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Covid-19 Vaccine: कोरोना के डेल्टा वेरिएंट पर कितनी कारगर है वैक्सीन? शोध में मिली नई जानकारी

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डेल्टा वेरिएंट फिल्हाल 170 देशों में मौजूद है. (फाइल फोटो: Shutterstock)

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डेल्टा वेरिएंट फिल्हाल 170 देशों में मौजूद है. (फाइल फोटो: Shutterstock)

Vaccination in India: अध्ययन में पाया गया कि डेल्टा वेरिएंट वुहान (Wuhan) से निकली मौलिक स्ट्रेन की तुलना में, ठीक हुए व्यक्ति की सीरम न्यूट्रिलाइजिंग (असर कम करने वाली) एंटीबॉ़डी के प्रति 6 गुना कम संवेदनशील था और वहीं वैक्सीन से बनी एंटीबॉडी के प्रति 8 गुना कम संवेदेनशील था.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. SARS-CoV-2 वायरस के डेल्टा वेरिएंट (Delta Variant) के तेजी से फैलने को लेकर एक संभावित स्पष्टीकरण को लेकर नेचर जरनल (Nature Journal) में एक अध्ययन का प्रकाशन किया गया है. जिसमें पाया गया है कि विशेष तौर पर इस वेरिएंट में संक्रमण की क्षमता बहुत ज्यादा होती है, और ये पहले हुए संक्रमण या वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) से मिली इम्यूनिटी (Immunity) को भी नाकाम कर सकता है. डेल्टा वेरिएंट या B.1.617.2 सबसे पहली बार महाराष्ट्र में पाया गया था. इसने ना सिर्फ भारत में बल्कि कई देशों में कोहराम मचाया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक डेल्टा वेरिएंट फिल्हाल 170 देशों में मौजूद है. नेचर अध्ययन में शोधार्थियों की एक अतंर्राष्ट्रीय टीम सहित कई भारतीय संस्थान भी शामिल हुए हैं और यह अध्ययन भारत में मई के अंत तक मिले डाटा के आधार पर किया गया है. इसके परिणाम सबसे पहले जून में समीक्षा से पहले सामने आए थे .

    शोध में क्या मिला
    अध्ययन में पाया गया कि डेल्टा वेरिएंट वुहान से निकली मौलिक स्ट्रेन की तुलना में, ठीक हुए व्यक्ति की सीरम न्यूट्रिलाइजिंग (असर कम करने वाली) एंटीबॉ़डी के प्रति 6 गुना कम संवेदनशील था और वहीं वैक्सीन से बनी एंटीबॉडी के प्रति 8 गुना कम संवेदेनशील था. सरल शब्दों में समझें तो मौलिक वायरस की तुलना में डेल्टा वेरिएंट से वैक्सीन लगे हुए व्यक्तियों में ब्रेकथ्रू ( दोबारा संक्रमति होना) की आशंका 8 गुना ज्यादा रहती है और वहीं जो पहले भी संक्रमित हो चुके हैं उनमें ये आशंका 6 गुना ज्यादा होती है. इसके अलावा अध्ययन में पाया गया कि डेल्टा वेरिएंट में प्रतिकृति और स्पाइक के जरिए प्रवेश करने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है यानी इसमें मानव शरीर में प्रवेश करके खुद को बढ़ाने और संक्रमण फैलाने की ताकत B.1.617.1 की तुलना में बहुत ज्यादा होती है. दिल्ली के तीन अस्पताल के ऐसे 130 स्वास्थ्यकर्मी जिन्हें वैक्सीन के दोनों डोज लग चुके थे और उनमें ब्रेकथ्रू संक्रमण हुआ था उन पर अध्ययन किया गया, जिसमें पाया गया कि डेल्टा वेरिएंट पर वैक्सीन का असर कम हो जाता है.

    डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ वैक्सीन के असर पर कोई और साक्ष्य
    हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चार अध्ययनों पर बात की जिनमें दो अमेरिका में, एक यूके में और एक क़तर में हुई. इन अध्ययनों में भी डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ वैक्सीन के असर कम होने की बात सामने आई. मसलन यूके के अध्ययन से मालूम चला कि एस्ट्राजेनका वैक्सीन का असर उस दौरान कम दिखा जब डेल्टा वेरिएंट पूरे देश पर हावी था, जबकि अल्फा वेरिएंट के प्रभावी होने के दौरान वैक्सीन का असर कम नहीं हुआ था.

