona Virus: मजदूरों के पलायन की तस्वीरें आ रही हैं, वो विचलित करने वाली हैं. पलायन करने वालों के अपने तर्क हैं और उन्हें रोकने वालों के अलग, लेकिन सच ये है कि अगर ये लोग इसी तरह भीड़ बनकर यात्रा करते रहे तो 21 दिन का लॉकडाउन कितना कारगर होगा कहना मुश्किल होगा.

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  • Last Updated: March 28, 2020, 6:24 PM IST
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देश और दुनिया इस समय कोरोना (Corona Virus) की महामारी से लड़ रही है. इस लड़ाई में 21 दिन के लॉकडाउन (Lock Down) की खास अहमियत है, लेकिन जिस तरह लगातार मजदूरों के पलायन की तस्वीरें आ रही हैं, वो विचलित करने वाली हैं. पलायन  करने वालों के अपने तर्क हैं और उन्हें रोकने वालों के अलग, लेकिन सच ये है कि अगर ये लोग इसी तरह भीड़ बनकर यात्रा करते रहे तो 21 दिन का लॉकडाउन कितना कारगर होगा कहना मुश्किल होगा. ऐसे में सिर्फ एक ही रास्ता बचता है इनका पलायन रोका जाए. इसके लिए सरकारें और एनजीओ अपने स्तर पर काम कर रही हैं लेकिन सवाल ये है कि आखिर इन सबकी कोशिशों पर देश का ये मजदूर तबका भरोसा क्यों नहीं कर पा रहा है!

क्यों नहीं हो रहा है मजदूरों को सिस्टम पर भरोसा
देशभर में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के लिए सैकड़ों योजनाएं चलाती हैं, केन्द्र सरकार और राज्य सराकरों के बजट को देखें, तो हर साल उनके लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाता है, लेकिन संकट के इस दौर में पलायन कर रहे मजदूरों को देखें तो साफ दिख रहा है कि या तो इन योजनाओं का लाभ इन मजदूरों को मिल नहीं पा रहा है या संकट की इस घड़ी में मजदूरों को अपने मालिकों, मैनेजरों और सरकार पर विश्वास नहीं हो पा रहा है. केन्द्र सरकार की योजनाओं को देखें, तो प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन, प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना जैसी कई योजनाएं हैं. राज्य सरकारों के पास मिड-डे मील, एक्सिडेंट बीमा योजना, मेटेरनिटी लाभ योजना, चाइल्ड लाभ योजना, क्रिटिकल इलनेस स्कीम, ब्राइट स्टूडेंट योजना, डिस्वेलिटी पेंशन योजना जैसी योजनाओं की भरमार है, लेकिन इस संकट की घड़ी में सरकार अपने कामगारों को ये भरोसा नहीं दिला पा रही है कि हम उसके साथ खड़े हैं.

भरोसा न करने की ये है वजह



दरअसल शहरी क्षेत्र में मजदूरों को सरकार ने कई श्रेणियों में बांट रखा है, जिनमें निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की योजनाएं श्रम विभाग के जिम्मे हैं जिसके लिए बकायदा लेबर सेस वसूला जाता है, लेकिन घरों में काम करने वाले, ऑटो-रिक्शा चलाने वाले जैसे मजदूरों का जिम्मा नगर विकास विभाग यानि नगर निगमों के पास है.



यहां देखने वाली बात ये है कि उत्तर प्रदेश में श्रम विभाग के पास कुल 20 लाख मजदूर रजिस्टर्ड हैं लेकिन उनमें से सिर्फ 6 लाख मजदूरों का खाता नम्बर ही विभाग के पास है, इन 6 लाख मजदूरों में सिर्फ 1 लाख के आस-पासे के खाते में ही अब तक पैसा जा पाया है, क्योंकि बैंकों के पास भी पर्याप्त संशाधन उपलब्ध नहीं हैं. कुछ यही हाल औद्योगिक विकास और नगर विकास विभाग का है, लोगों को भोजन के पैकेट उपलब्ध कराने का जिम्मा उठाने वाले खाद्य एवं रशद विभाग के पास भी उन्हीं लोगो का रिकार्ड है जिनके पास राशन कार्ड हैं.

पलायन को रोकने का क्या है रास्ता
पलायन को रोकने के कई रास्ते हो सकते हैं, लेकिन उनमें सबसे पहले पलायन कर रहे लोगों को सरकार और गैरसरकारी संगठनों को लोगों को ये भरोसा दिलाना होगा कि वो सुरक्षित हैं और सरकार आने-वाले एक दो दिनों में सब तक राशन और जरुरी समान मुहैया करा देगी. इसके लिए सरकारी तंत्र को रजिस्ट्रेशन, राशन कार्ड जैसे रिकार्ड की तैयारी करने की बजाय आधार कार्ड जैसे परिचय पत्र पर ही राशन और जरूरी वस्तुएं देना शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि सरकारी अधिकारी हर वितरण का रिकाॅर्ड रखना चाहते हैं जो जरूर भी है क्योंकि जब तक इन लोगों को ये भरोसा नहीं हो जाता कि बेरोजगारी के इस दौर में उनका परिवार भूखों नहीं मरेगा, वो रुकने को तैयार नहीं होगें. इन मजदूरों के पलायन को रोकने में दूसरा संकट ये है कि अब वे अपनी मूल जगह को छोड़ चुके हैं और अपने गंतव्य को पहुंचने में उन्हें वक्त लगेगा. ऐसे में सरकार को अब वो जहां है उनको वहीं रोकने के छोड़कर कोई रास्ता नहीं है. साफ है ऐसे हालात में सरकार सरकारी और गैरसरकारी इमारतों को शेल्टर होम बना सकती है ताकि उन सबको सामाजिक दूरी बनाते हुए रखा जा सके.

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First published: March 28, 2020, 6:18 PM IST
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