    फिर वैक्सीन का क्या फायदा
    पुणे के इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च में इम्यूनोलॉजिस्ट विनीता बल ने बताया कि अध्ययन से लोगों को यह नहीं मानना चाहिए की वैक्सीन काम की नहीं है क्योंकि नेचर अध्ययन प्रयोगशाला वाले माहौल में किया गया है जो एक तरह से कृत्रिम होता है. इससे जो भी डाटा सामने आया है वो शरीर के अंदर असल में क्या होता है उसके उलट एक कृत्रित माहौल में किया गया अध्ययन है. एंटीबॉडी के असर को कम करना (जैसा अध्ययन में पाया गया ) एक सीमा तक ही सही है वो पूरा जवाब नहीं देता है.

    इम्यून सुरक्षा एंटीबॉडी के साथ साथ टी सेल की प्रतिक्रिया को भी बेअसर करने का काम करती है. जिन्हें वैक्सीन लगी हुई है या जो पहले संक्रमित हुए हैं. उनमें एंटीबॉडी और टी सेल दोनों ही सुरक्षा प्रदान करने में भागीदारी निभाते हैं. इस अध्ययन में टी -सेल से जुड़े डाटा नहीं दिखाए गए हैं. जबकि इम्यून रिस्पॉन्स में इसका अहम योगदान होता है. विनीता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि कोई भी वैक्सीन 100 फीसद सुरक्षा प्रदान नहीं करती है, ब्रेकथ्रू संक्रमण कोई नई बात नहीं है. बल्कि वैक्सीन लगने के बाद संक्रमण के बाद गंभीर रूप से बीमार पड़ने या अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है. वहीं जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है उनके साथ ये खतरा बना हुआ है.

    नेशनल कैमिकल लेबोरेटरी पुणे की एक वैज्ञानिक अनु रघुनाथन का कहना है कि अध्ययन को सरल भाषा में समझें तो बस यही है कि डेल्टा वेरिएंट को रोकने के लिए बड़ी मात्रा में एंटीबॉडी की ज़रूरत होगी. वैक्सीन अभी भी असरदार हैं. डेल्टा वेरिएंट अगर इसके असर को कम कर रहा है तो इसका मतलब ये है मौलिक वायरस की तुलना में डेल्टा वेरिएंट को रोकने के लिए हमें 5 से 8 गुना एंटीबॉडी की जरूरत होगी ताकी ये इम्यून रिस्पांस को उसी गति के साथ बढ़ा सके.

    फिर नए वेरिएंट से कैसे निपटा जाए
    वुहान से निकले मौलिक वायरस ने सफलतापूर्वक खुद को अल्फा, बीटा, कप्पा और डेल्टा वेरिएंट जैसे खतरनाक म्यूटेंट में बदल लिया है. वायरस आगे भी खुद को नए रूप में बदलता रहेगा, लेकिन ये ज़रूरी नहीं है कि सारे म्यूटेंट इतने ही घातक हों. विशेषज्ञों का कहना है कि नए वेरिएंट को फैलने से रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि व्यापकस्तर पर वैक्सीन लगाई जाए, और कोविड से बचाव और सुरक्षा से जुड़े उपाय सख्ती से लागू किए जाएं.

    रघुनाथन का कहना है कि इस अध्ययन की तरह ही एंटीबॉडी के असर को लेकर लगातार निगरानी रखना बेहद ज़रूरी है जिससे ये पता चल सके कि नए वेरिएंट के लिए बूस्टर डोज की ज़रूरत तो नहीं है या वैक्सीन में कुछ सुधार की आवश्यकता तो नहीं हैं. इसके अलावा नए वेरिएंट की जीनोमिक निगरानी भी जारी रखनी चाहिए.

    वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हो सकता है वैक्सीन के अतिरिक्त बूस्टर डोज की जरूरत हो, हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि जब भी नई और असरदार वैक्सीन बाजार में आती है तो वो सभी को आसानी से और जल्दी से उपलब्ध हो.

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